प्रिय लूसीलियस
मैं आपको यह पत्र स्किपियो अफ़्रीकानस के विला के भीतर बने एक साधारण निवास से लिख रहा हूँ। यहाँ आकर मैंने उस महान पुरुष की आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की है। उस वेदी के समक्ष भी नमन किया है, जो मुझे प्रतीत होती है कि उसी का समाधि-स्थल भी है। निश्चय ही उसकी आत्मा उसी स्वर्ग में लौट गई है जहाँ से वह आई थी। मैं ऐसा केवल इसलिए नहीं मानता कि उसने महान सेनाओं का नेतृत्व किया था क्योंकि कैम्बाइसीज़ के पास भी विशाल सेनाएँ थीं। वह तो पागल था तथा अपनी उसी पागलपन का लाभ उठाता था बल्कि इसलिए कि उसमें असाधारण आत्मसंयम और अद्वितीय देशभक्ति थी। मेरे विचार में उसका यह गुण अपने देश की रक्षा करते समय जितना प्रशंसनीय था, उससे भी अधिक तब था जब उसने स्वयं अपने देश को छोड़ दिया।
या तो स्किपियो रोम में रह सकता था या फिर रोम स्वतंत्र रह सकता था। दोनों साथ संभव नहीं थे। उसने कहा, “मैं ऐसा कुछ नहीं चाहता जो हमारे कानूनों और परंपराओं को क्षति पहुँचाए। मेरे सभी नागरिक कानून की दृष्टि में समान रहें। हे मेरे देश, मैंने जो सेवा तुम्हारे लिए की है उसका उपयोग करो पर मेरी अनुपस्थिति में। तुम्हारी स्वतंत्रता का कारण मैं हूँ और उसका प्रमाण भी मैं ही बनूँगा। यदि मैं तुम्हारे हित से बड़ा हो गया हूँ तो मैं स्वयं ही यहाँ से चला जाऊँगा।” मैं उसके उस महान आत्मबल की प्रशंसा कैसे न करूँ, जिसके कारण उसने स्वेच्छा से निर्वासन स्वीकार किया और इस प्रकार राज्य का भार हल्का कर दिया? परिस्थितियाँ ऐसी हो गई थीं कि या तो स्वतंत्रता को स्किपियो के साथ अन्याय करना पड़ता या स्किपियो को स्वतंत्रता के साथ। दोनों में से कोई भी उचित नहीं था। इसलिए उसने कानून के आगे सिर झुका दिया और लिटर्नुम चला गया, जिससे राज्य उस पर केवल हैनिबल को निर्वासित करने के लिए ही नहीं बल्कि उसके अपने स्वैच्छिक निर्वासन के लिए भी ऋणी हो गया।
मैंने उस विला को देखा, जो तराशे हुए पत्थरों से बना हुआ था। उसके चारों ओर उपवन को घेरती हुई दीवार थी, और प्रवेश-द्वार की दोनों ओर उसकी रक्षा के लिए ऊँचे बुर्ज बने हुए थे। भवनों और हरित प्रांगण के नीचे एक विशाल जलाशय था, जो आवश्यकता पड़ने पर पूरी सेना के लिए भी पर्याप्त हो सकता था। वहाँ का स्नानागार अत्यंत छोटा और संकुचित था। उसमें बहुत कम प्रकाश पहुँचता था क्योंकि पुराने समय के लोगों का विश्वास था कि स्नानागार तब तक पर्याप्त गर्म नहीं हो सकता जब तक वह अँधेरा न हो। यह सब देखकर मुझे स्किपियो की जीवन-शैली और अपनी वर्तमान जीवन-शैली की तुलना करने में बड़ा आनंद आया। इसी छोटे-से कोने में कार्थेज का वह विख्यात आतंक, वह पुरुष जिसने रोम को दूसरी बार शत्रुओं के हाथों में जाने से बचाया था, खेतों में कठोर परिश्रम करके थके हुए अपने शरीर को धोया करता था। वह व्यायाम के रूप में स्वयं खेत जोतता था, जैसा कि प्राचीन काल के लोग किया करते थे। इसी साधारण और जर्जर छत के नीचे वह रहता था, और उसके पैरों के नीचे यही सस्ती टाइलों का फर्श बिछा हुआ था।
लेकिन आज के समय में कौन ऐसे स्नानागार में स्नान करना स्वीकार करेगा? आज तो कोई व्यक्ति स्वयं को अत्यंत निर्धन और तुच्छ समझने लगता है यदि उसकी दीवारें बड़े-बड़े और अत्यंत महँगे दर्पणों से न चमकती हों; यदि उसके अलेक्ज़ान्द्रिया के संगमरमर पर नुमीडिया के संगमरमर की विपरीत रंगों वाली जड़ाई न की गई हो और उसके चारों ओर चित्रकला जैसी बहुरंगी मोज़ेक की सजावट न हो। यदि स्नान-कक्ष की छत काँच की न बनी हो। यदि थासोस का डोलोमाइट, जो कभी मंदिरों में भी विरले ही दिखाई देता था, उन जलकुंडों के किनारों पर न लगा हो, जिनमें हम अत्यधिक पसीना बहाने के बाद अपने अंगों को डुबोते हैं और यदि जल चाँदी की टोंटियों से न बहता हो। यह तो केवल सामान्य लोगों के स्नानागारों का वर्णन है! मुक्त दासों (फ़्रीडमैन) के स्नानागारों के बारे में क्या कहा जाए? वहाँ कितनी मूर्तियाँ हैं, कितने ऐसे स्तंभ हैं जो किसी छत का भार नहीं उठाते बल्कि केवल सजावट और वैभव के प्रदर्शन के लिए खड़े किए गए हैं! कितने फव्वारे हैं, जिनका जल एक स्तर से दूसरे स्तर तक कल-कल करता हुआ बहता रहता है! हम विलासिता की ऐसी पराकाष्ठा पर पहुँच चुके हैं कि अब हमें तब तक चलना भी अच्छा नहीं लगता, जब तक हमारे पैर बहुमूल्य पत्थरों पर न पड़ें।
स्किपियो के स्नानागार में खिड़कियाँ बहुत छोटी थीं। पत्थर की दीवारों में बनी हुई संकरी दरारों जैसी। उनका उद्देश्य केवल इतना था कि भीतर प्रकाश आ सके, पर भवन की सुरक्षा में कोई कमी न आए। लेकिन आज यदि किसी स्नानागार में बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ न हों, जिनसे दिन के हर समय सूर्य का प्रकाश भीतर आता रहे, यदि वहाँ स्नान करते-करते धूप सेंकने की सुविधा न हो और यदि स्नान-कुंड में बैठे-बैठे ग्रामीण दृश्य तथा समुद्र का नज़ारा न दिखाई दे तो लोग ऐसे स्नानागार को तिरस्कारपूर्वक 'चूहे का बिल' कहने लगते हैं। यही कारण है कि जिन स्नानागारों के उद्घाटन के समय लोगों की भीड़ उन्हें देखकर मुग्ध हो जाती थी, वे भी जैसे ही विलासिता अपने प्रदर्शन का कोई नया साधन खोज लेती है, तुरंत पुराने और उपेक्षणीय समझे जाने लगते हैं। प्राचीन समय में स्नानागार बहुत कम होते थे और उनमें किसी प्रकार की सजावट नहीं होती थी। जब प्रवेश-शुल्क केवल एक चौथाई सिक्के (फ़ार्थिंग) के बराबर हो और उद्देश्य केवल उपयोगिता हो, मनोरंजन नहीं, तब भवन को सजाने की आवश्यकता ही क्या थी? वहाँ पानी के भीतर फूटने वाले फव्वारे नहीं थे, न ही गर्म जलस्रोत की तरह निरंतर ताज़ा पानी आता रहता था। किसी को इस बात की चिंता भी नहीं होती थी कि शरीर की धूल-मिट्टी धोने वाला पानी बिल्कुल क्रिस्टल की तरह स्वच्छ है या नहीं।
फिर भी, सच तो यह है कि उन अँधेरे, साधारण पलस्तर वाले स्नानागारों में प्रवेश करना कितना सुखद लगता है, जब यह ज्ञात हो कि वहाँ के जल का तापमान स्वयं अपने हाथ से जाँचकर उसे आपके लिए उपयुक्त बनाने वाला अधिकारी कैटो, फैबियस मैक्सिमस या कॉर्नेलियस कुल का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति था। उस समय श्रेष्ठ कुलों के एडाइल (नगर अधिकारी) सार्वजनिक स्नानागारों में स्वयं जाकर यह सुनिश्चित करते थे कि वहाँ स्वच्छता बनी रहे और पानी का तापमान स्वास्थ्यकर तथा उपयोगी हो, वैसा नहीं जैसा आज होता है, जो किसी भट्ठी की तपिश जैसा प्रतीत होता है। आज तो पानी इतना गर्म होता है कि यदि किसी अपराधी दास को दंड देना हो, तो उसे जीवित ही उसमें स्नान कराने की सज़ा दी जा सकती है! मेरी दृष्टि में आज के अत्यधिक गर्म स्नानागार और किसी जलते हुए भवन में प्रवेश करने में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया है।
"आज के लोग शायद कहें, 'स्किपियो कितना असभ्य था! उसके भाप-स्नान कक्ष में प्रकाश आने के लिए अभ्रक (माइका) की चौड़ी खिड़कियाँ तक नहीं थीं। वह स्नान-कुंड में उतरने से पहले धूप में बैठकर शरीर को ताम्रवर्ण भी नहीं करता था। कितना अभागा व्यक्ति था! उसे जीना ही नहीं आता था! उसके स्नान का पानी छाना हुआ नहीं होता था। वह प्रायः मटमैला रहता था और यदि अधिक वर्षा हो जाती तो लगभग कीचड़ जैसा दिखाई देता था।'" किन्तु स्किपियो को इस प्रकार के स्नान से कोई आपत्ति नहीं थी। वह वहाँ सुगंधित तेलों को धोने नहीं बल्कि अपने शरीर का पसीना और श्रम की मैल धोने के लिए जाता था।
तुम्हें क्या लगता है, आज के कुछ लोग इस पर क्या कहेंगे? “मुझे तो स्किपियो से तनिक भी ईर्ष्या नहीं होती। यदि उसे ऐसे स्नानागार में स्नान करना पड़ता था तो वास्तव में वह निर्वासन में ही जी रहा था!” वास्तविकता तो यह है कि उसे प्रतिदिन ऐसा स्नान भी नहीं मिलता था। प्राचीन रोम के जीवन के विवरण बताते हैं कि लोग रोज़ केवल अपने हाथ और पैर धोते थे। वे अंग जो स्वाभाविक रूप से काम करते समय मैले हो जाते थे। पूरे शरीर का स्नान वे केवल बाज़ार के दिन (साप्ताहिक अवकाश या विश्राम के दिन) करते थे। इस पर कोई कहेगा, “तो फिर वे लोग अवश्य ही बहुत गंदे रहते होंगे! सोचो, उनके शरीर से कैसी दुर्गंध आती होगी?” उत्तर है, उनसे सैनिक जीवन की गंध आती थी। परिश्रम की गंध आती थी और मनुष्यता की गंध आती थी। अब जबकि अत्यधिक विलासपूर्ण स्नानागारों का आविष्कार हो चुका है, लोग पहले की अपेक्षा कहीं अधिक मैले हो गए हैं।
जब होरेस ने एक कुख्यात विलासी और आडंबरप्रिय व्यक्ति का चित्रण किया तो उसने कहा, “बुकिलस से मीठी गोलियों (लॉज़ेंज) जैसी सुगंध आती है।” आज के समय में यदि होरेस ऐसा कहता तो बुकिलुस को तो साधारण व्यक्ति माना जाता। उसकी जगह वह गार्गोनियस का उदाहरण देता, जिसकी तुलना होरेस ने बुकिलस से की थी। अब केवल इत्र लगाना ही पर्याप्त नहीं समझा जाता। अपेक्षा यह की जाती है कि दिन में दो-तीन बार उसे फिर से लगाया जाए ताकि उसकी सुगंध त्वचा से उड़ न जाए। आश्चर्य की बात यह है कि लोग उस कृत्रिम सुगंध पर ऐसे गर्व करते हैं, मानो वह उनके अपने शरीर की स्वाभाविक गंध हो।
यदि मेरी यह सारी बातें कुछ अधिक कठोर प्रतीत हों तो इसका दोष इस विला को देना। यहीं मुझे एजियालस से, जो अब इस खेत का स्वामी है और अत्यंत परिश्रमी गृह-प्रबंधक है। यह शिक्षा मिली कि सबसे पुराने वृक्ष को भी एक स्थान से उखाड़कर दूसरे स्थान पर सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। यह ऐसी बात है जिसे हमें अपनी वृद्धावस्था में विशेष रूप से सीखना चाहिए। क्योंकि हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए ही तो जैतून के वृक्ष लगाता है। इतना ही नहीं, मैंने स्वयं ऐसा जैतून का उपवन देखा है जिसने तीसरे या चौथे वर्ष में ही पर्याप्त और संतोषजनक मात्रा में फल देना शुरू कर दिया था। तुम भी उस वृक्ष की छाया का आनंद लोगे,
“जो बाद में उगकर तुम्हारे वंशजों को छाया प्रदान करेगा,”
जैसा कि हमारे कवि वर्जिल कहते हैं। यद्यपि वर्जिल का उद्देश्य कृषि का यथार्थ वर्णन करना नहीं बल्कि मनोहारी काव्य रचना करना था। उनका अभिप्राय किसानों को शिक्षा देना नहीं बल्कि अपने पाठकों को आनंदित करना था। इसका केवल एक उदाहरण दूँ। आज मेरी दृष्टि इस पंक्ति पर गई:
“बसंत ऋतु में सेम (फलियाँ) बोई जाती हैं
उसी समय तुम भुरभुरी मिट्टी की क्यारियों में समृद्ध अल्फ़ाल्फ़ा (लूसर्न) भी बोते हो
और वर्ष के उसी मौसम में बाजरे की भी देखभाल की जाती है।”
क्या इन दोनों फ़सलों को एक ही समय और वह भी वसंत ऋतु में बोया जाना चाहिए? इसका निर्णय तुम स्वयं करो। मैं तुम्हें यह पत्र जून के महीने में लिख रहा हूँ, जब जुलाई आने ही वाली है और मैंने अभी-अभी अपनी आँखों से देखा है कि एक ही दिन लोग सेम (फलियों) की कटाई भी कर रहे थे और बाजरे की बुवाई भी कर रहे थे।
अब मैं फिर उस जैतून के उपवन की बात पर लौटता हूँ। मैंने देखा कि एजियालस उसे दो प्रकार से तैयार करता है। बड़े वृक्षों के मामले में वह उनकी शाखाओं को काटकर लगभग एक फुट तक छोड़ देता है और फिर मुख्य जड़ (टैप्रूट) सहित पूरे तने को उखाड़कर दूसरी जगह लगा देता है। वह पार्श्व जड़ों को छाँट देता है और केवल बीच का वह भाग छोड़ता है जिससे सभी जड़ें जुड़ी होती हैं। इसके बाद वह उस भाग पर गोबर की खाद का लेप करता है, उसे गड्ढे में रखता है और फिर केवल मिट्टी भरकर नहीं छोड़ देता बल्कि उसे पैरों से अच्छी तरह दबाकर सघन कर देता है। उसका कहना है कि इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है। वह इसे 'मिट्टी का सघनीकरण' कहता है। उसके अनुसार इससे ठंड और तेज़ हवा का प्रभाव कम पड़ता है। साथ ही, वृक्ष अपनी जगह पर हिलता-डुलता नहीं है और इसी कारण नई जड़ों को निकलने तथा मिट्टी को मजबूती से पकड़ने का अवसर मिल जाता है। जब तक वे नई जड़ें पतली और पूरी तरह स्थापित नहीं हो जातीं, तब तक हल्का-सा हिलना भी उन्हें उखाड़ सकता है। वह पुनः रोपने से पहले मुख्य जड़ को थोड़ा खुरच भी देता है क्योंकि उसका विश्वास है कि जहाँ-जहाँ लकड़ी खुल जाती है, वहीं से नई जड़ें निकल आती हैं। तने का केवल तीन या चार फुट भाग ही भूमि के ऊपर रहना चाहिए। इससे वृक्ष ज़मीन के निकट से ही नई शाखाएँ और पत्तियाँ निकालता है। पुराने वृक्षों की तरह उसका ऊपरी बड़ा भाग सूखा और निर्जीव नहीं रह जाता। रोपने की दूसरी विधि यह है कि वह ऐसी मज़बूत शाखाएँ लेता है जिनकी छाल अभी कोमल होती है, जैसी कि अपेक्षाकृत युवा वृक्षों में मिलती है। फिर उन्हें भी उसी प्रकार भूमि में रोप देता है। इस विधि से वृक्ष कुछ धीमी गति से बढ़ते हैं, परंतु क्योंकि वे मानो कलम (स्कायन) से विकसित हुए हों। इसलिए उनमें पुराने वृक्षों जैसी टेढ़ी-मेढ़ी, गाँठदार या भद्दी बनावट नहीं होती।
मैंने एक और बात भी देखी है। एक ऐसी अंगूर की बेल, जिसे काफी पुरानी हो जाने पर उसके सहारे वाले एल्म वृक्ष से अलग करके दूसरी जगह प्रतिरोपित किया गया था। ऐसी स्थिति में, यदि संभव हो तो उसकी बारीक से बारीक जड़ों को भी सुरक्षित रखना चाहिए। साथ ही, बेल के तने का पर्याप्त बड़ा भाग मिट्टी में दबा देना चाहिए ताकि उसी तने से नई जड़ें फूट सकें। मैंने ऐसी बेलें देखी हैं जिन्हें केवल फ़रवरी में ही नहीं बल्कि मार्च के अंतिम दिनों में भी लगाया गया था और अब वे उन एल्म वृक्षों को मजबूती से पकड़कर उनसे लिपट चुकी हैं, जो पहले उनके सहारे नहीं थे। एजियालस यह भी जोड़ता है कि जिन वृक्षों का तना मोटा और बड़ा हो। यदि मैं ऐसा कह सकता हूँ, उन्हें भूमिगत जलाशय (सिस्टर्न) के पानी से सींचना चाहिए। यदि इससे वास्तव में उन्हें लाभ पहुँचता है तो फिर हम वर्षा पर निर्भर नहीं रहते।
मैं तुम्हें इससे अधिक कुछ सिखाना नहीं चाहता क्योंकि मुझे भय है कि कहीं मैं तुम्हें अपना प्रतिद्वंद्वी न बना दूँ। ठीक वैसे ही जैसे एजियालस ने मुझे बना दिया।
अभी के लिए विदा
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