Friday, 24 July 2026

मानवीय जीवन के बारे में -- पत्र - 82 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


वे यात्राएँ मेरी आलस्य-प्रवृत्ति को झकझोरकर दूर कर रही हैं। मेरा विश्वास है कि वे मेरे स्वास्थ्य और मेरे अध्ययन, दोनों के लिए लाभदायक रही हैं। मेरे स्वास्थ्य के लिए वे क्यों उपयोगी हैं। यह तुम्हें स्पष्ट ही है क्योंकि साहित्य के प्रति मेरा प्रेम मुझे आलसी बना देता है और मैं अपने शरीर की उपेक्षा करने लगता हूँ। इसलिए दूसरों के श्रम के सहारे मुझे भी कुछ शारीरिक व्यायाम मिल जाता है। अब यह बताता हूँ कि वे मेरे अध्ययन के लिए कैसे सहायक हैं। मैंने नियमित पठन से कुछ समय के लिए विराम लिया है। निस्संदेह, पढ़ना आवश्यक है। पहला ताकि मैं केवल अपने ही विचारों में सीमित न रह जाऊँ और दूसरा ताकि दूसरों के अनुसंधानों को जानने के बाद मैं उनके निष्कर्षों का मूल्यांकन कर सकूँ और यह विचार कर सकूँ कि अभी क्या-क्या खोजा जाना शेष है। पठन मनुष्य की प्रतिभा का पोषण करता है और अध्ययन से थक जाने पर उसे फिर से ताज़गी प्रदान करता है। यद्यपि पढ़ना स्वयं भी अध्ययन की ही माँग करता है। हमें न तो केवल लिखना चाहिए और न ही केवल पढ़ना चाहिए। पहला, अर्थात केवल लेखन हमारी शक्ति को क्षीण और थका देगा। दूसरा, अर्थात केवल पठन, उसे निर्बल और शिथिल बना देगा। दोनों का बारी-बारी से अभ्यास करना चाहिए। एक को दूसरे के साथ संतुलित रखते हुए ताकि पढ़ने से जो कुछ प्राप्त हो, वह लिखने के माध्यम से हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाए।

By Stephanie Weaver

    जैसा कि कहा जाता है, हमें मधुमक्खियों के समान होना चाहिए। वे पहले इधर-उधर उड़कर उन फूलों का चयन करती हैं जो मधु बनाने के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं। फिर जो कुछ वे एकत्र करती हैं, उसे पूरे छत्ते में बाँट देती हैं। जैसा कि हमारे कवि वर्जिल ने कहा है—

“वे मधुर रस से फूली हुई कोशिकाओं को भर देती हैं,
और उनमें निर्मल, चमकता हुआ मधु प्रवाहित होने लगता है।”

    मधुमक्खियों के विषय में मतभेद है। क्या वे केवल फूलों से रस निकालती हैं, जो तुरंत ही मधु बन जाता है या फिर वे अपने भीतर की किसी विशिष्ट शक्ति के मिश्रण से उस एकत्र किए हुए रस को मधु में परिवर्तित करती हैं? कुछ लोगों का मत है कि उनकी कुशलता मधु बनाने में नहीं बल्कि केवल उसे एकत्र करने में है। वे कहते हैं कि भारत के एक प्रदेश में एक विशेष प्रकार के सरकंडे की पत्तियों पर ऐसा मधु पाया जाता है, जो या तो वहाँ के वातावरण की ओस से बनता है, या स्वयं उस सरकंडे के अत्यंत गाढ़े और मीठे रस से उत्पन्न होता है। उनका विचार है कि ऐसी ही क्षमता हमारे यहाँ के पौधों में भी होती है, यद्यपि वह उतनी स्पष्ट नहीं होती। उस प्राकृतिक मधुर रस को वही जीव खोजकर एकत्र करता है, जो इसी कार्य के लिए प्रकृति द्वारा उत्पन्न किया गया है। दूसरे लोगों का मानना है कि मधुमक्खियाँ फूलों और कोमल घासों से जो रस एकत्र करती हैं, वह छत्ते में सुरक्षित रखे जाने पर अपना स्वरूप बदल लेता है। यदि मैं ऐसा कहूँ तो एक प्रकार की किण्वन (फर्मेंटेशन) की प्रक्रिया के द्वारा उसमें परिवर्तन होता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के रस और स्वाद आपस में मिलकर एक ही स्वाद और एक ही मधु का रूप धारण कर लेते हैं।

    लेकिन मैं अपने मूल विषय से भटक रहा हूँ। हमें भी इन मधुमक्खियों का अनुकरण करना चाहिए। अपने विविध पठन से जो कुछ हमने एकत्र किया है, उसे पहले अलग-अलग रखना चाहिए क्योंकि वस्तुएँ अलग रहने पर अधिक अच्छी तरह सुरक्षित रहती हैं। फिर अपनी प्रतिभा की सावधानी और क्षमता का उपयोग करते हुए उन विभिन्न अंशों को इस प्रकार एक ही स्वाद में मिला देना चाहिए कि भले ही यह पहचाना जा सके कि कोई विचार कहाँ से लिया गया है, फिर भी वह अपने मूल रूप से भिन्न और नया प्रतीत हो। हमारे शरीर में भी प्रकृति बिना किसी सचेत प्रयास के यही कार्य करती है। जो भोजन हम ग्रहण करते हैं, वह तब तक शरीर पर बोझ बना रहता है, जब तक वह अपने मूल स्वरूप में पेट में ठोस पदार्थ के रूप में बना रहता है। लेकिन जब उसका रूपांतरण हो जाता है, तभी वह हमारी शक्ति का भाग बनता है और रक्त में मिल जाता है। प्रतिभा का पोषण करने वाली बातों के साथ भी हमें यही करना चाहिए। जिन विचारों को हमने ग्रहण किया है, उन्हें वैसा का वैसा बने रहने नहीं देना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने व्यक्तित्व का अंग बना लेना चाहिए। उन्हें आत्मसात करना चाहिए। अन्यथा वे केवल स्मृति में रह जाएँगे, प्रतिभा का हिस्सा नहीं बनेंगे। हमें अपने विचारों को पूर्ववर्ती विचारकों के विचारों के साथ ईमानदारी से सामंजस्य में लाकर उन्हें अपना बना लेना चाहिए ताकि अनेक स्रोतों से अंततः एक समन्वित एकता उत्पन्न हो सके। यह ठीक वैसा ही है जैसे अंकगणित के किसी एक प्रश्न में कई छोटे-छोटे योग सम्मिलित होते हैं। अनेक अलग-अलग संख्याएँ मिलकर अंततः एक ही कुल योग बन जाती हैं। हमारे मन को भी यही करना चाहिए जो कुछ उसके निर्माण में सहायक रहा है, उसे भीतर छिपाए रखे और केवल उसका परिपक्व परिणाम ही सामने लाए। यदि तुम्हारे लेखन या विचारों में किसी ऐसे महान लेखक की झलक दिखाई दे, जिसने तुम पर गहरा प्रभाव डाला है तो मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी समानता उससे वैसी हो जैसी पुत्र की अपने पिता से होती है, न कि किसी मूर्ति की अपने आदर्श से। क्योंकि मूर्ति तो एक निर्जीव वस्तु होती है।

    “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या पाठक यह नहीं पहचानेंगे कि तुम किसकी शैली, किसके तर्क-वितर्क और किसकी सुंदर अभिव्यक्तियों का अनुकरण कर रहे हो?” मेरा विचार है कि आवश्यक नहीं कि वे ऐसा पहचान ही लें। यदि कोई अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने चुने हुए आदर्श से ग्रहण किए गए सभी तत्वों पर अपनी मौलिक प्रतिभा की ऐसी छाप अंकित कर दे कि वे सब मिलकर एक सुसंगत और एकीकृत रूप धारण कर लें तो वे उसके अपने ही सृजन के रूप में दिखाई देंगे।

    क्या तुम नहीं देखते कि एक गायक-वृंद (कोरस) में कितनी अलग-अलग आवाज़ें मिलकर गाती हैं? फिर भी उनसे जो ध्वनि उत्पन्न होती है, उसमें एकता होती है। किसी की आवाज़ ऊँची होती है, किसी की नीची और किसी की मध्यम। स्त्रियाँ भी पुरुषों के साथ गाती हैं। बाँसुरियाँ उनका साथ देती हैं। फिर भी अलग-अलग गायकों की आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं; केवल उन सबकी संयुक्त ध्वनि ही सुनाई देती है। मैं जिस कोरस की बात कर रहा हूँ, वह प्राचीन दार्शनिकों के समय का कोरस है। आजकल के रंगमंचीय प्रदर्शनों में तो गाने वालों की संख्या कभी-कभी उतनी होती है, जितने पहले दर्शक हुआ करते थे। जब गायकों की पंक्तियाँ गलियारों तक भर जाती हैं, बैठने के स्थानों के चारों ओर तुरही-वादक खड़े रहते हैं और मंच से हर प्रकार की बाँसुरी तथा जल-वाद्य (हाइड्रॉलिक ऑर्गन) एक साथ बजते हैं, तब उन सबकी भिन्न-भिन्न ध्वनियों से एक ही सामंजस्यपूर्ण स्वर उत्पन्न होता है। मैं चाहता हूँ कि हमारा मन भी ऐसा ही हो। उसमें अनेक विद्याएँ हों, अनेक शिक्षाएँ हों, अनेक युगों के उदाहरण हों परंतु वे सब मिलकर एक ही सुसंगत सामंजस्य में बँध जाएँ। 

    “यह कैसे होगा?” तुम पूछते हो। लगातार एकाग्र अभ्यास से। यदि हम केवल विवेक (तर्कसंगत बुद्धि) की प्रेरणा से ही कार्य करें और केवल उसी की प्रेरणा से किसी बात से बचें तो यह संभव है। यदि तुम विवेक की बात सुनो, तो वह तुमसे कहेगा—

“उन वस्तुओं का त्याग कर दो जिनके पीछे सारी दुनिया भागती रहती है। धन का त्याग करो जिनके पास वह होता है, उनके लिए वह या तो संकट बन जाता है या बोझ। शारीरिक सुखों का त्याग करो और मानसिक विलासों का भी क्योंकि वे मनुष्य को कोमल, निर्बल और आलसी बना देते हैं। महत्त्वाकांक्षा का भी त्याग करो। वह घमंड से भरी हुई, खोखली और फूली हुई वस्तु है। उसका कोई अंत नहीं होता। उसे केवल इतना ही दिखाई देता है कि वह दूसरों से आगे निकल जाए और किसी को अपने बराबर न आने दे। वह ईर्ष्या से ग्रस्त रहती है और वह भी दोनों ओर से। वह स्वयं दूसरों से ईर्ष्या करती है और दूसरे उससे ईर्ष्या करते हैं। तुम देख ही रहे हो कि ईर्ष्या का पात्र होना और ईर्ष्या करना, दोनों ही मनुष्य को कितना दुःखी बना देते हैं। अपने सामने उन शक्तिशाली लोगों के घरों को देखो, जिनके द्वार शुभचिंतकों की भीड़ से भरे रहते हैं; सब एक-दूसरे को धक्का देकर भीतर जाने की कोशिश करते हैं। वहाँ प्रवेश पाने के लिए तुम्हें कितने अपमान सहने पड़ते हैं और भीतर पहुँच जाने के बाद उससे भी अधिक। इसलिए उन धनवानों की सीढ़ियों और उन विशाल प्रांगणों को छोड़ दो, जो हमारे सिरों के ऊपर तक ऊँचे उठे हुए हैं। वहाँ खड़े होना केवल किसी ऊँचे स्थान पर खड़े होना नहीं है बल्कि एक फिसलन भरे किनारे पर खड़े होने जैसा है। इसके बजाय अपने कदम प्रज्ञा की ओर मोड़ो। उस उदार संपदा की खोज करो जो प्रज्ञा प्रदान करती है— गहरी शांति और साथ ही सच्ची समृद्धि।”

    मानवीय जीवन में जो वस्तुएँ सबसे महान और ऊँची दिखाई देती हैं, वे वास्तव में बहुत तुच्छ होती हैं। वे केवल इसलिए ऊँची प्रतीत होती हैं क्योंकि उनकी तुलना उससे भी अधिक निम्न वस्तुओं से की जाती है। फिर भी उन तक पहुँचने का मार्ग अत्यंत खड़ा और कठिन होता है। प्रतिष्ठा के शिखर तक जाने वाली राह ऊबड़-खाबड़ और श्रमसाध्य है। किन्तु यदि तुम उस पर्वत पर चढ़ने का निश्चय करो जो भाग्य (सौभाग्य और बाहरी परिस्थितियों) की सभी वस्तुओं से ऊपर उठता है तो वहाँ पहुँचकर तुम उन सब चीज़ों को, जिन्हें अधिकांश लोग जीवन की सबसे बड़ी ऊँचाइयाँ समझते हैं, अपने पैरों के नीचे फैला हुआ देखोगे। आश्चर्य की बात यह है कि इस सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने का मार्ग कठिन और दुर्गम नहीं बल्कि समतल और सरल भूमि से होकर जाता है।


अभी के लिए विराम 

No comments:

Post a Comment

यह अनुवाद - माँ को दार्शनिक श्रद्धांजलि

  लूसियस अनेयस सेनेका, जिन्हें सामान्यतः सेनेका कहा जाता है, प्राचीन रोम के महान दार्शनिक, लेखक, नाटककार और स्टोइक विचारक थे। उनका जीवन पहली...