प्रिय लूसीलियस
तुम बार-बार होने वाले साइनस संक्रमण और उनके साथ आने वाले उन ज्वरों से पीड़ित हो जो बीमारी के पुरानी और लंबे समय तक बने रहने पर आते हैं। यह सुनकर मुझे दुःख हुआ, विशेषकर इसलिए कि मैं स्वयं भी इस प्रकार की बीमारी का अनुभव कर चुका हूँ। शुरू में मैंने इसकी अधिक परवाह नहीं की। उस समय मैं युवा था और कठिनाइयों को सहने में सक्षम था। बीमारी के सामने भी मैं अडिग रहता था। लेकिन अंततः मुझे उसके आगे झुकना पड़ा। मैं इतना दुर्बल और क्षीण हो गया कि ऐसा प्रतीत होता था मानो मेरा पूरा शरीर मेरे साइनसों के रास्ते धीरे-धीरे बहकर निकल रहा हो। एक से अधिक बार मेरे मन में अपने जीवन का अंत कर लेने का विचार आया। किन्तु मेरे पिता वृद्ध थे। यही बात मुझे रोक लेती थी। क्योंकि यद्यपि मुझे विश्वास था कि मैं साहसपूर्वक मृत्यु का सामना कर सकता हूँ, फिर भी मैं यह भी जानता था कि मेरे प्रति इतना स्नेह रखने वाले मेरे पिता मेरे वियोग को उसी साहस के साथ सहन नहीं कर पाएँगे। इसलिए मैंने स्वयं को जीवित रहने का आदेश दिया क्योंकि कभी-कभी केवल जीवित बने रहना भी साहस का कार्य होता है।
मैं तुम्हें बताऊँगा कि उस समय मुझे किस बात से सांत्वना मिली। पर उससे पहले मैं यह कहना चाहता हूँ कि जिन विचारों ने मुझे सांत्वना दी, उनमें औषधि के समान उपचार करने की शक्ति थी। श्रेष्ठ सांत्वनाएँ रोग का उपचार करती हैं। जो मन को ऊपर उठाती हैं, वही शरीर को भी लाभ पहुँचाती हैं। मेरे अध्ययन ने मुझे बचाया। दर्शन ही वह शक्ति था जिसके कारण मैं बिस्तर से उठ सका और जिसने मुझे पुनः बल प्रदान किया। मैं अपने जीवन का ऋणी उसी का हूँ और जीवन तो उस पर मेरे ऋण का सबसे छोटा भाग है। मेरे स्वस्थ होने में मेरे मित्रों का भी बहुत बड़ा योगदान था। उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाया, मेरे साथ रात-रात भर जागे, मुझसे बातें कीं और इस प्रकार मुझे सांत्वना दी। प्रिय लुसिलियस, किसी रोगी को अपने स्नेही मित्रों से बढ़कर कोई शक्ति नहीं देती। कोई भी चीज़ उसके मन से मृत्यु के विचारों और मृत्यु के भय को उतना दूर नहीं करती। मुझे ऐसा अनुभव होता था कि जब तक वे जीवित हैं, तब तक मैं वास्तव में मर नहीं रहा हूँ। मेरा आशय यह है कि मुझे लगता था कि मैं उनके बीच रहकर नहीं बल्कि उनके माध्यम से जीवित रहूँगा। ऐसा प्रतीत होता था कि मैं अपने प्राण त्याग नहीं रहा बल्कि उन्हें आगे सौंप रहा हूँ।
इन्हीं बातों ने मुझे अपने उपचार का प्रयास करने और हर प्रकार की पीड़ा सहने की इच्छा दी। इनके बिना मनुष्य की अवस्था अत्यंत दयनीय हो जाती है। वह मरने का इरादा तो छोड़ देता है पर जीने की इच्छा भी उसके भीतर नहीं रहती। इसलिए तुम भी इन उपायों को अपनाओ। चिकित्सक तुम्हें बताएगा कि कितनी दूर तक टहलना है, कितना व्यायाम करना है। वह तुम्हें आलस्य में पड़े रहने से रोकेगा क्योंकि दुर्बलता आने पर मनुष्य का स्वभाव निष्क्रिय हो जाने का होता है। वह तुम्हें ऊँचे स्वर में पढ़ने के लिए कहेगा ताकि तुम्हारी श्वास का मार्ग और उसका आधार, जो इस रोग से प्रभावित है, अभ्यास प्राप्त करे। वह तुम्हें नाव में घूमने की सलाह देगा, जिससे उसकी हल्की-हल्की डोल तुम्हारे पाचन-तंत्र को सक्रिय करे। वह यह भी बताएगा कि कौन-सा भोजन करना चाहिए, कब शक्ति बढ़ाने के लिए थोड़ी-सी मदिरा लेनी चाहिए, कब मदिरा से परहेज़ करना चाहिए, ताकि वह तुम्हारी खाँसी को न भड़काए और उसे अधिक गंभीर न बना दे। किन्तु जो सलाह मैं तुम्हें देता हूँ, वह केवल इस बीमारी का ही नहीं बल्कि तुम्हारे समूचे जीवन का उपचार है। वह यह है, मृत्यु का तिरस्कार करो। एक बार जब हम मृत्यु के भय से मुक्त हो जाते हैं, तब कोई भी बात हमें दुःखद नहीं लगती।
हर बीमारी अपने साथ तीन प्रकार की पीड़ाएँ लेकर आती है— मृत्यु का भय, शरीर की वेदना और जीवन के सुखों में व्यवधान। मृत्यु के विषय में मैं पर्याप्त कह चुका हूँ। केवल एक बात और जोड़नी है। मृत्यु किसी बीमारी का नहीं बल्कि हमारे स्वभावगत जीवन का अंतिम पड़ाव है। अनेक बार बीमारी मृत्यु को टाल देती है और कई लोगों का मृत्यु के लिए तैयार हो जाना ही उनके जीवन को बचा चुका है। तुम इसलिए नहीं मरोगे कि तुम बीमार हो। तुम इसलिए मरोगे क्योंकि तुम जीवित हो। यह सत्य तुम्हारे स्वस्थ हो जाने के बाद भी बना रहेगा। स्वस्थ होना बीमारी से छुटकारा पाना है, मृत्यु से नहीं।
अब उस पीड़ा की ओर आएँ जो विशेष रूप से बीमारी की पहचान है। बीमारी में तीव्र शारीरिक वेदना के दौर आते हैं, किन्तु उनके बीच-बीच में विश्राम भी मिलता रहता है। यही उन्हें सहने योग्य बनाता है। क्योंकि जब पीड़ा अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है, तब उसका अंत निकट होता है। कोई भी व्यक्ति अत्यंत तीव्र पीड़ा को बहुत लंबे समय तक नहीं झेल सकता। प्रकृति ने हमारे प्रति अपने महान स्नेह के कारण हमारी रचना इस प्रकार की है कि पीड़ा या तो सहने योग्य होती है या फिर अल्पकालिक। सबसे तीव्र पीड़ाएँ शरीर के सबसे छोटे और पतले अंगों में होती हैं जैसे, नसों, उँगलियों के जोड़ और अन्य संकीर्ण भागों में। जब रोग किसी छोटे-से स्थान में सिमट जाता है तो वहीं सबसे अधिक वेदना होती है। किन्तु ये अंग शीघ्र ही सुन्न भी हो जाते हैं क्योंकि पीड़ा स्वयं ही उनकी पीड़ा का अनुभव करने की शक्ति को नष्ट कर देती है। संभव है कि ऐसा इसलिए होता हो कि शरीर की स्वाभाविक प्राणवायु का प्रवाह रुक जाता है और वह अपनी शक्ति तथा चेतना प्रदान करने की क्षमता खो बैठती है। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि दूषित द्रव, जिसके बाहर निकलने का मार्ग बंद हो गया हो, अपने ही दबाव से इकट्ठा होकर उन स्थानों की संवेदना नष्ट कर देता हो जहाँ वह जमा होता है। इसी कारण गठिया, संधिवात तथा नसों और रीढ़ की अन्य पीड़ादायक बीमारियों में दर्द रुक-रुक कर होता है क्योंकि जहाँ पीड़ा होती है, वहाँ की संवेदना कुछ समय के लिए क्षीण पड़ जाती है। इन सभी रोगों में प्रारम्भिक आक्रमण अत्यंत कष्टदायक होता है, किन्तु समय बीतने के साथ उसका तीखापन कम हो जाता है और अंततः सुन्नता पीड़ा का अंत कर देती है। दाँत, आँख और कान का दर्द भी अत्यंत तीव्र होता है क्योंकि वे शरीर के बहुत छोटे भागों में उत्पन्न होते हैं। यही बात सिरदर्द पर भी लागू होती है। लेकिन जब वे अत्यधिक बढ़ जाते हैं तो मनुष्य पहले अचेत-सा हो जाता है और फिर नींद में चला जाता है। अतः जब पीड़ा असहनीय प्रतीत हो तो यह विचार हमारे लिए सांत्वना का कारण होना चाहिए कि यदि उसका अनुभव अत्यधिक तीव्र है, तो वह अंततः संवेदना के लुप्त हो जाने के साथ समाप्त भी हो जाएगा।
जो लोग अभ्यासहीन होते हैं, वे शारीरिक कष्टों से इसलिए इतना अधिक व्याकुल हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपने मन में संतोष प्राप्त करना कभी सीखा ही नहीं होता। उनका अधिकांश ध्यान और लगाव केवल शरीर तक ही सीमित रहता है। इसलिए महान और बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन को शरीर से अलग रखता है। वह अपने श्रेष्ठ और दिव्य स्वरूप अर्थात अपने मन से अधिक संबंध रखता है। इस दुर्बल तथा निरंतर शिकायत करने वाले शरीर पर केवल उतना ही ध्यान देता है जितना आवश्यक हो।
“लेकिन जिन सुखों का हमें अभ्यास हो चुका है, उनसे वंचित होना कष्टदायक है, भोजन छोड़ना, प्यास और भूख सहना।” निस्संदेह, जब कोई पहली बार इन चीज़ों का त्याग करता है, तब उन्हें सहना कठिन लगता है। परंतु बाद में उनकी लालसा स्वयं ही कम होने लगती है क्योंकि हमारी इच्छाओं के स्रोत धीरे-धीरे मंद पड़ जाते हैं और अंततः क्षीण हो जाते हैं। तब भूख भी केवल चिड़चिड़ापन भर रह जाती है और जिन खाद्य पदार्थों की पहले तीव्र इच्छा होती थी, वे भी अरुचिकर लगने लगते हैं। जिस वस्तु की इच्छा ही समाप्त हो जाए, उससे वंचित होने में कोई कड़वाहट नहीं रहती।
इसके अतिरिक्त, ऐसी कोई पीड़ा नहीं होती जो समय-समय पर समाप्त न होती हो या कम से कम कुछ घट न जाती हो। इतना ही नहीं, उचित औषधियों के द्वारा उसके आने से पहले ही सावधानी बरती जा सकती है और उसे रोका भी जा सकता है। हर प्रकार की पीड़ा, विशेषकर जो बार-बार आती है, अपने आने का कुछ-न-कुछ संकेत पहले ही दे देती है। यदि तुम बीमारी की सबसे भयानक धमकियों को तुच्छ समझो, तो बीमारी को सहना कठिन नहीं रहता।
अपनी शिकायतों के बोझ से अपने कष्टों को और अधिक कठिन मत बनाओ। जब तक हम अपनी धारणाओं से उसे बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखते, तब तक पीड़ा बहुत छोटी बात होती है। यदि तुम स्वयं को यह कहते हुए उत्साहित करना शुरू करो, “यह कुछ भी नहीं है या कम-से-कम बहुत अधिक नहीं है। जब तक यह समाप्त नहीं हो जाती, तब तक इसे धैर्यपूर्वक सह लेते हैं”, तो जब तक तुम उसे तुच्छ समझोगे, वह वास्तव में तुम्हारे लिए तुच्छ ही बनी रहेगी। सब कुछ हमारी धारणा पर निर्भर करता है। केवल महत्त्वाकांक्षा, भोग-विलास और लोभ ही हमारी धारणाओं से संचालित नहीं होते; हम पीड़ा का अनुभव भी उसी के अनुसार करते हैं। मनुष्य उतना ही दुःखी होता है, जितना वह स्वयं को दुःखी मानता है।
मेरा विचार है कि हमें बीती हुई पीड़ाओं की शिकायतें भी छोड़ देनी चाहिए और इस प्रकार की बातें भी नहीं करनी चाहिए—“इतना कष्ट किसी ने कभी नहीं सहा! कैसी भयानक यातना थी! किसी को विश्वास नहीं था कि मैं बच जाऊँगा। मेरा परिवार मेरे लिए निराश हो चुका था। चिकित्सकों ने भी आशा छोड़ दी थी। यातना-यंत्र पर तोड़े जाने वाले लोग भी उतना कष्ट नहीं सहते होंगे जितना मैंने सहा!” यदि ये सब बातें सत्य भी हों तो भी वे अब बीत चुकी हैं। बीते हुए कष्टों को बार-बार याद करके क्या लाभ? जो दुःख तब था, उसके कारण आज फिर से दुःखी होने का क्या अर्थ है? फिर, मनुष्य अपनी विपत्तियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने का आदी होता है। वह दूसरों को ही नहीं, स्वयं को भी धोखा देता है। और सच तो यह है कि जिस पीड़ा को सहना उस समय कड़वा लगता है, वही उसके बीत जाने पर स्मरण में सुखद प्रतीत होती है। समाप्त हो चुके कष्टों पर प्रसन्न होना मनुष्य का स्वाभाविक स्वभाव है।
इसलिए दो बातों को हमें अपने मन से निकाल देना चाहिए— भविष्य के कष्टों का भय और बीते हुए कष्टों की स्मृति। पहला अभी मेरे सामने नहीं है और दूसरा अब मेरा नहीं रहा। जब कोई मनुष्य कठिनाइयों के बीच हो तो उसे अपने आप से कहना चाहिए— “संभव है कि एक दिन इन्हीं बातों को याद करके मुझे आनंद प्राप्त हो।”
फिर उसे पूरी शक्ति के साथ उन कठिनाइयों का सामना करना चाहिए। यदि वह उनके आगे झुक जाएगा तो पराजित हो जाएगा। लेकिन यदि वह अपनी पीड़ा का दृढ़तापूर्वक सामना करेगा तो उसी पर विजय प्राप्त करेगा। अधिकांश लोग वही करते हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए। जिस भवन को उन्हें सहारा देकर गिरने से बचाना चाहिए, उसी को वे अपने ऊपर गिरा लेते हैं। जब कोई भारी वस्तु तुम्हारे ऊपर झुकी हुई हो, तुम्हें दबा रही हो और अपने भार से कुचल रही हो, तो यदि तुम पीछे हटने लगो, वह और अधिक वेग से तुम्हारे ऊपर गिर पड़ेगी। लेकिन यदि तुम दृढ़ता से डटे रहो तो तुम उसे पीछे धकेल सकोगे।
मुक्केबाज़ अपने चेहरे और पूरे शरीर पर अनेक प्रहार सहते हैं। फिर भी यश की इच्छा से वे उस पीड़ा को सहन करते हैं। केवल प्रतियोगिता के समय ही नहीं बल्कि प्रतियोगिता की तैयारी करते हुए अभ्यास के दौरान भी। उनका प्रशिक्षण भी उन्हें कष्ट देता है। आओ, हम भी प्रत्येक संघर्ष में विजय को अपना लक्ष्य बनाएँ। हमारे लिए भी एक पुरस्कार है— न पुष्पमाला, न विजय की ताड़-पत्ती, न कोई तुरही जो हमारे नाम की घोषणा करे बल्कि उत्कृष्ट चरित्र, मन की अडिग दृढ़ता, और वह शांति जो किसी भी संघर्ष में भाग्य पर विजय प्राप्त करने के बाद सदा के लिए प्राप्त होती है।
“मुझे बहुत पीड़ा हो रही है।” तो क्या हुआ? यदि तुम उसे एक दुर्बल व्यक्ति की तरह सहोगे तो क्या वह तुम्हें कम पीड़ा देगी? जिस प्रकार युद्ध में भागते हुए सैनिकों पर शत्रु अधिक विनाशकारी प्रहार करते हैं, उसी प्रकार दुर्भाग्य का प्रत्येक आघात उन लोगों पर अधिक भारी पड़ता है जो उसके सामने हार मान लेते हैं और उससे मुँह मोड़ लेते हैं। “लेकिन यह बोझ बहुत भारी है।” तो क्या हुआ? क्या हमारी शक्ति केवल हल्के बोझ उठाने के लिए ही है?
क्या तुम चाहोगे कि तुम्हारी बीमारी लंबी चले या थोड़े समय की हो लेकिन अत्यंत तीव्र? यदि वह लंबी चले तो उसके बीच-बीच में कुछ विश्राम भी मिलेगा, कुछ राहत के क्षण भी मिलेंगे। वह तुम्हें सँभलने का अवसर देगी, क्योंकि जहाँ रोग का प्रकोप होता है, वहाँ उसके शांत होने का समय भी अवश्य आता है। यदि बीमारी अल्पकालिक लेकिन अत्यंत तीव्र हो, तो उसके केवल दो ही परिणाम हो सकते हैं या तो बीमारी समाप्त हो जाएगी या फिर वही तुम्हारे जीवन का अंत कर देगी। इससे क्या अंतर पड़ता है कि बीमारी समाप्त हो जाए या मैं ही समाप्त हो जाऊँ? दोनों ही स्थितियों में पीड़ा का अंत हो जाता है।
यह भी लाभदायक होगा कि तुम अपने मन को पीड़ा से हटाकर दूसरे विचारों की ओर ले जाओ। उन सम्माननीय और साहसपूर्ण कार्यों का स्मरण करो जो तुमने किए हैं। अपने चरित्र के श्रेष्ठ गुणों पर विचार करो। अपनी स्मृति को उन सभी बातों में विचरण करने दो जिन्हें तुमने जीवन में सबसे अधिक प्रशंसनीय माना है। फिर उन महान व्यक्तियों को याद करो जिन्होंने पीड़ा पर विजय प्राप्त की। उस व्यक्ति को स्मरण करो जो अपनी नसों के ऑपरेशन के दौरान भी पुस्तक पढ़ता रहा। और उस व्यक्ति को भी, जिसने यातना देने वालों के उसके साहस से क्रुद्ध होकर अपनी क्रूरता के सभी साधन आज़माने पर भी हँसना नहीं छोड़ा। यदि हँसी पीड़ा को पराजित कर सकती है तो क्या विवेक उसे पराजित नहीं कर सकता? तुम चाहे जिस पीड़ा का नाम ले लो—साइनस का संक्रमण, लगातार उठने वाली इतनी तीव्र खाँसी कि उससे शरीर के भीतर का अंश बाहर आने लगे। भीतर तक जलाने वाला ज्वर। असहनीय प्यास; या जोड़ों के विकार से टेढ़े-मेढ़े हो चुके अंग— इनमें से कोई भी उस अग्नि, उस यातना-यंत्र, उस दागने वाले तप्त लोहे या पहले से घायल घावों को और गहरा तथा अधिक पीड़ादायक बनाने के लिए किए गए अत्याचारों जितना भयंकर नहीं है। फिर भी उन यातनाओं को सहने वालों में एक ऐसा व्यक्ति भी था जिसने कराह तक नहीं की। इतना ही नहीं, उसने दया की भीख भी नहीं माँगी। इतना ही नहीं, उसने कोई उत्तर भी नहीं दिया। इतना ही नहीं, वह हँसा और वह हँसी बनावटी नहीं, सच्ची थी। तो फिर, क्या तुम भी अपनी इस पीड़ा पर हँसकर विजय प्राप्त नहीं कर सकते?
“लेकिन बीमारी मुझे कोई भी काम करने नहीं देती। वह मुझे मेरे कर्तव्यों का पालन करने से रोकती है।” बीमारी तुम्हारे शरीर को बाधित करती है, तुम्हारे मन को नहीं। वह धावक के पैरों को धीमा कर सकती है। बढ़ई या दर्जी के हाथों को बोझिल बना सकती है। लेकिन यदि तुम्हारा वास्तविक कार्य मन से संबंधित है तो तुम शिक्षा देना, उपदेश करना, सुनना, सीखना, प्रश्न करना और चिंतन करना कभी नहीं छोड़ोगे।
“और इससे भी बढ़कर? क्या तुम यह समझते हो कि बीमारी की अवस्था में आत्मसंयम का पालन करना कोई कार्य नहीं है? तुम सबको यह दिखा सकते हो कि बीमारी पर विजय प्राप्त की जा सकती है या कम-से-कम उसे धैर्यपूर्वक सहा जा सकता है। मुझ पर विश्वास करो, रोग-शय्या पर भी साहस के लिए स्थान होता है। केवल शस्त्र उठाकर युद्ध करना ही निर्भीक और अजेय आत्मा का प्रमाण नहीं है; एक साहसी मनुष्य अपने गुणों का परिचय बिस्तर पर पड़े-पड़े भी देता है। तुम्हारा भी एक कर्तव्य है— बीमारी के साथ साहसपूर्वक संघर्ष करना। यदि वह न तो तुम्हें विवश कर सके और न ही तुम्हारे मन को अपनी ओर झुका सके, तो तुम दूसरों के सामने एक उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करोगे। काश, लोग बीमारी की अवस्था में भी हमें ध्यान से देखते! तब गौरव प्राप्त करने के कितने अवसर उपलब्ध होते। इसलिए स्वयं ही अपने साक्षी बनो और स्वयं ही अपनी प्रशंसा के योग्य बनो।
इसके अतिरिक्त, सुख भी दो प्रकार के होते हैं। बीमारी शारीरिक सुखों में बाधा तो डालती है पर उन्हें पूरी तरह समाप्त नहीं करती। बल्कि यदि ठीक से विचार किया जाए तो वह उन्हें और अधिक तीव्र बना देती है। प्यासे व्यक्ति को पानी अधिक आनंद देता है। भूखे व्यक्ति को भोजन अधिक स्वादिष्ट लगता है और जिस वस्तु से कुछ समय तक वंचित रहना पड़ा हो, उसके मिलने पर उससे अधिक प्रसन्नता प्राप्त होती है। जहाँ तक मानसिक सुखों का प्रश्न है, किसी भी चिकित्सक ने कभी अपने रोगी को उनसे दूर रहने की सलाह नहीं दी। ये सुख शारीरिक सुखों से कहीं अधिक श्रेष्ठ और स्थायी होते हैं। जो व्यक्ति समझदारी के साथ इन्हीं में अपना मन लगाता है, वह इंद्रियों को गुदगुदाने वाले क्षणिक सुखों की परवाह करना छोड़ देता है। “बेचारा रोगी!” क्यों? इसलिए कि वह अपनी मदिरा को बर्फ़ में ठंडा करके नहीं पी सकता? इसलिए कि वह अपने बड़े प्याले में बर्फ़ के टुकड़े डालकर उसे और शीतल नहीं कर सकता? इसलिए कि उसके सामने भोजन की मेज़ पर ही कैम्पानिया के सीप नहीं खोले जाते? इसलिए कि उसके भोजन के समय रसोइए अंगीठियाँ खींचते हुए, उन पर अभी भी भुनते हुए मांस लेकर इधर-उधर नहीं दौड़ते? भोग-विलास ने तो अब यह नया तरीका भी निकाल लिया है कि पूरा रसोईघर ही भोजन के साथ बाहर आ जाता है ताकि पकवान केवल गरम ही न रहें बल्कि इतने गरम हों कि सबसे कठोर स्वाद-इंद्रिय को भी झुलसा दें।
“बेचारा रोगी!” वह उतना ही खाएगा जितना उसका शरीर पचा सके। उसकी मेज़ के एक ओर जंगली सूअर का मांस इस प्रकार नहीं पड़ा रहेगा मानो वह कोई साधारण और तुच्छ भोजन हो जिसे मेज़ से हटा दिया गया हो। उसकी थाली पर जंगली पक्षियों के वक्षस्थल का ढेर नहीं लगाया जाएगा क्योंकि वह पूरे पक्षी को परोसा हुआ देखना सहन नहीं कर सकता। आख़िर तुम्हारे साथ ऐसा कौन-सा दुर्भाग्य घट गया है? तुम रोगी की तरह भोजन करोगे अर्थात स्वस्थ और विवेकपूर्ण मनुष्य की तरह।
जहाँ तक तरल आहार, गुनगुने पानी और उन सभी बातों का प्रश्न है जो विलासी लोगों को असहनीय प्रतीत होती हैं। वे लोग जो वास्तव में शरीर से नहीं बल्कि मन से बीमार होते हैं, उन्हें सहने में हमें कोई कठिनाई नहीं होगी, यदि हम मृत्यु से भयभीत होना छोड़ दें। हम मृत्यु से तभी निर्भय होंगे, जब हम यह जान लेंगे कि वास्तव में क्या शुभ है और क्या अशुभ। तब न तो जीवन हमें बोझिल लगेगा और न ही मृत्यु भयावह प्रतीत होगी। जब मनुष्य अपने मन को इतने विविध, महान और दिव्य विषयों के चिंतन में लगाता है, तब जीवन से ऊब उसे कभी नहीं घेर सकती। आत्म-वितृष्णा तभी उत्पन्न होती है, जब मनुष्य अपना अवकाश निष्क्रियता में बिताता है। जो मन समस्त ब्रह्मांड में विचरण करता है और सत्य की खोज में लगा रहता है, वह कभी सत्य से नहीं ऊबता। ऊब केवल असत्य से होती है।
और यदि ऐसी अवस्था में मृत्यु उसके पास आ जाए और उसे अपने साथ चलने के लिए बुलाए चाहे वह उसकी अपेक्षित आयु से बहुत पहले ही क्यों न आए तो भी वह मनुष्य पहले ही एक परिपूर्ण दीर्घ जीवन का समस्त लाभ प्राप्त कर चुका होता है। उसने संसार में जानने योग्य बहुत-सी बातें जान ली होती हैं। वह यह समझ चुका होता है कि किसी कर्म की श्रेष्ठता केवल उसके लंबे समय तक किए जाने से नहीं बढ़ती। किन्तु जो लोग जीवन को केवल उन भोग-विलासों के आधार पर मापते हैं जो निरर्थक हैं और इसी कारण कभी समाप्त नहीं होते, उन्हें हर जीवन छोटा ही दिखाई देता है।
इन विचारों के द्वारा अपने आपको नया रूप दो। साथ ही, मेरे पत्रों के लिए भी समय निकालते रहो। एक दिन ऐसा आएगा जब हम दोनों फिर से मिलेंगे बल्कि एक-दूसरे के साथ रहेंगे। वह समय चाहे छोटा ही क्यों न हो, हम उसका सदुपयोग करके उसे लंबा बना देंगे। जैसा कि पोसिडोनियस ने कहा है—
“एक शिक्षित व्यक्ति के लिए एक दिन भी उतना समय देता है, जितना एक अशिक्षित व्यक्ति को उसका पूरा लंबा जीवन भी नहीं दे पाता।”
तब तक इस शिक्षा को दृढ़तापूर्वक थामे रहो। इसे कभी मत छोड़ो। विपत्ति के सामने मत झुको, समृद्धि पर भरोसा मत करो और भाग्य के स्वभाव को सदा ध्यान में रखो। यह समझकर चलो कि जो कुछ तुम्हारे साथ घट सकता है, वह एक दिन अवश्य घटेगा। जिस घटना की पहले से अपेक्षा कर ली जाती है, उसके आने पर उसे सहना कहीं अधिक सरल होता है।
अभी के लिए विदा
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