प्रिय लूसीलियस
जहाज़ पर सवार होने से पहले ही मैं एक प्रकार से जहाज़-डूबा हुआ नाविक था। यह कैसे हुआ, इसका उल्लेख मैं नहीं करूँगा, कहीं ऐसा न हो कि तुम उसे स्टोइक दर्शन के विरोधाभासों में से एक समझ बैठो। उनमें से कोई भी असत्य नहीं है और न ही उनमें से कोई उतना विचित्र है जितना पहली दृष्टि में प्रतीत होता है। जब भी तुम चाहोगे, मैं यह तुम्हें सिद्ध कर दूँगा बल्कि यदि तुम न भी चाहो, तब भी। फिलहाल, इस यात्रा ने मुझे यह सिखाया है कि हमारी कितनी ही वस्तुएँ वास्तव में अनावश्यक होती हैं। हम उन्हें कितनी आसानी से स्वेच्छा से त्याग सकते हैं। क्योंकि जब आवश्यकता हमें उनसे वंचित कर देती है, तब उनके अभाव का हमें विशेष दुःख नहीं होता।
मैक्सिमस और मैं केवल कुछ दासों के साथ जितनों के लिए एक साधारण गाड़ी में स्थान हो सकता है और उतने ही सामान के साथ, जितना हम अपने शरीर पर धारण किए हुए हैं, पिछले दो दिनों से अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक रह रहे हैं। मेरा बिछौना भूमि पर बिछा है और मैं उसी पर लेटता हूँ। मेरे पास केवल दो चोगे हैं।एक बिछौने को ढकने के लिए और दूसरा स्वयं को ढकने के लिए। हमारे दोपहर के भोजन में कोई अतिरिक्त व्यंजन नहीं था और उसे तैयार होने में एक घंटे से भी कम समय लगा। सूखे अंजीर मैं हर जगह अपने साथ रखता हूँ और अपनी लेखन-पट्टिकाएँ भी। यदि रोटी मिल जाती है तो अंजीर उसके साथ खाने का व्यंजन बन जाते हैं और यदि रोटी नहीं होती तो वही अंजीर मेरी रोटी बन जाते हैं। वे मेरे लिए प्रत्येक दिन को नए वर्ष का आरम्भ बना देते हैं। मैं भी उत्तम विचारों तथा महान आत्मबल के सहारे उसे सचमुच एक सुखद नया वर्ष बना लेता हूँ। क्योंकि मनुष्य की आत्मा उससे अधिक महान कभी नहीं होती, जितनी तब होती है जब वह उन सभी वस्तुओं का त्याग कर देती है जो वास्तव में उसकी अपनी नहीं हैं। किसी भी वस्तु से भय न रखकर वह शांति प्राप्त करती है और किसी भी वस्तु की इच्छा न करके वह सच्ची समृद्धि प्राप्त करती है।
जिस गाड़ी में मैं यात्रा कर रहा हूँ, वह केवल एक साधारण देहाती बैलगाड़ी जैसी है। उसे खींचने वाले खच्चरों में जीवित होने का एकमात्र प्रमाण यही है कि वे चल रहे हैं। गाड़ीवान ने अपने जूते उतार रखे हैं और वह भी गर्मी के कारण नहीं। मुझे अपने-आप को यह समझाने में कठिनाई होती है कि कोई मुझे ऐसी गाड़ी में देखे। यह मेरे स्वभाव की एक विचित्र कमजोरी है कि सही काम करते हुए भी मुझे अब तक लज्जा आती है। जब भी रास्ते में किसी की अधिक भव्य सवारी दिखाई देती है तो अनचाहे ही मेरा चेहरा लज्जा से लाल हो जाता है। यही इस बात का प्रमाण है कि जिन आदतों को मैं सही मानता हूँ और जिनकी प्रशंसा करता हूँ, वे अभी मेरे भीतर पूरी तरह दृढ़ नहीं हुई हैं। जो व्यक्ति साधारण गाड़ी में बैठने पर लज्जित होता है, वही किसी महँगी और शानदार सवारी का स्वामी बनकर उसका घमंड भी करेगा। अब तक मैंने केवल थोड़ी-सी ही प्रगति की है। मैं अभी अपनी सादगी को खुले रूप में अपनाने का साहस नहीं जुटा पाया हूँ। मैं अब भी राह चलते लोगों की राय की परवाह करता हूँ जबकि मुझे तो पूरी मानव-जाति की राय के विरुद्ध निर्भीक होकर यह कहना चाहिए—
“तुम लोग पागल हो। तुम भ्रम में हो। तुम अनावश्यक वस्तुओं पर मुग्ध हो जाते हो और किसी मनुष्य का मूल्यांकन उसकी वास्तविक संपत्ति से नहीं करते। जब किसी को ऋण देना होता है या कोई उपकार करना होता है क्योंकि उपकार भी तुम एक प्रकार का खर्च ही मानते हो तब तुम उसकी आर्थिक स्थिति का ध्यानपूर्वक हिसाब लगाते हो।
‘इस व्यक्ति के पास बहुत संपत्ति है लेकिन उस पर भारी कर्ज भी है।’
‘इसका घर बहुत सुंदर है पर उसने उसे खरीदने के लिए उधार लिया है।’
‘इससे अधिक शानदार सेवकों का दल किसी के पास नहीं है लेकिन यह अपने ऋण नहीं चुकाता।’
‘यदि यह अपने सभी लेनदारों का भुगतान कर दे तो इसके पास कुछ भी नहीं बचेगा।’
इसी प्रकार तुम्हें हर व्यक्ति के विषय में भी विचार करना चाहिए। यह जानने का प्रयास करो कि उसके पास वास्तव में ऐसा क्या है जो सचमुच उसका अपना है।
क्या तुम किसी मनुष्य को केवल इसलिए धनी समझते हो कि वह घर से बाहर भी सोने की थालियों और प्यालों में भोजन करता है, कि हर प्रांत में उसकी एक-एक जागीर है, कि उसकी हिसाब-किताब की पुस्तकें इतनी अधिक हैं कि वे एक मोटे ग्रंथ का रूप ले लें, कि नगर के बाहर उसकी इतनी विशाल भूमि है कि यदि वह विरल जनसंख्या वाले अपूलिया में भी होती, तब भी लोगों को उससे ईर्ष्या होती?
फिर भी वह मनुष्य निर्धन है। क्यों? क्योंकि वह ऋणग्रस्त है।
तुम पूछोगे, “उस पर कितना ऋण है?”
सब कुछ!
या क्या तुम यह समझते हो कि अपनी सारी संपत्ति भाग्य की देन होने के कारण उस पर निर्भर होना, किसी मनुष्य का ऋणी होने से किसी प्रकार भिन्न है? क्या इससे कोई अंतर पड़ता है कि उसके खच्चर खूब हृष्ट-पुष्ट हैं और सब एक ही रंग के हैं? क्या उसकी अलंकृत और भव्य गाड़ी का कोई वास्तविक महत्व है?
तीव्र गति वाले घोड़े, बहुमूल्य जरीदार आवरणों से सुसज्जित हैं,
उनकी मार्टिंगेलें (घोड़े की लगाम का एक हिस्सा) सोने से जड़ी हुई हैं,
और उनके मुख में लगी लगामों के बिट भी शुद्ध स्वर्ण के बने हुए हैं।
ऐसी वस्तुएँ न तो उनके स्वामी को बेहतर बनाती हैं और न ही खच्चर को। कैटो द सेंसर, जिसका जीवन राज्य के लिए उतना ही लाभदायक था जितना सिपियो का क्योंकि एक ने हमारे शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध किया था और दूसरे ने हमारे दुर्गुणों के विरुद्ध, प्रायः एक साधारण बोझा ढोने वाले घोड़े पर यात्रा करता था। वास्तव में उस घोड़े पर दोनों ओर झोले लटके रहते थे ताकि वह अपने साथ आवश्यक और उपयोगी वस्तुएँ ले जा सके। मैं तो यही चाहता हूँ कि किसी दिन मार्ग में उसकी भेंट हमारे किसी धनी नवयुवक अश्वारोही से हो जाए, जिसके आगे-आगे दौड़ने वाले सेवक हों, न्यूमिडियाई दासों का दल साथ चल रहा हो और जिसके पीछे उड़ती हुई धूल का बड़ा बादल उठ रहा हो। निस्संदेह, ऐसा व्यक्ति मार्कस कैटो की अपेक्षा अधिक सुसज्जित और अधिक सेवकों से घिरा हुआ यात्री दिखाई देगा। फिर भी, उस सारी फैशनेबल सज-धज के बीच वह गंभीरतापूर्वक यह विचार कर रहा होगा कि कहीं वह स्वयं को किसी ग्लैडिएटर या जंगली पशुओं से लड़ने वाले योद्धा के रूप में किराए पर दे दे। उस युग के लिए इससे बढ़कर सम्मान की बात और क्या हो सकती है कि एक विजयी सेनापति, एक सेंसर और वह भी कैटो जैसा व्यक्ति, एक साधारण-से घोड़े में ही संतुष्ट था! और वह घोड़ा भी पूरी तरह उसके लिए उपलब्ध नहीं था क्योंकि उसके दोनों ओर लटके हुए गठ्ठरों ने उसका कुछ भाग घेर रखा था। फिर भी, क्या तुम उन मोटे-ताज़े, आरामदेह चाल वाले और तेज़ रफ़्तार शानदार घोड़ों की अपेक्षा उस एक साधारण घोड़े को नहीं चुनोगे, जिसकी पीठ कैटो के पैरों के स्पर्श से घिस गई थी?
मुझे लगता है कि यदि मैं स्वयं ही इस विषय का अंत न करूँ तो इसका कोई अंत नहीं होगा। इसलिए अब मैं कम-से-कम सामान और यात्रा-भार की चर्चा यहीं समाप्त करता हूँ। जिसने सबसे पहले यात्रा के सामान को इम्पेडिमेंटा (अर्थात् ‘बोझ’ या ‘बाधा’) कहा था, उसने मानो पहले ही उसके वास्तविक स्वरूप की भविष्यवाणी कर दी थी। अब मैं तुम्हारे साथ हमारे स्टोइक विद्यालय के कुछ ऐसे विचार साझा करना चाहता हूँ जो सद्गुण से संबंधित हैं। हमारे मत में, मनुष्य के सुखी होने के लिए केवल सद्गुण ही पर्याप्त है।
जो वस्तु वास्तव में अच्छी (शुभ) होती है, वही मनुष्य को भी अच्छा बनाती है। ठीक उसी प्रकार जैसे संगीत-कला में जो वस्तु अच्छी होती है, वही किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ बनाती है। भाग्य पर निर्भर रहने वाली वस्तुएँ मनुष्य को अच्छा नहीं बनातीं। अतः ऐसी वस्तुएँ वास्तविक अर्थ में अच्छी (शुभ) नहीं हैं।
इस तर्क का पेरिपैटेटिक दार्शनिक इस प्रकार खंडन करते हैं कि हमारी पहली मान्यता ही असत्य है। वे कहते हैं, “केवल किसी अच्छी वस्तु के कारण मनुष्य अपने-आप अच्छा नहीं बन जाता। उदाहरण के लिए, संगीत-कला में बाँसुरी, वीणा या वादन के लिए उपयुक्त कोई उत्तम वाद्य-यंत्र अच्छी वस्तुएँ हैं। परन्तु इनमें से कोई भी किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ नहीं बना देता।”
हम उन्हें इस प्रकार उत्तर देंगे। “तुम संगीत में ‘अच्छी वस्तु’ से हमारा अभिप्राय नहीं समझ पाए। हमारा संकेत उन वस्तुओं की ओर नहीं है जो केवल संगीतज्ञ को साधन उपलब्ध कराती हैं बल्कि उन गुणों की ओर है जो उसे वास्तव में संगीतज्ञ बनाते हैं। तुम केवल संगीत-कला के बाहरी उपकरणों पर ध्यान दे रहे हो, स्वयं उस कला पर नहीं। संगीत-कला में जो वास्तव में अच्छा है, वही किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ बनाता है।”
मैं इस बात को और अधिक स्पष्ट करना चाहता हूँ। संगीत-कला में ‘अच्छा’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। पहला, उस वस्तु के लिए जो संगीतज्ञ के कार्य या प्रदर्शन में सहायता करती है। दूसरा, उस वस्तु के लिए जो स्वयं उसकी कला या कौशल को विकसित करती है। बाँसुरी, वीणा, ऑर्गन और तार वाले अन्य वाद्य-यंत्र पहले प्रकार की वस्तुएँ हैं। उनका संबंध संगीत के प्रदर्शन से है, स्वयं संगीत-कला से नहीं। क्योंकि एक व्यक्ति इन वाद्य-यंत्रों के बिना भी संगीत-कला में निपुण हो सकता है, यद्यपि वह उस समय अपनी कला का प्रदर्शन न कर सके। किन्तु मनुष्य के मामले में ऐसी दोहरी स्थिति नहीं पाई जाती। मनुष्य का वास्तविक शुभ (अच्छाई) और उसके जीवन का वास्तविक शुभ, दोनों एक ही हैं।
जो वस्तु सबसे निकृष्ट और तिरस्कृत लोगों के पास भी हो सकती है, वह वास्तविक अर्थ में अच्छी (शुभ) नहीं हो सकती। धन तो दलाल और ग्लैडिएटरों के प्रबंधक जैसे लोगों के पास भी हो सकता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में अच्छा (शुभ) नहीं है।
“वे कहते हैं, ‘तुम्हारी पहली मान्यता ही असत्य है। साहित्य-शिक्षण, चिकित्सा और नौचालन (जहाज़ चलाने की कला) में हम देखते हैं कि उनसे संबंधित अच्छी वस्तुएँ अत्यन्त साधारण और निम्न श्रेणी के लोगों के पास भी हो सकती हैं।’” किन्तु ये कलाएँ महान आत्मा का दावा नहीं करतीं। वे मनुष्य को ऊँचाइयों तक नहीं उठातीं और न ही उसे भाग्य की वस्तुओं के प्रति उदासीन बनाती हैं। इसके विपरीत, सद्गुण मनुष्य को ऊँचा उठाता है और उसे उन सभी वस्तुओं से ऊपर स्थापित करता है जिन्हें सामान्य लोग अत्यन्त मूल्यवान समझते हैं। जिन वस्तुओं को लोग प्रायः अच्छा या बुरा कहते हैं, वे सद्गुणी व्यक्ति के लिए न तो अत्यधिक लालसा का विषय होती हैं और न ही भय का।
क्लियोपेट्रा के एक हिजड़े सेवक चेलिडोन के पास एक विशाल संपत्ति थी। हाल के समय में नातालिस नाम का एक व्यक्ति जिसकी वाणी उतनी ही अश्लील थी जितना उसका व्यवहार निर्लज्ज (क्योंकि वह स्त्रियों का मुख द्वारा यौन-शोषण करता था) बहुत बड़ी संपत्ति का उत्तराधिकारी बना और स्वयं भी अनेक लोगों का उत्तराधिकार छोड़ गया। तो अब हमें क्या कहना चाहिए? क्या धन ने उसे अशुद्ध बना दिया था या उसने स्वयं धन को कलंकित कर दिया? कुछ लोगों के पास धन उसी प्रकार पहुँचता है जैसे चाँदी के सिक्के किसी गटर में गिर पड़ते हैं। सद्गुण इन सब वस्तुओं से ऊपर स्थित रहता है। उसका मूल्यांकन उसके अपने मापदंड से किया जाता है। जो वस्तुएँ किसी भी व्यक्ति के पास हो सकती हैं, उन्हें वह वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं मानता चिकित्सा और नौचालन जैसी कलाएँ न तो स्वयं को और न ही उनका अभ्यास करने वालों को ऐसी वस्तुओं के प्रति आकर्षित होने से रोकती हैं। कोई व्यक्ति अच्छा मनुष्य न होते हुए भी एक कुशल चिकित्सक, कुशल नाविक, साहित्य का शिक्षक और, यदि कहो, एक उत्कृष्ट रसोइया भी हो सकता है। जब किसी व्यक्ति में कोई असाधारण गुण दिखाई देता है, तब तुम कहते हो कि वह एक असाधारण व्यक्ति है क्योंकि मनुष्य का स्वरूप उसके गुणों के अनुरूप ही पहचाना जाता है।
धन की थैली का मूल्य उसके भीतर रखे धन के कारण होता है। वास्तव में थैली तो केवल उसके भीतर की वस्तु का एक आवरण मात्र है। भला कौन भरी हुई थैली को उसके भीतर के धन से अधिक मूल्यवान मानता है? यही बात विशाल सम्पत्तियों के स्वामियों पर भी लागू होती है। वे मानो अपनी सम्पत्ति के केवल सहायक या परिशिष्ट भर हैं। फिर बुद्धिमान मनुष्य महान क्यों है? इसलिए कि उसका मन महान है। अतः यह बात सत्य है कि जो वस्तु सबसे तुच्छ और निकृष्ट लोगों के पास भी हो सकती है, वह वास्तविक अर्थ में शुभ (अच्छी) नहीं हो सकती। इसी कारण मैं पीड़ा से मुक्त रहने को भी शुभ नहीं कहूँगा क्योंकि यह तो एक झींगुर और एक पिस्सू को भी प्राप्त है। मैं यह भी नहीं कहूँगा कि शांत और निश्चिन्त जीवन ही शुभ है क्योंकि केंचुए से अधिक निश्चिन्त जीवन किसका होता है? तुम पूछते हो कि मनुष्य को बुद्धिमान क्या बनाता है? वही जो किसी को देवतुल्य बनाता है। उसमें कुछ दैवी, उदात्त और महान अवश्य होना चाहिए। वास्तविक शुभ सभी के हिस्से में नहीं आता। वह किसी भी साधारण धारक में निवास नहीं करता। इस बात पर विचार करो—
प्रत्येक प्रदेश अपनी-अपनी विशेष उपज देता है,
कहीं अन्न अधिक होता है, कहीं अंगूर की बेलें लहलहाती हैं।
कहीं बागों के फल प्रचुर मात्रा में मिलते हैं,
तो कहीं बिना बोए ही हरी घास उग आती है।
क्या तुम नहीं देखते कि ट्मोलुस पर्वत हमें सुगंधित केसर भेजता है,
भारत हमें हाथीदाँत प्रदान करता है।
कोमल स्वभाव वाले सबाई लोग अपनी धूप (लोबान) भेजते हैं,
और वस्त्रहीन कैलिब्स लोग हमें लोहा उपलब्ध कराते हैं?
इन विविध वस्तुओं को अलग-अलग प्रदेशों को सौंपा गया है ताकि यदि मनुष्य एक-दूसरे की उपज प्राप्त करना चाहें तो उन्हें परस्पर आदान-प्रदान करना पड़े। परन्तु सर्वोच्च शुभ का अपना एक अलग ही प्रदेश है। वह न तो वहाँ उत्पन्न होता है जहाँ हाथीदाँत मिलता है और न वहाँ जहाँ लोहा मिलता है। तुम पूछते हो, उसका स्थान कहाँ है? वह मनुष्य का मन है। यदि मन पवित्र और निष्कलुष नहीं है तो उसमें ईश्वर का निवास नहीं हो सकता।जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह किसी अशुभ वस्तु से उत्पन्न नहीं हो सकती। पर धन से लोभ उत्पन्न होता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है।
इस पर कोई आपत्ति कर सकता है। “यह सत्य नहीं है कि शुभ वस्तु अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकती। धन तो मंदिरों की लूट और चोरी से भी प्राप्त होता है। इसलिए मंदिर-लूट और चोरी निश्चय ही बुरे कर्म हैं किन्तु केवल इसलिए नहीं कि उनसे धन प्राप्त होता है बल्कि इसलिए कि वे लाभ के साथ-साथ भय, चिंता तथा मन और शरीर, दोनों की यातनाएँ भी उत्पन्न करते हैं।”
जो यह तर्क देता है, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि जिस प्रकार मंदिर-लूट अपने अनेक बुरे परिणामों के कारण बुरी है, उसी प्रकार वह अपने अच्छे परिणाम, धन प्राप्त होने के कारण किसी अर्थ में अच्छी भी है। इससे अधिक विकृत विचार और क्या हो सकता है? फिर भी आज हम मानो स्वयं को यह विश्वास दिला चुके हैं कि मंदिर-लूट, चोरी और व्यभिचार भी अच्छी बातें हैं। कितने ही लोग चोरी करने में लज्जा का अनुभव नहीं करते और कितने ही अपने व्यभिचार का घमंड करते हैं! छोटी-मोटी मंदिर-लूट करने वालों को दंड मिलता है जबकि बड़े पैमाने पर ऐसा करने वालों का विजय-यात्राओं में सम्मान किया जाता है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी दृष्टि से मंदिर-लूट वास्तव में अच्छी है तो वह सम्माननीय भी होगी। चूँकि सम्माननीय कर्म ही उचित कर्म होता है, इसलिए उसे उचित कार्य भी माना जाएगा। ऐसी बात की कल्पना भी संसार का कोई मनुष्य नहीं कर सकता। अतः शुभ वस्तु अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकती। क्योंकि यदि, जैसा तुम कहते हो, मंदिर-लूट केवल इसलिए बुरी है कि उसके अनेक बुरे परिणाम होते हैं तो यदि उससे दंड हटा दिया जाए और उसे पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दे दी जाए, तब वह पूरी तरह अच्छी ठहरेगी। किन्तु वास्तव में अपराधों का सबसे बड़ा दंड उन्हीं अपराधों के भीतर निहित होता है। यदि तुम यह समझते हो कि उनका दंड जेल या जल्लाद के हाथों बाद में मिलता है तो तुम भ्रम में हो। ऐसे कर्मों का दंड तो उसी क्षण आरम्भ हो जाता है जब वे किए जाते हैं बल्कि वे अपने किए जाने की प्रक्रिया में ही मनुष्य को दंडित करने लगते हैं। इसलिए शुभ वस्तु अशुभ से उसी प्रकार उत्पन्न नहीं हो सकती, जैसे जैतून के वृक्ष से अंजीर नहीं उग सकता। पौधा अपने बीज के अनुरूप ही होता है। शुभ वस्तुएँ भी अपने स्वभाव के अनुरूप ही उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार सम्माननीय वस्तु लज्जाजनक वस्तु से उत्पन्न नहीं हो सकती, उसी प्रकार शुभ भी अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि जो वास्तव में शुभ है और जो वास्तव में सम्माननीय है, दोनों एक ही हैं।
हमारे विद्यालय के कुछ दार्शनिक इस आपत्ति का उत्तर इस प्रकार देते हैं। “मान लो कि धन, चाहे वह किसी भी प्रकार से प्राप्त किया गया हो, अपने-आप में एक शुभ वस्तु है। तब भी, यदि कभी धन मंदिर-लूट से प्राप्त होता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह धन वास्तव में मंदिर-लूट के कारण ही प्राप्त हुआ है। इसे इस प्रकार समझो। मान लो कि एक घड़े में एक सोने का सिक्का और एक साँप दोनों रखे हैं। यदि तुम उस घड़े से सोने का सिक्का निकालते हो तो तुमने उसे साँप के कारण नहीं निकाला। अर्थात घड़ा मुझे सोना इसलिए नहीं देता कि उसमें साँप भी है बल्कि वह मुझे सोना इस तथ्य के बावजूद देता है कि उसमें साँप भी मौजूद है। उसी प्रकार, मंदिर-लूट से लाभ इसलिए नहीं मिलता कि वह एक घृणित और अपराधपूर्ण कर्म है बल्कि इसलिए कि उस कर्म के साथ लाभ भी जुड़ा हुआ है। जैसे घड़े में बुरी वस्तु साँप है, उसके साथ रखा हुआ सोना नहीं, उसी प्रकार मंदिर-लूट में बुरी वस्तु अपराध है, उससे प्राप्त होने वाला लाभ नहीं।”
किन्तु मैं इस मत से सहमत नहीं हूँ। ये दोनों उदाहरण समान नहीं हैं। पहले उदाहरण में मैं साँप के बिना भी सोना निकाल सकता हूँ। पर दूसरे उदाहरण में मैं मंदिर-लूट किए बिना लाभ प्राप्त नहीं कर सकता। वहाँ लाभ अपराध के पास मात्र नहीं रखा है बल्कि उसी के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
यदि किसी वस्तु की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है तो वह वस्तु शुभ नहीं है। धन की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है।
कोई इस पर आपत्ति कर सकता है। “तुम्हारी पहली मान्यता के दो अर्थ हो सकते हैं। पहला यह कि धन की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है। किन्तु सद्गुण की प्राप्ति का प्रयास भी अनेक बुरे परिणाम ला सकता है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अध्ययन के उद्देश्य से समुद्री यात्रा करता है और उसका जहाज़ डूब जाता है या कोई दूसरा व्यक्ति यात्रा के दौरान बंदी बना लिया जाता है। दूसरा अर्थ यह है कि जिस वस्तु के कारण हमें बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं, वह शुभ नहीं है। यदि यह अर्थ लिया जाए तो या तो यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि धन या सुख के कारण हमें बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं अथवा यदि यह मान लिया जाए कि धन के कारण वास्तव में अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न होते हैं तो धन केवल शुभ नहीं होगा बल्कि वह स्वयं एक अशुभ वस्तु होगा। किन्तु तुम्हारा विद्यालय तो केवल इतना कहता है कि धन शुभ नहीं है। इसके अतिरिक्त, तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि धन का उपयोग है। तुम उसे जीवन की उपयोगी वस्तुओं में गिनते हो। लेकिन इसी तर्क के अनुसार वह उपयोगी भी नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि उसी के कारण हमें अनेक हानियाँ भी उठानी पड़ती हैं।”
कुछ लोग इसका उत्तर इस प्रकार देते हैं। “तुम यह समझने में भूल कर रहे हो कि धन अपने-आप में हानिकारक है। धन किसी को हानि नहीं पहुँचाता। हानि पहुँचाती है मनुष्य की अपनी मूर्खता या किसी दूसरे की दुष्टता। जैसे तलवार स्वयं किसी को नहीं मारती, वह तो केवल हत्यारे का उपकरण होती है। उसी प्रकार केवल इसलिए कि तुम्हें धन के कारण हानि पहुँची है, यह नहीं कहा जा सकता कि धन ने तुम्हें हानि पहुँचाई।” किन्तु मेरे विचार में पॉसिडोनियस का उत्तर इससे भी अधिक उचित है। वह कहते हैं कि धन बुराइयों का कारण इस अर्थ में नहीं है कि वह स्वयं कोई बुरा कार्य करता है बल्कि इसलिए कि वह उन लोगों को प्रेरित करता है जो बुरे कर्म करने को तत्पर होते हैं। क्योंकि प्रत्यक्ष (या कार्यकारी) कारण और पूर्ववर्ती कारण में अंतर होता है। प्रत्यक्ष कारण वह है जो अनिवार्य रूप से किसी वस्तु को सीधे प्रभावित करता है। जबकि धन दूसरे प्रकार का कारण है। वह मन में वासनाओं को भड़काता है, अहंकार को जन्म देता है, दूसरों की ईर्ष्या और द्वेष को आकर्षित करता है और मनुष्य के मन को स्वयं अपने ही विरुद्ध इस सीमा तक खड़ा कर देता है कि वह केवल धनी कहलाने की प्रतिष्ठा से ही प्रसन्न होने लगता है। जबकि वही प्रतिष्ठा अंततः उसके लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है। वास्तविक शुभ वस्तुएँ दोषरहित होनी चाहिए। शुभ वस्तुएँ निर्मल होती हैं। वे मन को भ्रष्ट नहीं करतीं, न ही उसे चिंता से भरती हैं। वे मन को ऊँचा उठाती हैं और उसका विस्तार करती हैं। परन्तु उसमें अहंकार उत्पन्न नहीं करतीं। शुभ वस्तुएँ आत्मविश्वास उत्पन्न करती हैं। जबकि धन प्रायः दुस्साहस को जन्म देता है। शुभ वस्तुएँ मन में महानता उत्पन्न करती हैं, जबकि धन आडंबर को जन्म देता है और आडंबर महानता का केवल एक झूठा प्रदर्शन है।
“यदि तुम इसी प्रकार तर्क करोगे,” मेरा प्रतिपक्षी कहता है, “तो धन केवल शुभ नहीं होगा बल्कि अशुभ भी होगा।” धन तभी अशुभ होता यदि वह अपने-आप में हमें हानि पहुँचाता अर्थात यदि, जैसा मैंने पहले कहा, वह प्रत्यक्ष (कार्यकारी) कारण होता। किन्तु वास्तव में वह केवल पूर्ववर्ती कारण है। फिर भी धन ऐसा कारण अवश्य है जो केवल हमारे मन को उत्तेजित ही नहीं करता बल्कि उसे अपनी ओर आकर्षित भी करता है। क्योंकि वह शुभ का ऐसा आभास उत्पन्न करता है जो देखने में इतना विश्वसनीय लगता है कि अधिकांश लोग उससे भ्रमित हो जाते हैं। इसी प्रकार सद्गुण भी कभी-कभी लोगों की ईर्ष्या और द्वेष का पूर्ववर्ती कारण बन जाता है। बहुत-से लोग अपनी बुद्धिमत्ता के कारण दूसरों की ईर्ष्या का पात्र बनते हैं और बहुत-से अपनी न्यायप्रियता के कारण। परन्तु यह कारण सद्गुण के स्वभाव में निहित नहीं है और न ही यह कोई स्वाभाविक या विश्वसनीय परिणाम है। इसके विपरीत, सद्गुण मनुष्यों के मन पर ऐसा प्रभाव डालता है जो उन्हें उसकी ओर आकर्षित करता है तथा उसके प्रति प्रेम और आदर उत्पन्न करता है।
पॉसिडोनियस का कहना है कि इस विषय में इस प्रकार तर्क करना चाहिए—
जो वस्तुएँ मन को न महानता प्रदान करती हैं, न आत्मविश्वास और न ही चिंता से मुक्ति देती हैं, वे शुभ नहीं हैं।किन्तु धन, स्वास्थ्य और इसी प्रकार की अन्य वस्तुएँ इनमें से कोई भी गुण प्रदान नहीं करतीं। अतः वे वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं हैं।
वे इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—
जो वस्तुएँ मन को न महानता प्रदान करती हैं, न आत्मविश्वास, न ही चिंता से मुक्ति देती हैं बल्कि इसके विपरीत उसे अपव्यय, घमंड और अहंकार की ओर ले जाती हैं, वे अशुभ हैं। भाग्य पर निर्भर रहने वाली वस्तुएँ मनुष्य को इन्हीं दोषों की ओर प्रेरित करती हैं। अतः वे वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं हैं।
कोई इस पर कह सकता है, “यदि यह तर्क सही है तो इन्हें उपयोगी वस्तुएँ भी नहीं कहा जा सकता।” किन्तु उपयोगी वस्तुओं (लाभदायक वस्तुओं) का स्थान शुभ वस्तुओं से बिल्कुल भिन्न है। उपयोगी वस्तु वह है जिसमें हानि की अपेक्षा लाभ अधिक हो। जबकि शुभ वस्तु का पूर्णतः शुभ होना आवश्यक है और उसमें किसी भी प्रकार की हानि का लेशमात्र भी नहीं होना चाहिए। शुभ वह नहीं है जो अधिकांशतः लाभदायक हो बल्कि वह है जो पूरी तरह और हर दृष्टि से लाभदायक हो। इसके अतिरिक्त, उपयोगी वस्तु का लाभ पशुओं को भी हो सकता है, अपरिपक्व लोगों को भी और मूर्खों को भी। इसलिए उसमें कुछ हानि भी मिली हो सकती है, फिर भी उसे उपयोगी कहा जाता है क्योंकि उसका मूल्यांकन उसके प्रमुख गुण अर्थात उसमें निहित अधिक लाभ के आधार पर किया जाता है। किन्तु शुभ वस्तु केवल बुद्धिमान व्यक्ति की ही संपत्ति होती है, और वह अनिवार्य रूप से हर प्रकार की मिलावट या दोष से रहित होती है।
साहस बनाए रखो। अब केवल एक पहेली शेष रह गई है। परन्तु वह हरक्यूलिस के पराक्रम जैसी कठिन पहेली है—
जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह अशुभ वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकती। किन्तु अनेक व्यक्तियों की निर्धनता मिलकर एक व्यक्ति की धन-संपत्ति का निर्माण करती है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है।
इस न्याय-वाक्य (सिलोजिज़्म) को हमारा स्टोइक विद्यालय स्वीकार नहीं करता। यह पेरिपैटेटिक दार्शनिकों द्वारा गढ़ा गया है और उसी परंपरा के दार्शनिक इसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। किन्तु पॉसिडोनियस कहते हैं कि इस कुतर्क का जिसे विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों के तर्कशास्त्रियों ने बार-बार दोहराया है, एंटीपेटर ने इस प्रकार खंडन किया है—
“‘निर्धनता’ शब्द का अर्थ किसी वस्तु का होना नहीं बल्कि उसका अभाव होना है (या जैसा प्राचीन दार्शनिक कहते थे, ‘वंचना’ या ‘अभाव’)। यूनानी भाषा में इसे काता स्तेरेसिन (kata sterēsin) कहा जाता है। यह शब्द इस बात का द्योतक नहीं है कि किसी के पास क्या है बल्कि इस बात का कि उसके पास क्या नहीं है। इसलिए अनेक अभावों को जोड़कर कोई वास्तविक वस्तु नहीं बनाई जा सकती। धन अनेक संसाधनों से बनता है, न कि अनेक निर्धनताओं से। तुम निर्धनता का सही अर्थ नहीं समझते। निर्धनता का अर्थ केवल थोड़ी-सी वस्तुओं का होना नहीं है बल्कि बहुत-सी वस्तुओं का न होना है। इसलिए इसका अर्थ उस आधार पर निर्धारित होता है जिसकी कमी है, न कि उस आधार पर जो किसी के पास है।” यदि लैटिन भाषा में यूनानी शब्द अनुपारक्सिया (anuparxia) के अर्थ वाला कोई उपयुक्त शब्द होता तो मैं यह बात और भी सरलता से समझा सकता। एंटीपेटर इसी शब्द का प्रयोग निर्धनता के लिए करते हैं। किन्तु मेरे विचार में निर्धनता का अर्थ इससे अधिक कुछ नहीं है कि किसी व्यक्ति के पास बहुत कम संपत्ति या साधन हों।
आओ, निर्धनता और धन के वास्तविक स्वरूप की इस जाँच को किसी और अवसर के लिए स्थगित रखें, जब हमारे पास पर्याप्त समय हो। जब वह समय आए, तब हम स्वयं से यह पूछें कि क्या शब्दों के अर्थ पर व्यर्थ विवाद करने की अपेक्षा निर्धनता की कठोरता को कम करना और धन के अहंकार को नियंत्रित करना अधिक उचित नहीं होगा, मानो हमने पहले ही इस विषय के सभी तथ्य निश्चित कर लिए हों। कल्पना करो कि हमें किसी सार्वजनिक सभा में बुलाया गया है, जहाँ यह निर्णय होना है कि धन-संपत्ति को समाप्त करने का कोई कानून पारित किया जाए या नहीं। क्या ये तर्क-वाक्य (सिलोजिज़्म) उस बहस में हमारी विजय दिला देंगे? क्या वे रोमन जनता को निर्धनता की प्रशंसा करने और उसकी आकांक्षा रखने के लिए प्रेरित करेंगे। उस निर्धनता की, जो उनके साम्राज्य की नींव और कारण रही है? क्या वे उन्हें उनकी वर्तमान संपन्नता से भयभीत कर देंगे? क्या ऐसे तर्क उन्हें यह समझा पाएँगे कि उनका धन पराजित राष्ट्रों से प्राप्त हुआ है और यही धन आज उस नगर में जो कभी अत्यंत पवित्र और संयमशील था, महत्त्वाकांक्षा, रिश्वतखोरी और अशांति का कारण बन गया है? कि विजय में प्राप्त लूट का प्रदर्शन अत्यधिक आडंबरपूर्ण हो गया है? कि यद्यपि एक राष्ट्र अनेक राष्ट्रों को लूट सकता है, फिर भी अनेक राष्ट्रों के लिए उस एक राष्ट्र को लूट लेना कहीं अधिक सरल होता है? यही वे बातें हैं जिन्हें हमें लोगों के सामने प्रभावपूर्वक रखना चाहिए। उनकी लोभ-वृत्ति को शब्दों के खेल से चकमा देने के बजाय, हमें उसका सीधे सामना करना चाहिए। यदि संभव हो, तो हमें निर्भीक होकर बोलना चाहिए। यदि वह भी संभव न हो, तो कम-से-कम स्पष्ट और सरल भाषा में अवश्य बोलना चाहिए।
अभी के लिए विराम
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