Thursday, 23 July 2026

मद्यपान के बारे में -- पत्र - 81

 प्रिय लूसीलियस 


तुम मुझसे कहते हो कि मैं अपने प्रत्येक दिन का आरंभ से अंत तक का पूरा विवरण तुम्हें दूँ। निश्चय ही तुम मेरे बारे में बहुत अच्छा सोचते हो, यदि तुम्हें यह विश्वास है कि मेरे जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे मैं तुमसे छिपाना चाहूँ। वास्तव में हमारा जीवन ऐसा ही होना चाहिए, मानो हम सदैव दूसरों की दृष्टि के सामने जी रहे हों। यहाँ तक कि हमारे विचार भी ऐसे होने चाहिएँ, जैसे कोई हमारे हृदय के सबसे गुप्त कोनों में झाँक सकता हो। वास्तव में ऐसा एक है, जो ऐसा कर सकता है। मनुष्यों से कोई बात छिपाने का क्या लाभ? ईश्वर से कुछ भी छिपा नहीं है। ईश्वर हमारे मन में निवास करते हैं। वे हमारे प्रत्येक विचार के मध्य उपस्थित रहते हैं। मैं कहता हूँ कि वे प्रवेश करते हैं, मानो वे कभी वहाँ से गए ही हों!


By Marilyn Dunlap

    इसलिए मैं तुम्हारी सलाह का पालन करूँगा और प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें लिखूँगा कि मैं क्या-क्या करता हूँ। वह भी क्रमबद्ध ढंग से। मैं तुरंत स्वयं का निरीक्षण करूँगा और अपने पूरे दिन का परीक्षण करूँगा। यह वास्तव में अत्यंत उपयोगी अभ्यास है। हमारे पतन का सबसे बड़ा कारण यह है कि हम अपने जीवन पर पीछे मुड़कर कभी दृष्टि नहीं डालते। हम यह सोचते रहते हैं कि आगे क्या करना है (हालाँकि उतना भी नहीं जितना करना चाहिए) परन्तु यह कभी नहीं सोचते कि हमने अब तक क्या किया है। जबकि भविष्य की योजनाएँ तो अतीत के अनुभवों और आत्मचिंतन पर ही आधारित होती हैं।

    आज का पूरा दिन एक ठोस और अविभाजित समय-खंड की तरह बीता। किसी ने मेरा समय मुझसे नहीं छीना। पूरा दिन केवल विश्राम और अध्ययन में बँटा रहा। उसका केवल थोड़ा-सा भाग शारीरिक व्यायाम में लगाया। इसके लिए मैं अपनी वृद्धावस्था का आभारी हूँ क्योंकि अब मुझे बहुत कम परिश्रम करना पड़ता है। जैसे ही मैं शरीर को थोड़ा-सा चलाता हूँ, थक जाता हूँ। पर यही तो व्यायाम का उद्देश्य है, यहाँ तक कि सबसे बलवान व्यक्ति के लिए भी। क्या तुम मेरी दिनचर्या के बारे में जानना चाहोगे? मेरे लिए एक ही प्रशिक्षक पर्याप्त है। उसका नाम फैरीयस है। जैसा कि तुम जानते हो, वह अभी एक छोटा-सा बालक है और अत्यंत प्रिय भी। लेकिन अब मुझे उसे बदलना पड़ेगा। मैं उससे भी छोटे किसी लड़के की तलाश में हूँ। वह मज़ाक में कहता है कि हम दोनों जीवन के एक ही पड़ाव पर हैं। हम दोनों के दाँत गिर रहे हैं! किंतु अब तो दौड़ते समय मैं मुश्किल से उसका साथ दे पाता हूँ और कुछ ही दिनों में बिल्कुल भी नहीं दे सकूँगा। देखो, प्रतिदिन का व्यायाम मेरे साथ क्या कर रहा है! जब दो व्यक्ति विपरीत दिशाओं में चल रहे हों तो उनके बीच की दूरी बहुत तेजी से बढ़ जाती है। वह ऊपर चढ़ रहा है जबकि मैं नीचे उतर रहा हूँ। तुम भली-भाँति जानते हो कि नीचे उतरना कहीं अधिक तेज़ी से होता है। नहीं, मैंने ठीक नहीं कहा। हमारी आयु का यह चरण केवल ढलान नहीं है बल्कि मानो मुक्त पतन (Free Fall) है। 

    लेकिन क्या तुम जानना चाहोगे कि आज हमारी दौड़ का परिणाम क्या रहा? ऐसा हुआ जो दौड़ में बहुत कम होता है। हम दोनों बराबरी पर रहे। इस थोड़ी-सी दौड़-भाग के बाद (जिसे वास्तव में व्यायाम कहना भी कठिन है) मैं ठंडे पानी से स्नान करने गया। हालाँकि यहाँ 'ठंडा' शब्द से मेरा अर्थ उस पानी से है जो बस थोड़ा-सा गुनगुना हो। एक समय था जब मैं सचमुच ठंडे पानी से स्नान करने का बड़ा शौकीन था! वर्ष के पहले दिन अर्थात पहली जनवरी को मैं नहर (Canal) पर जाकर मानो उसे अपना प्रणाम अर्पित करता था। जिस प्रकार उस दिन कुछ पढ़ना, लिखना या कोई सार्थक बात कहना मेरी परंपरा थी उसी प्रकार मेडेन (जलस्रोत) में डुबकी लगाकर नए वर्ष का स्वागत करना भी मेरा एक नियमित अनुष्ठान था। लेकिन बाद में मैंने अपना 'पड़ाव' बदल लिया। पहले टाइबर नदी पर और अब इस स्नान-टब तक। यहाँ भी, जब मैं अपने को सबसे अधिक साहसी महसूस करता हूँ और स्वास्थ्य के सभी संकेत अनुकूल होते हैं, तब भी पानी केवल सूर्य की गर्मी से ही थोड़ा-सा गरम किया जाता है। अब तो मुझसे सचमुच ठंडे पानी से स्नान भी मुश्किल से हो पाता है। 

    इसके बाद मैं सूखी रोटी खाता हूँ। ऐसा भोजन जिसके लिए मेज़ की भी आवश्यकता नहीं पड़ती और जिसके बाद हाथ धोने की भी जरूरत नहीं होती। मैं बहुत कम सोता हूँ। तुम मेरी आदतों से परिचित हो। मैं केवल एक बहुत ही छोटी-सी झपकी लेता हूँ, मानो किसी खच्चरों के जत्थे की राह में मिलने वाले क्षणिक विश्राम की तरह। मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है कि कुछ क्षणों के लिए आँख लग जाए। कभी मुझे निश्चित रूप से पता होता है कि मैं सो गया था और कभी केवल अनुमान ही लगाता हूँ कि शायद थोड़ी देर के लिए नींद आ गई थी।

    सुनो, तुम रथ-दौड़ (रेस) देखने के लिए एकत्र हुई भीड़ का शोर सुन सकते हो। अचानक उठने वाली सामूहिक पुकार हर ओर से मेरे कानों पर आघात करती है, फिर भी मेरे विचार बिना किसी व्यवधान के अपनी गति से चलते रहते हैं। उनका क्रम तनिक भी नहीं टूटता। उस भीड़ का कोलाहल मुझे बिल्कुल विचलित नहीं करता। अनेक लोगों की मिली-जुली आवाज़ें मेरे लिए समुद्र के तट पर उठती लहरों की गूँज, पेड़ों के बीच बहती हवा की सरसराहट या किसी अन्य ऐसे स्वर के समान हैं, जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं होता।

    क्या... फिर, मेरे मन को किस बात ने व्यस्त रखा है? मैं तुम्हें बताता हूँ। कल के चिंतन ने मुझे यह सोचने पर विवश कर दिया कि कुछ अत्यंत बुद्धिमान लोगों ने महत्वपूर्ण बातों को सिद्ध करने के लिए इतने तुच्छ और उलझाऊ तर्कों का सहारा क्यों लिया। यदि उनकी बातें सत्य भी हों तो भी उनके तर्क सत्य से अधिक असत्य जैसे प्रतीत होते हैं। ज़ेनो, जो महानतम व्यक्तियों में से एक थे और हमारे अत्यंत साहसी तथा अत्यंत संयमी स्टोइक दर्शन के संस्थापक थे, हमें मद्यपान से दूर रहने की शिक्षा देना चाहते हैं। सुनो, वे यह सिद्ध करने का प्रयास कैसे करते हैं कि एक सद्गुणी व्यक्ति मद्यपान नहीं करेगा—

जो व्यक्ति नशे में होता है, उसे कोई अपना रहस्य नहीं सौंपता।
परंतु एक सद्गुणी व्यक्ति को लोग अपना रहस्य सौंपते हैं।
अतः सद्गुणी व्यक्ति नशे में नहीं होगा।

इस प्रकार के तर्क का मज़ाक उड़ाते हुए कोई ठीक इसी शैली में इसका उलटा निष्कर्ष भी सिद्ध कर सकता है। उदाहरण के लिए—

जो व्यक्ति सो रहा हो, उसे कोई अपना रहस्य नहीं सौंपता।
परंतु एक सद्गुणी व्यक्ति को लोग अपना रहस्य सौंपते हैं।
अतः सद्गुणी व्यक्ति सोता ही नहीं।

पोसिडोनियस हमारे गुरु ज़ेनो के पक्ष का जितना संभव हो सकता है, उतना बचाव करते हैं। यद्यपि तब भी मुझे उनका पक्ष टिकाऊ नहीं लगता। उनका कहना है कि 'मदहोश' (drunk) शब्द के दो अर्थ हैं। पहला, वह व्यक्ति जो शराब से इतना भर गया हो कि अपने ऊपर उसका नियंत्रण न रहे। दूसरा, वह व्यक्ति जिसे बार-बार नशे में धुत होने की आदत हो और जो इस दोष का अभ्यस्त हो। उनके अनुसार ज़ेनो का आशय दूसरे अर्थ से है। उस व्यक्ति से जिसे नशे की आदत है, न कि उस व्यक्ति से जो इस समय नशे में है। यही वह व्यक्ति है जिसे कोई अपना रहस्य नहीं सौंपेगा क्योंकि वह शराब पीते समय उसे उगल सकता है। 

    लेकिन यह बात असत्य है। पहला तर्क उस व्यक्ति की बात करता है जो इस समय नशे में है, न कि उस व्यक्ति की जो भविष्य में कभी नशे में होगा। आप स्वयं मानेंगे कि नशे में होने वाले व्यक्ति और शराबी में बहुत बड़ा अंतर है। कोई व्यक्ति पहली ही बार शराब पीकर नशे में हो सकता है, बिना यह आदत विकसित किए। दूसरी ओर, जिसे शराब पीने की आदत है, वह भी कभी-कभी पूरी तरह होश में हो सकता है। इसलिए मैं इस शब्द का वही सामान्य अर्थ ग्रहण करता हूँ जिसमें इसका प्रचलित प्रयोग होता है, विशेषकर इसलिए कि इसका प्रयोग ऐसा व्यक्ति कर रहा है जो शब्दों के प्रयोग में अत्यंत शुद्धता का दावा करता है और उनके अर्थों की सूक्ष्म जाँच करता है। इसके अतिरिक्त, यदि ज़ेनो स्वयं इस शब्द को एक अर्थ में समझते थे, लेकिन चाहते थे कि हम उसे दूसरे अर्थ में लें तो उन्होंने एक शब्द की द्विअर्थता को छल का साधन बनाया। सत्य की खोज करने वाले को ऐसा नहीं करना चाहिए। लेकिन मान लीजिए कि उनका अभिप्राय वास्तव में यही था। तब भी यह निष्कर्ष असत्य है कि जिस व्यक्ति को शराब पीने की आदत हो, उसे कोई अपना रहस्य नहीं सौंपता। सोचिए, कितने सैनिकों को ऐसी गोपनीय बातें सौंपी जाती हैं जिन्हें उनके सेनापति, ट्रिब्यून और सेंचुरियन गुप्त रखना चाहते हैं। फिर भी सैनिक संयम और मद्यत्याग के आदर्श नहीं माने जाते। सीज़र की हत्या की योजना (मेरा आशय उस सीज़र से है जो पोम्पेई की पराजय के बाद सत्ता में आया था) टिलियस किम्बर और कैसियस, दोनों को बताई गई थी। कैसियस ने जीवन भर केवल पानी पिया जबकि टिलियस किम्बर शराब का ऐसा दीवाना था कि वह अक्सर नशे में डूबा रहता था और उपद्रवी भी था। वह स्वयं इस विषय पर मज़ाक किया करता था। उसने कहा था, "मैं लोगों के प्रति सहनशील कैसे हो सकता हूँ, जब मैं शराब तक के प्रति सहनशील नहीं हूँ?"

    हममें से प्रत्येक ऐसे लोगों के नाम बता सकता है जिन पर शराब के मामले में भरोसा नहीं किया जा सकता लेकिन जिन पर कोई अपना रहस्य निस्संकोच सौंप सकता है। मैं केवल एक उदाहरण सुनाऊँगा, जो इस समय मुझे याद आ रहा है ताकि वह भुलाया न जाए। जीवन में ऐसे उदाहरणों का पर्याप्त संग्रह होना चाहिए ताकि हमें हर बार केवल पुराने उदाहरणों पर ही निर्भर न रहना पड़े। शहर की प्रहरी-सेना (सिटी वॉच) के प्रमुख लूसियस पिसो एक बार इतने नशे में धुत हुए कि उसके बाद यह उनकी लगभग स्थायी अवस्था बन गई। वे अधिकांश रातें दावतों और मद्यपान में बिताते थे, फिर दोपहर तक सोते रहते। उनके लिए तो दोपहर ही दिन का आरंभ थी। फिर भी, वे अपने उन कर्तव्यों का अत्यंत सावधानी से पालन करते थे जिन पर रोम की सुरक्षा निर्भर करती थी। 

    दैवी ऑगस्टस ने जब उन्हें थ्रेस के अभियान का नेतृत्व सौंपा जिसे उन्होंने जीत लिया, तब अपनी गोपनीय योजनाएँ भी उन्हीं के विश्वास पर सौंपीं। बाद में टाइबेरियस ने भी, जब वह कैम्पानिया के लिए रवाना हो रहा था और रोम में अपने पीछे बहुत-सी नाराज़गियाँ तथा संदेह के अनेक कारण छोड़ रहा था, अपनी गुप्त बातें पिसो के भरोसे छोड़ दीं। मेरा विश्वास है कि पिसो की मद्यप्रियता के बावजूद उसके इतने अच्छे परिणाम देखने के कारण ही टाइबेरियस ने बाद में कोसस को नगर-प्रमुख (अर्बन प्रीफेक्ट) नियुक्त किया। कोसस एक गंभीर और अनुशासित व्यक्ति था लेकिन शराब में इतना डूबा रहता था कि एक बार वह सीधे किसी दावत से सीनेट पहुँचा और वहीं सो गया। उसे जगाया नहीं जा सका इसलिए अंततः उसे उठाकर बाहर ले जाना पड़ा। फिर भी, टाइबेरियस ऐसे मामलों में, जिन्हें वह अपने सबसे निकट के सलाहकारों तक पर प्रकट करने का साहस नहीं करता था, स्वयं अपने हाथ से कोसस को पत्र लिखता था। और कोसस ने कभी भी किसी सार्वजनिक या निजी रहस्य को उजागर नहीं किया।

    तो आइए, इन पुराने घिसे-पिटे तर्कों को छोड़ दें। "शराब से बाधित मन अपने नियंत्रण में नहीं रहता। जैसे कच्ची मिट्टी के घड़े, जब उनमें नया अंगूरी रस (मस्ट) भरा होता है, फरमेंटेशन की प्रक्रिया की गर्मी के कारण फटने लगते हैं और उनके भीतर की सारी सामग्री बाहर निकल पड़ती है। उसी प्रकार जब अत्यधिक मात्रा में शराब भीतर प्रवाहित होकर नशा उत्पन्न करती है तो मन में जो कुछ भी छिपा होता है, वह सब खुले रूप में बाहर आ जाता है। जैसे अत्यधिक शराब पी लेने वाले लोग अपना भोजन पेट में नहीं रोक पाते क्योंकि शराब उसे ऊपर उगलवा देती है, वैसे ही वे किसी रहस्य को भी अपने भीतर नहीं रख पाते। वे अपने और दूसरों, दोनों के रहस्य उगल देते हैं।" हाँ, ऐसा अक्सर होता है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि आवश्यकता पड़ने पर हम ऐसे लोगों से भी सलाह-मशविरा करते हैं जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे खुलकर शराब पीते हैं। यही तथ्य ज़ेनो के बचाव में दिए जाने वाले उस घिसे-पिटे तर्क का खंडन कर देता है कि कोई भी व्यक्ति शराब पीने का अभ्यस्त व्यक्ति को अपना रहस्य नहीं सौंपता।

    इससे कहीं बेहतर है कि मद्यपान की बुराई पर सीधे आक्रमण किया जाए और उसके दोषों को उजागर किया जाए। एक साधारण सज्जन व्यक्ति भी इन दोषों से बचने का प्रयास करेगा। पूर्णतः बुद्धिमान व्यक्ति तो और भी अधिक। बुद्धिमान व्यक्ति की प्यास बुझ जाने पर वह संतुष्ट हो जाता है। यदि कभी दूसरों की प्रसन्नता के लिए वह कुछ अधिक पी भी ले, तो भी वह नशे की अवस्था तक नहीं पहुँचता। यह प्रश्न कि क्या अत्यधिक शराब पी लेने पर बुद्धिमान व्यक्ति का मन प्रभावित होता है और क्या वह तब वैसा ही व्यवहार करता है जैसा सामान्यतः नशे में लोग करते हैं, इस पर हम किसी और समय विचार कर सकते हैं। फिलहाल, यदि तुम यह सिद्ध करना चाहते हो कि एक अच्छा मनुष्य नशे में धुत नहीं होना चाहिए तो फिर तर्कशास्त्रीय न्यायों (सिलोज़िज़्म) का सहारा क्यों लेते हो? सीधे-सीधे यह कहो कि किसी व्यक्ति का अपनी क्षमता से अधिक शराब पीना कितना लज्जाजनक है। इतना कि उसे अपने ही पेट की सीमा का ज्ञान न रहे। यह भी बताओ कि नशे की अवस्था में लोग कितने ऐसे काम कर बैठते हैं जिनके लिए होश में आने पर उन्हें स्वयं लज्जा महसूस होती है। कहो कि मदहोशी वास्तव में स्वेच्छा से अपनाया गया पागलपन है। यदि कल्पना करो कि किसी व्यक्ति की यह नशे की अवस्था कई दिनों तक बनी रहे तो क्या तुम उसे पागल कहने में संकोच करोगे? इसलिए, वर्तमान रूप में भी मदहोशी पागलपन का कोई छोटा रूप नहीं है। अंतर केवल इतना है कि यह कम समय तक रहने वाला पागलपन है।

    मकदूनिया के सिकंदर का उदाहरण याद कीजिए। उसने एक भोज के दौरान अपने सबसे प्रिय और सबसे निष्ठावान मित्र क्लाइटस को भाले से भेद डाला। जब उसे अपने किए का बोध हुआ तो वह मर जाना चाहता था और निस्संदेह, वही उसके योग्य भी था। मदिरापान हर दोष को भड़का देता है और उन्हें उजागर भी कर देता है क्योंकि यह उस लज्जा-बोध को नष्ट कर देता है जो हमारी सबसे बुरी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाए रखता है। वास्तव में, अधिकतर लोग अपने सद्भाव या नैतिक संकल्प के कारण नहीं बल्कि बुरे काम करने पर होने वाली बदनामी के भय से रुकते हैं। जब अत्यधिक शराब मन पर पूरी तरह अधिकार कर लेती है, तब जो भी दोष भीतर छिपे होते हैं, वे बाहर आ जाते हैं। मदिरापान दोषों को उत्पन्न नहीं करता बल्कि पहले से मौजूद दोषों को प्रकट कर देता है। तभी कामुक व्यक्ति शयनकक्ष तक पहुँचने की भी प्रतीक्षा नहीं करता बल्कि अपनी वासनाओं को तत्काल पूरा करने लगता है। तभी निर्लज्ज व्यक्ति अपनी नैतिक दुर्बलता को स्वीकार ही नहीं करता बल्कि उसका घमंड भी करता है। तभी झगड़ालू व्यक्ति न अपनी ज़बान पर नियंत्रण रखता है और न अपने हाथों पर। असभ्य व्यक्ति का अहंकार और अधिक बढ़ जाता है। क्रूर स्वभाव वाले की निर्दयता और भी तीव्र हो जाती है तथा द्वेषपूर्ण व्यक्ति की दुष्टता और अधिक खुलकर सामने आ जाती है। हर दोष को खुली छूट मिल जाती है। हर दोष सबके सामने प्रकट हो जाता है।

    साथ ही आत्म-जागरूकता के लोप का भी उल्लेख करो। लड़खड़ाती और अस्पष्ट वाणी, धुंधली दृष्टि, अस्थिर चाल, चक्कर आना, ऐसा प्रतीत होना मानो पूरी छत घूम रही हो और पूरा घर किसी बवंडर में फँस गया हो तथा पेट की वे पीड़ाएँ, जब शराब भीतर उबलती है और उदर में सूजन तथा भारीपन उत्पन्न करती है। फिर भी, जब तक नशे का प्रभाव बना रहता है, तब तक ये सब किसी तरह सहन किए जा सकते हैं। लेकिन उसके बाद क्या होता है, जब नींद उस शराब को बिगाड़ देती है और नशा अपच में बदल जाता है?

    विचार करो कि मानव इतिहास में मदिरापान ने कितनी भयानक घटनाओं को जन्म दिया है। उसने ऐसे अनेक उग्र योद्धा समुदायों को उनके शत्रुओं के हाथों धोखा दिलवाया है। उसने उन दुर्गों की प्राचीरें भी तुड़वा दी हैं जो लंबे समय तक अभेद्य बनी रहीं। जिन लोगों का स्वतंत्रता-प्रेम इतना प्रबल था कि वे कभी किसी का जुआ स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए, उन्हें भी मदिरापान ने विदेशी शासन के अधीन होने के लिए विवश कर दिया। जो लोग युद्धभूमि में कभी पराजित नहीं हुए, वे शराब के हाथों हार गए। मैं पहले ही सिकंदर का उल्लेख कर चुका हूँ। वह व्यक्ति, जो इतने अभियानों, इतनी लड़ाइयों और इतनी कठोर सर्दियों से सुरक्षित निकल आया था, जिसने जलवायु और दुर्गम भूभाग की हर चुनौती पर विजय प्राप्त की थी, जिसने अज्ञात वन्य प्रदेशों से उतरने वाली असंख्य नदियाँ और दूर-दूर तक फैले समुद्र पार किए थे, वह अंततः संयमहीन मदिरापान से पराजित हुआ। उसका तथाकथित 'हरक्यूलिस का प्याला' उसके लिए मृत्यु का प्याला सिद्ध हुआ।

    शराब अधिक पी लेने की क्षमता पर गर्व करने की आखिर क्या बात है? जब तुम मद्यपान की प्रतियोगिता जीत लेते हो, जब बाकी सब लोग उल्टियाँ कर रहे होते हैं या बेहोश पड़े होते हैं और तुम्हारे साथ जाम टकराने से भी इनकार कर देते हैं, जब उस पूरी दावत में केवल तुम ही अंत तक टिके रहते हो और अपनी अद्भुत क्षमता तथा अनुपम मदिरा-सहनशक्ति से सबको परास्त कर देते हो तब भी अंततः एक साधारण शराब का पीपा तुमसे अधिक सहनशक्ति रखता है और तुम्हें मात दे देता है।

    मार्क एंटनी जैसे उच्च चरित्र और असाधारण प्रतिभा वाले व्यक्ति का पतन किसने किया? क्या वह मदिरापान ही नहीं था जिसने उसे विदेशी रीति-रिवाजों और रोम की परंपराओं के सर्वथा विपरीत दुर्व्यसनों की ओर धकेल दिया? उसके साथ क्लियोपेट्रा के प्रति उसका प्रेम, जिसे शराब ने और भी प्रबल बना दिया। इसी मदिरापान ने उसे राज्य का शत्रु बनाया और उसके विरोधियों से भी अधिक निकृष्ट सिद्ध किया। इसी ने उसे इतना क्रूर बना दिया कि वह भोजन के समय प्रमुख राजनेताओं के कटे हुए सिर अपने सामने मँगवाता था। अपने भव्य भोजों और राजसी वैभव के बीच बैठकर वह उन लोगों के कटे हुए सिरों और चेहरों को निहारता था जिन्हें मृत्युदंड देकर निषिद्ध घोषित किया गया था। शराब से लबालब भरा होने पर भी उसकी रक्त-पिपासा शांत नहीं होती थी; वह और रक्त चाहता था। यदि वह ये अत्याचार होश में रहते हुए करता, तो भी यह अत्यंत निंदनीय होता परंतु यह कि उसने उन्हें पहले से ही नशे में डूबे होने की अवस्था में किया, इससे अधिक असहनीय और क्या हो सकता है?

    सामान्यतः मदिरा के प्रति अत्यधिक आसक्ति अपने साथ क्रूरता भी लेकर आती है क्योंकि इससे मन की स्वस्थता और संतुलन नष्ट हो जाते हैं। जैसे कोई लंबी बीमारी मनुष्य को चिड़चिड़ा, कठिन स्वभाव का और छोटी-सी बात पर भी आहत हो जाने वाला बना देती है, उसी प्रकार लगातार मदिरापान मनुष्य के मन को कठोर और पशुवत् बना देता है। क्योंकि जो लोग बार-बार अपने वास्तविक होश में नहीं रहते, उनमें यह विक्षिप्त अवस्था धीरे-धीरे आदत बन जाती है। परिणामस्वरूप, शराब के प्रभाव में जो दोष उन्होंने अपने भीतर विकसित किए थे, वे बाद में बिना शराब के भी बने रहते हैं और निरंतर बढ़ते रहते हैं।

    अतः अपने भाषण में यह बताओ कि बुद्धिमान व्यक्ति को नशे में क्यों नहीं होना चाहिए। केवल शब्दों से नहीं बल्कि उदाहरणों द्वारा दिखाओ कि मद्यपान कितनी कुरूप और घृणित वस्तु है तथा उसकी माँगें कितनी अविवेकपूर्ण हैं। सबसे सरल उपाय यह सिद्ध करना है कि जब हमारी तथाकथित सुख-भोग की इच्छाएँ अपनी सीमा से बाहर चली जाती हैं, तो वही सुख दंड में बदल जाते हैं। यदि तुम यह सिद्ध करने का प्रयास करोगे कि बुद्धिमान व्यक्ति अत्यधिक मदिरापान से प्रभावित नहीं होता और उसका चरित्र तथा विवेक नशे की अवस्था में भी अडिग बने रहते हैं तो फिर तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि विष पीने से उसकी मृत्यु नहीं होगी, निद्राजनक औषधि उसे सुला नहीं सकेगी, और हेलिबोर (एक तीव्र विरेचक एवं विषैली औषधि) लेने पर उसे न उल्टी होगी और न ही उसके पेट की सामग्री बाहर निकलेगी। लेकिन यदि उसकी चाल लड़खड़ा रही है और उसकी वाणी अस्पष्ट हो गई है तो फिर उसे एक दृष्टि से नशे में और दूसरी दृष्टि से होश में कैसे माना जा सकता है?


 अभी के लिए विदा 

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