Wednesday, 22 July 2026

अंतरात्मा के संदर्भ में -- पत्र - 77

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हारे उस पत्र की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा हूँ जिसमें तुम सिसिली की अपनी समुद्री यात्रा के दौरान प्राप्त नई जानकारियों का वर्णन करोगे, विशेष रूप से स्वयं कैरीब्डिस (Charybdis) के बारे में कुछ निश्चित तथ्य बताओगे। मुझे अच्छी तरह ज्ञात है कि स्किल्ला (Scylla) वास्तव में केवल एक अंतरीप (समुद्र में निकली हुई चट्टानी भूमि) है और नौकायन के लिए विशेष रूप से खतरनाक नहीं है। परन्तु कैरीब्डिस के विषय में मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे विस्तार से लिखो। क्या वह वास्तव में वैसी ही है जैसी उसकी पौराणिक कथा में वर्णित है? यदि संयोग से तुमने उसका प्रत्यक्ष अवलोकन किया हो और ऐसा करना सचमुच सार्थक है तो मुझे उसके बारे में अवश्य बताना। क्या केवल एक विशेष प्रकार की हवा ही उसमें प्रचंड भँवर उत्पन्न करती है या फिर हर तेज़ झोंका समुद्र को उसी प्रकार आंदोलित कर देता है? क्या यह बात सच है कि जलडमरूमध्य में जो भी वस्तु उस भँवर में खिंच जाती है, वह कई मील तक समुद्र के भीतर बहती रहती है और फिर अंततः ताओरमिना (Taormina) के तट के निकट जाकर पुनः जल की सतह पर दिखाई देती है?


By Paul Klee

    यदि तुम इन बातों के बारे में मुझे लिखोगे तो मेरी अगली प्रार्थना कुछ साहसपूर्ण होगी। मेरे सम्मान में एटना (Etna) पर्वत पर भी चढ़ जाना। कुछ लोगों का कहना है कि उस पर्वत की चोटी भीतर-ही-भीतर क्षीण होती जा रही है और उसकी ऊँचाई धीरे-धीरे कम हो रही है। वे यह निष्कर्ष इस आधार पर निकालते हैं कि पहले वह समुद्र में बहुत अधिक दूरी से दिखाई देती थी। किन्तु इसका कारण यह भी हो सकता है कि उसकी ऊँचाई कम नहीं हुई है बल्कि उसकी अग्नि पहले की अपेक्षा मंद पड़ गई है। अब वह उतनी प्रचंडता और उतनी मात्रा में लावा तथा धुआँ नहीं उगलती जितना पहले उगलती थी। इन दोनों में से कोई भी व्याख्या असंगत नहीं है। यह संभव है कि पर्वत वास्तव में प्रतिदिन भीतर-ही-भीतर जलकर धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा हो। परन्तु यह भी उतना ही संभव है कि उसका आकार वैसा ही बना हुआ हो, क्योंकि अग्नि स्वयं पर्वत को नहीं जलाती बल्कि पृथ्वी की गहराइयों में स्थित किसी गुहा से ऊपर उठती है। उस स्थिति में पर्वत की चोटी अग्नि का स्रोत नहीं बल्कि केवल उसके बाहर निकलने का मार्ग है। लिसिया (Lycia) में एक प्रसिद्ध स्थान है, जिसे वहाँ के निवासी हेफैस्टियन (Hephaestion) कहते हैं। वहाँ भूमि में अनेक छिद्र हैं, जिनके चारों ओर ऐसी ज्वालाएँ जलती रहती हैं जो बिल्कुल हानिरहित हैं और आस-पास की वनस्पति को कोई क्षति नहीं पहुँचातीं। वह क्षेत्र घास से आच्छादित और अत्यन्त उपजाऊ है क्योंकि वे ज्वालाएँ किसी वस्तु को जलाती नहीं हैं। वे केवल एक ही स्थान पर शांत भाव से टिमटिमाती रहती हैं। किन्तु इन प्रश्नों पर विचार हम तब करेंगे, जब तुम पहले उन अन्य बातों के विषय में मुझे लिख चुके हो। यह भी बताना कि ज्वालामुखी के मुख (क्रेटर) से हिमाच्छादित क्षेत्रों की दूरी कितनी है। वे हिमखंड गर्मी से भली-भाँति सुरक्षित रहते हैं, यहाँ तक कि ग्रीष्म ऋतु में भी वे नहीं पिघलते।

    नहीं, इस परिश्रम का श्रेय मेरे आग्रह को मत दो। तुम्हारी जो उत्सुक अवस्था है, उसमें तुम यह कार्य वैसे भी करते, चाहे किसी ने तुमसे इसका अनुरोध किया होता या नहीं। मुझे कितना मूल्य चुकाना पड़े कि तुम अपनी कविता में एटना पर्वत का उल्लेख न करो, उस एटना का, जो प्रत्येक कवि के लिए एक पवित्र और प्रिय विषय रहा है! क्या ओविड ने केवल इसलिए उसके बारे में लिखना छोड़ दिया था कि वर्जिल पहले ही उस पर लिख चुका था या कॉर्नेलियस सेवेरुस उन दोनों के कारण उससे विमुख हो गया था? वास्तव में, यह ऐसा विषय है जो सभी के लिए समान रूप से उपजाऊ है। मेरा विचार है कि पहले के लेखकों ने इसकी संभावनाओं को समाप्त नहीं किया है बल्कि उन्होंने तो केवल आगे आने वालों के लिए मार्ग खोल दिया है। किसी ऐसे विषय को अपनाने में, जो पूरी तरह समाप्त हो चुका हो। ऐसे विषय को अपनाने में, जिस पर पहले भी लिखा जा चुका हो, बहुत अंतर है। एक विषय समय के साथ और अधिक समृद्ध होता जाता है। किसी की मौलिक कल्पना इस कारण समाप्त नहीं हो जाती कि उस विषय पर पहले भी किसी ने लिखा है। फिर, जो सबसे बाद में आता है, उसे एक विशेष लाभ भी प्राप्त होता है। शब्द तो उसके सामने पहले से ही उपस्थित रहते हैं, किन्तु उनका नया विन्यास उन्हें एक नया रूप और ताज़गी प्रदान कर देता है। ऐसा भी नहीं कि वह किसी और की संपत्ति का उपयोग कर रहा हो, भाषा तो सबकी साझा धरोहर है। यदि मैं तुम्हें ठीक से जानता हूँ तो तुम इस समय एटना के विषय में लिखने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो और ऐसी कोई महान रचना करना चाहते हो जो तुम्हारे पूर्ववर्ती कवियों की कृतियों के समकक्ष हो। तुम्हारी विनम्रता तुम्हें यह आशा करने की अनुमति नहीं देती कि तुम उनसे आगे निकल जाओगे। तुम्हारे मन में अपने पूर्वजों के प्रति इतना सम्मान है कि यदि उन्हें पराजित करने का अवसर भी तुम्हारे सामने आए तो मेरा विश्वास है कि तुम अपनी प्रतिभा को ही संयमित कर लोगे।

    बुद्धिमत्ता का एक गुण यह है कि उसके मार्ग पर चढ़ते समय ही कोई व्यक्ति दूसरे से पीछे या आगे हो सकता है। परन्तु जब कोई उस शिखर तक पहुँच जाता है, तब सब एक ही स्तर पर होते हैं। वहाँ आगे बढ़ने के लिए कोई स्थान नहीं रहता। वही अंतिम सीमा है। क्या सूर्य अपने निश्चित आकार से अधिक बड़ा हो जाता है? क्या चन्द्रमा पूर्णिमा के बाद उससे भी अधिक बढ़ता है? क्या समुद्र का जल अपने निर्धारित स्तर से ऊपर उठ जाता है? नहीं, संसार अपनी निश्चित आकृति और व्यवस्था को बनाए रखता है। इसी प्रकार, जो वस्तु अपनी पूर्णता को प्राप्त कर चुकी है, वह स्वयं से अधिक नहीं हो सकती। इसलिए जो भी व्यक्ति बुद्धिमान बन जाता है, वह अन्य सभी बुद्धिमानों के समान स्तर पर होता है। हाँ, प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने विशिष्ट गुण हो सकते हैं। कोई अधिक सौम्य स्वभाव का होगा, कोई अधिक तीव्र बुद्धि का, कोई भाषण देने में अधिक प्रभावशाली होगा तो कोई अभिव्यक्ति में अधिक सुरुचिपूर्ण। किन्तु जहाँ तक उनके सुख के मूल स्रोत का प्रश्न है, वह सबमें समान होता है। एटना पर्वत कभी अपने ही भीतर ध्वस्त हो जाएगा या नहीं अथवा उसकी वह ऊँची चोटी, जो समुद्र में बहुत दूर से दिखाई देती है, अपनी निरंतर जलती हुई अग्नि के कारण धीरे-धीरे छोटी होती जा रही है या नहीं—यह मैं नहीं जानता। किन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि कोई भी अग्नि और कोई भी विनाश सद्गुण की महान और उदात्त प्रकृति को कभी नष्ट नहीं कर सकता। यही एक ऐसी महानता है, जिसमें कभी कोई कमी नहीं आती। उसे न बढ़ाया जा सकता है और न घटाया जा सकता है। उसकी महत्ता सदा स्थिर रहती है, ठीक उसी प्रकार जैसे आकाशीय पिंडों का निश्चित आकार और स्थान स्थिर रहता है।

    आओ, हम भी उस अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करें। हमारा बहुत-सा कार्य पहले ही पूरा हो चुका है। पर यदि सच कहा जाए तो वास्तव में इतना भी नहीं। केवल सबसे बुरे लोगों से बेहतर होना, अच्छा होना नहीं है।क्या कोई मनुष्य केवल इसलिए अपनी दृष्टि पर गर्व करता है कि वह इतना देख सकता है कि अभी दिन है? जब तेज़ सूर्य का प्रकाश उसकी धुँधली दृष्टि को चीरकर भीतर पहुँचता है तो उसे कुछ समय के लिए अंधकार से मुक्ति मिलने का संतोष अवश्य होता है किन्तु वह अभी भी उस प्रकाश का वास्तविक लाभ नहीं उठा रहा होता।हमें भी अपने ऊपर प्रसन्न होने का कोई कारण तब तक नहीं है, जब तक हम अज्ञान और अंधकार में भटकते रहना पूरी तरह छोड़ न दें। हमारा मन ऐसी अवस्था तक न पहुँच जाए जहाँ वह प्रकाश की ओर आँखें मिचमिचाकर न देखे बल्कि दिन के उजाले को पूर्ण रूप से निहार सके। जहाँ वह उस स्वर्गलोक में लौट सके, जहाँ से उसका उद्भव हुआ था और उस स्थान को पुनः प्राप्त कर सके, जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।उसकी उत्पत्ति ही उसे ऊपर की ओर बुलाती है। यह शरीर रूपी कारागार से पूर्णतः मुक्त होने से पहले भी वहाँ पहुँच सकता है। जैसे ही वह अपने सभी दोषों को त्याग देता है और शुद्ध तथा हल्का होकर दैवी सत्य के चिंतन की ओर ऊपर उठ जाता है।

    प्रिय लूसीलियस, मुझे यह देखकर कितना आनंद हो रहा है कि हम यह साधना कर रहे हैं कि हम अपनी पूरी शक्ति के साथ इसी मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं, चाहे बहुत कम लोग इसके बारे में जानें या फिर कोई भी न जाने।यश तो सद्गुण की छाया है। वह सद्गुण के साथ-साथ चलता है, तब भी जब उसे चाहा न गया हो। किन्तु जैसे छाया कभी आगे चलती है और कभी पीछे, वैसे ही यश का भी स्वभाव है। कभी वह पहले ही प्रकट होकर सबकी दृष्टि में आ जाता है। कभी बाद में आता है। पर तब, जब ईर्ष्या समाप्त हो चुकी होती है, उसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। डेमॉक्रिटस को कितने लंबे समय तक लोग पागल समझते रहे! सुकरात कितनी कठिनाई से विस्मृति में खो जाने से बच सके! कैटो कितने वर्षों तक अपने ही देशवासियों के लिए अपरिचित बने रहे! उनके देश ने उन्हें अस्वीकार कर दिया और उन्हें तब तक नहीं समझा, जब तक उन्हें खो नहीं दिया।रूटिलियस की निष्कलंकता और साहस भी कभी प्रकट न हो पाते, यदि उनके साथ अन्याय न हुआ होता। उसी अन्याय ने उन्हें एक प्रकाशस्तंभ बना दिया। निश्चय ही उन्हें इस बात के लिए भाग्य का आभारी होना चाहिए था कि उन्हें निर्वासन में भी अपने जीवन को गरिमा के साथ अपनाने का अवसर मिला।

    मैं अब तक उन लोगों की चर्चा कर रहा था, जिन्हें विपत्ति ने प्रसिद्धि प्रदान की। किन्तु अनेक ऐसे भी हुए हैं, जिनकी नैतिक उन्नति और महानता का मूल्यांकन लोगों ने उनके निधन के बाद ही किया। कितने ही ऐसे हैं, जिन्हें यश ने प्रसिद्ध नहीं किया बल्कि मानो उनकी मृत्यु के बाद उन्हें विस्मृति से निकालकर संसार के सामने प्रस्तुत किया। एपिक्यूरस को ही देखो। आज केवल विद्वान ही नहीं बल्कि सामान्य और अशिक्षित लोग भी उनका आदर करते हैं। किन्तु जब वे जीवित थे, तब एथेंस के निकट रहकर एकांत जीवन बिताने के कारण स्वयं एथेंस में भी लोग उन्हें लगभग नहीं जानते थे। इसी कारण अपने एक पत्र में, जिसमें उन्होंने कई वर्ष पहले दिवंगत हो चुके अपने मित्र मेट्रोडोरस के साथ की मित्रता को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण किया है, अंत में वे लिखते हैं कि इतने महान सौभाग्य के बीच भी उन्हें और मेट्रोडोरस को इस बात से कभी कोई हानि नहीं हुई कि प्रसिद्ध यूनान ने न केवल उन्हें पहचानने की उपेक्षा की बल्कि शायद ही कभी उनके बारे में सुना भी था। निश्चय ही, उनकी वास्तविक पहचान उनके निधन के बाद ही हुई और तभी उनकी कीर्ति वास्तव में उज्ज्वल और व्यापक बनी। मेट्रोडोरस भी अपने एक पत्र में स्वीकार करते हैं कि वे स्वयं और एपिक्यूरस अपने समय में बहुत अधिक प्रसिद्ध नहीं थे। फिर भी वे कहते हैं कि जो लोग उनके पदचिह्नों पर चलने के इच्छुक होंगे, उनके लिए महान यश पहले से ही सुरक्षित रहेगा।

    सद्गुण का कोई भी उदाहरण सदा के लिए छिपा नहीं रह सकता। यदि वह कुछ समय तक लोगों की दृष्टि से ओझल भी रहे तो उससे उसकी महत्ता में कोई कमी नहीं आती। चाहे वह कुछ समय के लिए विस्मृति में दबा रहे या अपने ही युग के लोगों की ईर्ष्या और द्वेष के कारण उपेक्षित कर दिया जाए, फिर भी एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब वही उसे प्रसिद्धि प्रदान करेगा। जो मनुष्य केवल अपने समकालीन लोगों की स्वीकृति की चिंता करता है, वह मानो केवल कुछ ही वर्षों के लिए जन्मा है। अभी आने वाले समय में हजारों वर्ष हैं और असंख्य पीढ़ियाँ आएँगी। इसलिए अपनी दृष्टि उनकी ओर भी रखो। यदि तुम्हारे समय के सभी लोग ईर्ष्या के कारण मौन रहें तो भी आगे चलकर ऐसे लोग अवश्य आएँगे जो बिना किसी द्वेष और बिना किसी पक्षपात के तुम्हारे गुणों का न्याय करेंगे। यदि यश सद्गुण का कोई प्रतिफल है तो वह प्रतिफल कभी नष्ट नहीं होता। यह सत्य है कि आने वाली पीढ़ियों की प्रशंसा हमारे कानों तक नहीं पहुँचेगी। फिर भी वह प्रशंसा, हमारी जानकारी के बिना ही, हमारी महानता के साथ जुड़ी रहेगी।

    जीवन में हो या मृत्यु के बाद, सद्गुण का सच्चे मन से किया गया अनुसरण कभी निष्फल नहीं जाता। परन्तु यह अनुसरण केवल बाहरी दिखावे का नहीं होना चाहिए न केश-सज्जा और आडंबर का बल्कि ऐसे चरित्र का होना चाहिए जो अचानक आने वाले व्यक्ति के सामने भी वैसा ही रहे जैसा किसी पूर्व-निश्चित अवसर पर होता है। दिखावा किसी काम नहीं आता। केवल ऊपर से रंगे-पुते चेहरे से बहुत कम लोग लंबे समय तक धोखा खाते हैं। मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी अंतरात्मा की गहराइयों तक पहुँचता है और अंततः प्रकट हो ही जाता है। छल-कपट में कोई स्थायित्व नहीं होता। झूठ अत्यंत कमजोर और नाजुक चीज़ है। उसे यदि ध्यान से परखा जाए, तो वह आर-पार दिखाई देने लगता है।

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अंतरात्मा के संदर्भ में -- पत्र - 77

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