प्रिय लूसीलियस
मुझे लगता है कि तुम और मैं इस बात पर सहमत होंगे कि बाहरी वस्तुओं की इच्छा हम शरीर के लिए करते हैं। शरीर की देखभाल हम मन के सम्मान के लिए करते हैं। मन के भीतर भी कुछ अधीनस्थ शक्तियाँ होती हैं, जो हमारी गति और पोषण जैसी क्रियाओं का संचालन करती हैं तथा जिन्हें वास्तव में उस प्रधान संचालक शक्ति की सेवा के लिए ही हमें दिया गया है। यह प्रधान संचालक शक्ति स्वयं दो भागों से बनी है, एक तर्कहीन और दूसरा तर्कयुक्त। तर्कहीन भाग, तर्कयुक्त भाग की सेवा करता है। तर्कयुक्त भाग ही ऐसा है जो स्वयं किसी अन्य पर निर्भर नहीं रहता बल्कि वह अन्य सभी बातों को अपने अधीन रखता है और उनका मार्गदर्शन करता है। इसी प्रकार, जैसा कि तुम जानते हो, दिव्य बुद्धि भी समस्त सृष्टि के शीर्ष पर स्थित है। वह किसी अन्य के अधीन नहीं है। हमारी बुद्धि, जो उसी दिव्य बुद्धि से उत्पन्न हुई है, उसी प्रकार की है।
यदि हम इस बात पर सहमत हैं तो यह भी स्वाभाविक है कि हम इस दूसरे निष्कर्ष पर भी सहमत हों कि सुखी जीवन केवल अपनी तर्कशक्ति को पूर्णता तक विकसित करने में ही निहित है। क्योंकि पूर्ण विकसित तर्कशक्ति ही ऐसी शक्ति है जो मन को सदैव ऊँचा बनाए रखती है और भाग्य के सामने दृढ़ता से खड़ी रहती है।परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वही हमें चिंता और व्याकुलता से मुक्त रखती है। यही एकमात्र ऐसा शुभ है जो कभी हमारा साथ नहीं छोड़ता। मेरा आशय यह है कि वास्तव में सुखी वही व्यक्ति है जिसे कोई भी घटना छोटा या दुर्बल नहीं बना सकती। जिसने जीवन की वास्तव में महत्त्वपूर्ण बातों पर अधिकार प्राप्त कर लिया है और जो अपने अतिरिक्त किसी अन्य पर निर्भर नहीं रहता। जो व्यक्ति सहारे के लिए किसी और पर निर्भर करता है, उसके गिर जाने की संभावना बनी रहती है। अन्यथा वे वस्तुएँ, जो वास्तव में हमारी अपनी नहीं हैं, हमारे ऊपर अत्यधिक अधिकार जमाने लगेंगी। भला कौन ऐसा होगा जो भाग्य पर निर्भर रहना चाहे? कौन-सा बुद्धिमान व्यक्ति उन वस्तुओं पर गर्व करेगा जो वास्तव में उसकी अपनी नहीं हैं?
सुखी जीवन क्या है? वह है सुरक्षा और स्थायी मानसिक शांति। इन दोनों का स्रोत है महान आत्मा और उस उत्तम निर्णय पर अटल बने रहने का दृढ़ संकल्प जिसे एक बार सही समझकर स्वीकार किया गया हो। इन गुणों तक कैसे पहुँचा जाए? प्रत्येक वस्तु के सत्य को उसकी संपूर्णता में देखकर, अपने प्रत्येक कर्म में व्यवस्था, संयम और मर्यादा बनाए रखकर, ऐसी इच्छा-शक्ति रखकर जो सदैव शुभ और उदार हो, जो केवल तर्क के मार्ग पर चलती हो और उससे कभी विचलित न होती हो, ऐसी इच्छा-शक्ति जो जितनी प्रशंसनीय है, उतनी ही प्रिय भी है।संक्षेप में मैं इसे इस प्रकार कहूँगा, बुद्धिमान व्यक्ति का मन ऐसा होना चाहिए जो किसी देवता के योग्य हो। जिस मनुष्य के पास वह सब कुछ है जो सम्माननीय और सद्गुणपूर्ण है, उसे और किस वस्तु की कमी हो सकती है? यदि अन्य प्रकार की वस्तुएँ जीवन की सर्वोत्तम अवस्था में कोई योगदान दे सकती हैं तो वे सुखी जीवन की केवल सहायक परिस्थितियाँ हो सकती हैं, उसका आधार नहीं। क्योंकि यह सर्वथा अनुचित और निरर्थक होगा कि एक तर्कशील आत्मा की उत्कृष्टता को उन वस्तुओं पर निर्भर माना जाए जो स्वयं तर्कहीन हैं।
फिर भी कुछ लोग यह दावा करते हैं कि परम शुभ ऐसी वस्तु है जिसमें वृद्धि हो सकती है क्योंकि प्रतिकूल परिस्थितियों में वह अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाता। यहाँ तक कि महान स्टोइक आचार्यों में से एक, एंटिपेटर भी कहते हैं कि वे बाहरी वस्तुओं को कुछ महत्त्व देते हैं, यद्यपि बहुत ही थोड़ा। इसका अर्थ कुछ ऐसा हुआ मानो कोई व्यक्ति दिन के उजाले से तब तक संतुष्ट न हो, जब तक उसके साथ किसी छोटे-से दीपक का प्रकाश भी न जुड़ जाए। पर जब सूर्य का तेज उपस्थित है, तब एक छोटी-सी चिंगारी उससे क्या अंतर ला सकती है? यदि तुम्हें केवल सदाचरण ही पर्याप्त नहीं लगता तो फिर तुम उसके साथ या तो मानसिक कष्टों की अनुपस्थिति (जिसे यूनानी भाषा में "आओख्लेसिया" कहते हैं) या फिर सुख का भी समावेश करना चाहोगे। इनमें से पहली बात तो किसी सीमा तक स्वीकार की जा सकती है क्योंकि चिंता और व्याकुलता से मुक्त मन न तो ब्रह्मांड के अध्ययन में बाधित होता है और न ही प्रकृति के चिंतन से विचलित होता है। लेकिन दूसरी बात, अर्थात इन्द्रिय-सुख तो चरने वाले पशु का शुभ है। यह तर्कशील के साथ अतार्किक को, सम्माननीय के साथ असम्माननीय को और महान के साथ तुच्छ को जोड़ने जैसा है, यदि यह कहा जाए कि सुखी जीवन केवल शरीर में होने वाली हल्की-सी सुखद अनुभूति से बन जाता है। यदि ऐसा है तो फिर यह कहने में संकोच कैसा कि कोई मनुष्य इसलिए अच्छा जीवन जी रहा है क्योंकि उसकी जीभ स्वाद का आनंद ले रही है? क्या तुम उस व्यक्ति को, जिसका परम शुभ स्वाद, रंग और ध्वनियों जैसी इन्द्रियानुभूतियों में निहित है, वास्तव में मनुष्य तो दूर, एक श्रेष्ठ मनुष्य भी मानोगे? नहीं, उसे तो उस प्राणी की श्रेणी से ही बाहर कर देना चाहिए जो सभी जीवों में श्रेष्ठ है और जो देवताओं के बाद दूसरा स्थान रखता है। उसे तो उन पशुओं की श्रेणी में भेज देना चाहिए जो अपनी तृप्ति केवल नांद में खोजते हैं।
मन का अतार्किक भाग स्वयं भी दो भागों में विभाजित है। एक भाग उत्साही, महत्वाकांक्षी और उच्छृंखल है, जो भावनाओं और आवेगों का क्षेत्र है। दूसरा भाग निकृष्ट, आलसी और इन्द्रिय-सुखों में लिप्त रहने वाला है। इन लोगों ने पहले भाग को, जो यद्यपि अनुशासनहीन है, फिर भी दूसरे की अपेक्षा श्रेष्ठ है और निश्चय ही अधिक साहसी तथा मनुष्य के अधिक योग्य है, एक ओर रख दिया और दूसरे भाग को, जो कायर और अत्यंत हीन है, सुखी जीवन के लिए अनिवार्य मान लिया। इस प्रकार उन्होंने तर्कशक्ति को उसी का दास बना दिया और सबसे श्रेष्ठ प्राणी के परम शुभ को गिराकर उसका अवमूल्यन कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने परस्पर बिल्कुल भिन्न और असंगत तत्वों को मिलाकर एक विकृत मिश्रण तैयार कर दिया। जैसा कि हमारे कवि वर्जिल ने स्किला का वर्णन करते हुए कहा है—
“ऊपर से उसका मुख मनुष्य का था,
और वक्ष तक वह एक सुंदर युवती दिखाई देती थी।
पर कमर के नीचे वह एक घृणित समुद्री राक्षसी थी,
जिसके भेड़िए जैसे शरीर से डॉल्फ़िन की पूँछें जुड़ी हुई थीं।”
किन्तु स्किला के अंग तो उग्र, भयावह और तीव्र गति वाले जंगली पशुओं के थे। ज़रा उन विकृत रूपों पर विचार करो जिनसे इन लोगों ने बुद्धिमत्ता की रचना की है! मनुष्य का सर्वोच्च भाग तो स्वयं सद्गुण है। पर उसके साथ उन्होंने ऐसा शरीर जोड़ दिया है जो किसी वास्तविक उपयोग का नहीं, अस्थिर है और केवल भोजन को संचित रखने का पात्र मात्र है, जैसा कि पोसिडोनियस कहते हैं। इस प्रकार सद्गुण, जो दिव्यता का एक अंश है, जाकर एक चिपचिपे मांस-पिंड पर समाप्त होता है। उसके उन उच्च और वास्तव में दिव्य अंगों के साथ, जो श्रद्धा के योग्य हैं, उन्होंने एक ऐसे प्राणी को जोड़ दिया है जो सुस्त, निर्बल और रोगग्रस्त है। उनका दूसरा लक्ष्य, मानसिक क्लेश का अभाव। यद्यपि आत्मा को कोई सकारात्मक लाभ नहीं देता, फिर भी कम-से-कम उसके मार्ग की बाधाएँ तो दूर कर देता है। लेकिन इन्द्रिय-सुख तो इसके विपरीत आत्मा को ही दुर्बल बना देता है और उसकी सारी शक्ति को शिथिल कर देता है। इतने बेमेल तत्वों का ऐसा संयोग शायद ही कहीं और मिल सके। उन्होंने सबसे दृढ़ वस्तु को सबसे निर्बल वस्तु के साथ, सबसे गंभीर को सबसे तुच्छ के साथ और सबसे पवित्र को हर प्रकार की अनैतिकता के साथ जोड़ दिया है।
“इतनी जल्दी निष्कर्ष पर मत पहुँचो,” विरोधी कहता है। “यदि अच्छा स्वास्थ्य, विश्राम और पीड़ा का अभाव सद्गुण में कोई बाधा नहीं डालते तो क्या तुम उनका अनुसरण नहीं करोगे?” निश्चय ही करूँगा। लेकिन इसलिए नहीं कि वे अपने आप में शुभ हैं बल्कि इसलिए कि वे प्रकृति के अनुरूप हैं। उनका चुनाव करना मेरे लिए विवेकपूर्ण निर्णय का अभ्यास है। फिर उनमें शुभ क्या है? केवल यही कि उनका चयन उचित ढंग से किया गया है। देखो, जब मैं अच्छे वस्त्र पहनता हूँ, उचित ढंग से टहलता हूँ या जैसा करना चाहिए वैसा भोजन करता हूँ, तब शुभ वस्त्र, टहलना या भोजन नहीं होते। शुभ तो मेरी वह भावना और मंशा होती है जिसके द्वारा मैं प्रत्येक कार्य में तर्क के अनुरूप मर्यादा और संतुलन बनाए रखता हूँ। इसे मैं और स्पष्ट करता हूँ। स्वच्छ वस्त्र चुनना मनुष्य का कर्तव्य है क्योंकि मनुष्य स्वभाव से स्वच्छता और शालीनता को पसंद करने वाला प्राणी है। इसलिए स्वच्छ वस्त्र अपने आप में कोई शुभ नहीं हैं। शुभ तो उनका उचित चयन है। क्योंकि शुभता वस्तु में नहीं बल्कि उसके चयन की गुणवत्ता में निहित होती है। सम्माननीय वह कर्म है, न कि वे वस्तुएँ जिनके साथ वह कर्म किया जाता है। अब यही बात शरीर के संबंध में भी समझो। शरीर भी एक प्रकार का वस्त्र है, जिसमें प्रकृति ने आत्मा को मानो लपेट रखा है। पर भला किसने कभी वस्त्रों का मूल्य उस संदूक के आधार पर आँका है जिसमें उन्हें रखा जाता है? जैसे म्यान तलवार को न अच्छा बनाती है, न बुरा, उसी प्रकार शरीर भी आत्मा का मूल्य निर्धारित नहीं करता। इसलिए शरीर के विषय में भी मेरा उत्तर वही है। यदि मुझे चुनाव का अवसर दिया जाए, तो मैं अच्छा स्वास्थ्य और शारीरिक बल ही चुनूँगा। किंतु जो वास्तव में शुभ होगा, वह स्वास्थ्य और बल नहीं बल्कि उनके संबंध में मेरा विवेकपूर्ण निर्णय होगा।
“निस्संदेह बुद्धिमान व्यक्ति सुखी होता है। पर वह परम शुभ को तब तक प्राप्त नहीं करता, जब तक उसके पास प्रकृति द्वारा दिए गए कुछ साधन उपलब्ध न हों। इसलिए, यद्यपि सद्गुण से संपन्न व्यक्ति दुखी नहीं हो सकता, फिर भी यदि उसके पास अच्छा स्वास्थ्य और अक्षुण्ण शारीरिक अवस्था जैसे प्राकृतिक लाभ न हों तो वह पूर्णतः सुखी भी नहीं होता।” तुम ऐसी बात स्वीकार कर रहे हो जिस पर विश्वास करना और भी कठिन है। तुम यह मान लेते हो कि जो व्यक्ति अत्यंत तीव्र और निरंतर पीड़ा सह रहा है, वह केवल दुखी ही नहीं है बल्कि सुखी भी है। लेकिन तुम इस अपेक्षाकृत सरल बात को स्वीकार करने में हिचकते हो कि वही व्यक्ति पूर्णतः सुखी भी हो सकता है। यदि सद्गुण में इतनी शक्ति है कि वह किसी मनुष्य को दुखी होने से बचा सकता है तो उसके लिए उसे पूर्णतः सुखी बनाना तो और भी आसान होना चाहिए। आखिर सुखी और पूर्णतः सुखी होने के बीच का अंतर, दुखी और सुखी होने के बीच के अंतर से कहीं कम है। जो शक्ति किसी मनुष्य को विपत्तियों से निकालकर सुखी लोगों की श्रेणी में ला सकती है, क्या उसमें इतना सामर्थ्य भी नहीं होगा कि वह शेष छोटा-सा अंतर भी मिटाकर उसे पूर्णतः सुखी बना दे? क्या वह शिखर तक पहुँचते-पहुँचते ही अपनी शक्ति खो बैठती है?
जीवन में कुछ लाभ होते हैं और कुछ हानियाँ और दोनों ही हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। यदि सद्गुणी मनुष्य सभी प्रकार की हानियों से घिरा होने पर भी दुखी नहीं होता तो केवल कुछ लाभों के अभाव में वह पूर्णतः सुखी क्यों नहीं रह सकता? जैसे हानियों का बोझ उसे दुखी नहीं बना सकता, वैसे ही लाभों का अभाव उसे पूर्ण सुख से वंचित नहीं कर सकता। वह लाभों के बिना भी उतना ही पूर्णतः सुखी रहता है, जितना सभी हानियों के बीच भी दुःख से मुक्त रहता है। अन्यथा, यदि उसके भीतर का शुभ कुछ कम किया जा सकता है तो उसे पूरी तरह छीन भी लिया जा सकता है। जैसा कि मैंने थोड़ी देर पहले कहा था, सूर्य के प्रकाश में एक छोटी-सी चिंगारी कोई वृद्धि नहीं करती क्योंकि सूर्य का तेज अपने सामने हर उस प्रकाश को फीका कर देता है, जो उसके अभाव में दिखाई देता।
“लेकिन सूर्य का प्रकाश भी तो कभी-कभी कुछ वस्तुओं से ढक जाता है।” हाँ, परंतु सूर्य स्वयं कभी क्षीण नहीं होता, चाहे वह हमारी दृष्टि से ओझल ही क्यों न हो जाए। यदि कोई वस्तु हमारे और सूर्य के बीच आकर उसे देखने से रोक देती है, तब भी सूर्य अपना कार्य करता रहता है और अपने निर्धारित पथ पर निरंतर चलता रहता है। जब भी वह बादलों के बीच से निकलकर चमकता है, तब वह न तो पहले से छोटा होता है और न ही उसकी गति कम होती है। निर्मल आकाश और बादलों से ढके आकाश में केवल इतना अंतर है कि एक स्थिति में सूर्य दिखाई देता है और दूसरी में नहीं। किसी वस्तु का वास्तव में क्षीण होना और केवल दृष्टि से ओझल हो जाना, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। इसी प्रकार, जो परिस्थितियाँ सद्गुण के मार्ग में बाधा बनती हैं, वे उससे कुछ भी कम नहीं कर पातीं। सद्गुण घटता नहीं है। केवल उसका प्रकाश कभी-कभी कम दिखाई देता है। हो सकता है कि वह हमें पहले जैसी चमक के साथ दिखाई न दे। पर अपने भीतर वह वैसा ही रहता है और अपनी शक्ति को अदृश्य रूप से प्रकट करता रहता है, ठीक वैसे ही जैसे बादलों के पीछे छिपा हुआ सूर्य। इसलिए विपत्तियाँ, हानियाँ और अन्याय सद्गुण के विरुद्ध उतनी ही कम शक्ति रखते हैं, जितनी बादलों में सूर्य के विरुद्ध होती है।
हम जानते हैं कि कुछ लोग यह कहते हैं कि यदि कोई बुद्धिमान व्यक्ति शारीरिक रूप से विकलांग या अशक्त हो जाए, तो वह न तो दुखी होता है और न ही सुखी। यह भी एक भूल है। यह मत संयोगवश घटने वाली बाहरी घटनाओं को सद्गुणों के बराबर शक्ति दे देता है और सम्माननीय वस्तुओं का वही मूल्य ठहराता है जो वह उन वस्तुओं को देता है जिनमें सम्मान का कोई गुण नहीं है। इससे अधिक घृणित और तुच्छ बात और क्या हो सकती है कि सबसे उत्कृष्ट और आदरणीय गुणों की तुलना उन वस्तुओं से की जाए जो सम्मान के योग्य ही नहीं हैं? न्याय, धर्मनिष्ठा, सत्यनिष्ठा, साहस और विवेक, ये सब प्रशंसनीय हैं। इसके विपरीत, मज़बूत टाँगें, शक्तिशाली मांसपेशियाँ और स्वस्थ दाँत, ये केवल सामान्य शारीरिक विशेषताएँ हैं और अक्सर बिल्कुल साधारण लोगों में भी पाई जाती हैं। फिर यदि यह माना जाए कि शारीरिक कष्ट झेलने वाला बुद्धिमान व्यक्ति न तो दुःखी है और न ही सुखी बल्कि किसी बीच की अवस्था में है, तो उसका जीवन भी न तो वांछनीय होगा और न ही अवांछनीय। लेकिन यह कहना कि एक बुद्धिमान व्यक्ति का जीवन वांछनीय नहीं है, सर्वथा हास्यास्पद है। यह मानना भी अत्यंत अविश्वसनीय है कि जीवन की कोई ऐसी अवस्था हो सकती है जो न वांछनीय हो और न अवांछनीय। इसके अतिरिक्त, यदि शारीरिक हानियाँ किसी मनुष्य को दुखी बनाने की शक्ति नहीं रखतीं तो वे उसे सुखी होने से भी नहीं रोक सकतीं। क्योंकि जिन बातों में किसी स्थिति को बदतर बनाने की शक्ति ही नहीं है, वे उसे सर्वोत्तम बनने से भी नहीं रोक सकतीं।
विरोधी कहता है, “हम गर्म और ठंडे को जानते हैं और उनके बीच गुनगुना होता है। उसी प्रकार एक व्यक्ति सुखी होता है, दूसरा दुःखी और तीसरा न सुखी होता है, न दुखी।” मैं इस उपमा की त्रुटि दिखाना चाहता हूँ। यदि मैं गुनगुने पानी में और अधिक ठंडक मिला दूँ तो वह ठंडा हो जाएगा और यदि उसमें अधिक गर्मी जोड़ दूँ तो वह अंततः गर्म हो जाएगा। लेकिन जिस व्यक्ति की तुम कल्पना करते हो कि वह न सुखी है और न दुखी, उसके ऊपर चाहे मैं कितने ही दुख बढ़ा दूँ, तुम्हारे अपने सिद्धांत के अनुसार वह तब भी दुखी नहीं बनेगा। इसलिए यह उपमा यहाँ लागू ही नहीं होती। अब मैं इस कल्पित व्यक्ति को तुम्हारे हवाले करता हूँ। मैं उसे अंधापन दे देता हूँ, फिर भी वह दुखी नहीं होता। मैं उसमें शारीरिक दुर्बलता जोड़ देता हूँ, फिर भी वह दुखी नहीं होता। मैं उसे निरंतर और असहनीय पीड़ाओं से घेर देता हूँ, तब भी वह दुखी नहीं होता। यदि इतनी सारी विपत्तियाँ भी उसे दुखी नहीं बना सकतीं, तो वे उसे सुखी जीवन से भी वंचित नहीं कर सकतीं। यदि, जैसा कि तुम स्वयं स्वीकार करते हो, बुद्धिमान व्यक्ति सुख की अवस्था से गिरकर दुख की अवस्था में नहीं पहुँच सकता तो वह ऐसी अवस्था में भी नहीं पहुँच सकता जो सुखी न हो। आख़िर जो व्यक्ति गिरना शुरू करता है, वह बीच में ही क्यों रुक जाएगा? जो शक्ति उसे नीचे की अंतिम सीमा तक गिरने नहीं देती, वही उसे सर्वोच्च स्थिति पर भी बनाए रखती है। इसलिए सुखी जीवन को नष्ट नहीं किया जा सकता। बल्कि उसे थोड़ा-सा भी कम नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि सद्गुण अकेला ही सुखी जीवन के लिए पर्याप्त आधार है।
“यदि ऐसा है तो वह बुद्धिमान व्यक्ति, जिसने अधिक समय तक जीवन जिया है और जिसे पीड़ा का सामना नहीं करना पड़ा, उस व्यक्ति से अधिक सुखी क्यों नहीं है जिसने जीवन भर विपत्तियों का सामना किया है?” मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या वह इसलिए अधिक श्रेष्ठ और अधिक सद्गुणी भी है? यदि नहीं तो वह अधिक सुखी भी नहीं हो सकता। अधिक सुखी होने के लिए आवश्यक है कि वह अधिक सदाचारी जीवन जिए। यदि उसके लिए अधिक सदाचारी होना संभव नहीं है तो उसके लिए अधिक सुखी होना भी संभव नहीं है। सद्गुण में कम या अधिक का कोई स्थान नहीं होता और इसलिए सुख, जो सद्गुण पर आधारित है, उसमें भी कम या अधिक का कोई स्थान नहीं होता। देखो, सद्गुण इतना महान शुभ है कि अकाल मृत्यु, शारीरिक पीड़ा या शरीर की विभिन्न व्याधियों जैसी छोटी-छोटी बाहरी बातें उसमें तनिक भी कमी नहीं ला सकतीं। जहाँ तक इन्द्रिय-सुख का प्रश्न है, सद्गुण तो उसकी ओर ध्यान देना भी अपनी गरिमा के विरुद्ध समझता है। सद्गुण की एक विशेषता यह भी है कि उसे भविष्य की कोई आवश्यकता नहीं होती और वह अपने जीवन के दिनों की गणना नहीं करता। वह एक क्षण के भीतर ही शाश्वत कल्याण का पूर्ण आनंद प्राप्त कर लेता है।
हमें ये बातें अविश्वसनीय और मानवीय स्वभाव से परे लगती हैं। इसका कारण यह है कि हम सद्गुण की महानता का आकलन अपनी ही दुर्बलता के आधार पर करते हैं और अपने दोषों को ही सद्गुण का नाम दे देते हैं। लेकिन ठहरो। क्या हमें यह बात भी उतनी ही अविश्वसनीय नहीं लगती कि कोई व्यक्ति असहनीय यातना सहते हुए भी कहे, “मैं सुखी हूँ”? फिर भी ऐसे शब्द सुखवाद के विद्यालय के भीतर ही सुनने को मिले हैं। एपिक्यूरस ने, जब वह मूत्ररुद्धता और पेट के असाध्य घाव, इन दोनों भीषण पीड़ाओं से एक साथ ग्रस्त था, तब कहा था, “मेरे जीवन का यह अंतिम दिन सबसे अधिक सुखद है।” तो फिर जो लोग सद्गुण का अनुसरण करते हैं, उनके विषय में ऐसी बात अविश्वसनीय क्यों मानी जाए। जबकि यही बात सुख को जीवन का लक्ष्य मानने वालों में भी दिखाई देती है? ये लोग भी, अपनी हीन और पतित मानसिकता के बावजूद, कहते हैं कि यदि बुद्धिमान व्यक्ति अत्यंत भीषण पीड़ाओं और विपत्तियों का सामना करे, तो वह न दुःखी होगा और न सुखी।लेकिन यह बात भी अविश्वसनीय है बल्कि उससे भी अधिक अविश्वसनीय। क्योंकि मैं नहीं समझता कि सद्गुण, यदि अपने सर्वोच्च स्थान से नीचे गिरा दिया जाए, तो बीच में कहीं कैसे ठहर सकता है। या तो वह मनुष्य को सुखी बनाए रखेगा, या यदि वह उस स्थान से हट गया तो फिर वह मनुष्य को दुःखी होने से भी नहीं बचा सकेगा।जब तक सद्गुण अपने स्थान पर दृढ़ता से खड़ा है, तब तक उसे पराजित नहीं किया जा सकता। अंततः या तो वही विजय प्राप्त करेगा या स्वयं पराजित हो जाएगा।
“पूर्ण सद्गुण और पूर्ण सुखी जीवन तो केवल अमर देवताओं के ही भाग्य में है। मनुष्यों को तो उन श्रेष्ठ वस्तुओं की केवल छाया और आभास ही मिल सकता है। हम उनके निकट तो पहुँचते हैं, पर उन्हें वास्तव में प्राप्त नहीं कर पाते।” ऐसा नहीं है। देवताओं और मनुष्यों में एक बात समान है, दोनों के पास तर्कशक्ति है। अंतर केवल इतना है कि देवताओं में वह पूर्ण रूप से विकसित है। जबकि हमारे भीतर उसमें पूर्णता प्राप्त करने की क्षमता है। समस्या यह है कि हमारी अपनी कमजोरियाँ हमें निराश कर देती हैं। जो व्यक्ति अभी दूसरे स्तर पर है अर्थात जो हर परिस्थिति में सदैव सही आचरण पर अडिग नहीं रह पाता, जिसका निर्णय अभी भी भूल कर सकता है और जिसकी बुद्धि अभी पूरी तरह दृढ़ नहीं हुई है। वह भी लक्ष्य के बहुत निकट पहुँच चुका है।मान लो कि ऐसे व्यक्ति के पास दृष्टि न हो, श्रवण-शक्ति न हो, अच्छा स्वास्थ्य न हो, आकर्षक रूप न हो और न ही अपने सभी अंगों सहित लंबा जीवन मिला हो। फिर भी, इन सभी अभावों के बावजूद वह ऐसा जीवन जी सकता है, जिस पर उसे कोई पश्चाताप न हो। लेकिन जो व्यक्ति अभी पूर्ण नहीं हुआ है, उसके भीतर बुराई की ओर झुकने की कुछ प्रवृत्ति अभी भी बनी रहती है। उसका मन अब भी कभी-कभी गलत कर्म की ओर प्रेरित हो सकता है, यद्यपि गहराई तक जमी हुई और सक्रिय दुष्टता उससे समाप्त हो चुकी होती है। वह अभी वास्तव में सद्गुणी नहीं है। वह केवल उस दिशा में ढल रहा है। और जो व्यक्ति सद्गुण की दृष्टि से किसी भी बात में अपूर्ण है, वह अभी भी सद्गुणी नहीं बल्कि उसी अपूर्णता के कारण दोषयुक्त है।
लेकिन जो व्यक्ति, जैसा कि कवि कहता है, “अपने शरीर में साहस और पुरुषार्थ की भावना रखता है,” वह देवताओं के समकक्ष खड़ा होता है और उनकी ओर अग्रसर होता है क्योंकि उसे अपने उद्गम का स्मरण रहता है। जिस स्थान से हम आए हैं, उसी तक पुनः पहुँचने का प्रयास करने में कोई अनुचित बात नहीं है। वास्तव में, यह मानने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जो स्वयं ईश्वर का एक अंश है, उसमें कुछ दिव्य अवश्य है।यह समस्त ब्रह्मांड, जिसमें हम निवास करते हैं, एक अखंड सत्ता है। वही ईश्वर है। हम ईश्वर के सहचर हैं, ईश्वर के ही अंग हैं। हमारे मन में भी वही सामर्थ्य है। यदि वह अपने दोषों के बोझ से दबा न हो तो वह भी उसी दिव्य ऊँचाई तक पहुँच सकता है। जिस प्रकार हमारा शरीर सीधा खड़ा होता है और उसकी दृष्टि आकाश की ओर रहती है, उसी प्रकार हमारा मन भी जहाँ तक चाहे वहाँ तक उन्नति कर सकता है। स्वयं प्रकृति ने उसे इस प्रकार बनाया है कि वह दिव्य स्तर की वस्तुओं की आकांक्षा करे। यदि वह अपनी अंतर्निहित शक्ति का पूरा उपयोग करे और अपनी पूर्ण क्षमता तक विकसित हो जाए तो उसे शिखर तक पहुँचने के लिए किसी बाहरी मार्गदर्शक की आवश्यकता नहीं होती। अपनी ही प्रकृति उसका मार्ग बन जाती है।
स्वर्ग तक पहुँचना निश्चय ही एक महान कार्य प्रतीत होता है। पर वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि मन तो केवल वहीं लौट रहा होता है जहाँ से वह आया था। एक बार जब उसे मार्ग मिल जाता है, तब वह निर्भीक होकर आगे बढ़ता है। वह अन्य सभी वस्तुओं को तुच्छ समझता है और धन, सोने तथा चाँदी की बिल्कुल परवाह नहीं करता। उन धातुओं की, जो उसी अंधकार में पड़ी रहने के योग्य थीं जहाँ वे पहले छिपी हुई थीं। वह उनके मूल्य का आकलन उस चमक से नहीं करता जो अज्ञानी लोगों की आँखों को चकाचौंध कर देती है बल्कि उस निकृष्ट धातु और मिट्टी से करता है, जिसमें से मनुष्य के लोभ ने उन्हें खोदकर अलग किया है। अर्थात उदात्त आत्मा यह जानती है कि सच्ची संपत्ति किसी खज़ाने में नहीं बल्कि कहीं और है। जिसे वास्तव में परिपूर्ण होना चाहिए, वह धन का संदूक नहीं बल्कि स्वयं मनुष्य का अपना व्यक्तित्व है। मन को यह अधिकार है कि वह समस्त वस्तुओं का स्वामी बने, उसे समूचे विश्व का अधिकार प्राप्त हो, और उसकी संपत्ति पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई हो। देवताओं की भाँति वह सब कुछ अपना मान सकता है। उस उच्च स्थान से वह धनी लोगों को उनकी अपार संपत्ति के बीच देखकर भी उन पर दृष्टि डालता है और समझता है कि वे अपनी संपत्ति से जितने प्रसन्न नहीं हैं। उससे कहीं अधिक दूसरों की संपत्ति को देखकर दुखी रहते हैं।
जब मन इस ऊँचाई तक पहुँच जाता है, तब वह शरीर को भी केवल एक आवश्यक बोझ समझता है। ऐसी वस्तु जिसकी देखभाल तो करनी चाहिए। पर उससे आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। वह स्वयं को उस वस्तु का दास नहीं बनाता, जिस पर उसे शासन करना चाहिए। जो व्यक्ति शरीर का दास है, वह कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता। केवल इसलिए नहीं कि शरीर की अत्यधिक चिंता करने वाला अनेक अन्य स्वामियों का भी दास बन जाता है बल्कि इसलिए भी कि स्वयं शरीर ही एक चिड़चिड़ा और मनमौजी स्वामी है। ऐसा मन कभी शांतिपूर्वक तो कभी एक महान छलाँग लगाकर शरीर से विदा हो जाता है। तब उसे इस बात की कोई चिंता नहीं रहती कि उसके छोड़ जाने के बाद शरीर का क्या होगा। जैसे हम अपनी दाढ़ी या सिर से कटे हुए बालों की कोई परवाह नहीं करते, उसी प्रकार जब यह दिव्य आत्मा मनुष्य को छोड़कर जाने वाली होती है, तब उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता कि उसके शरीर का आगे क्या होगा। वह जलाया जाएगा, दफ़नाया जाएगा या जंगली पशुओं द्वारा नोच लिया जाएगा। जिस प्रकार अभी-अभी जन्मे शिशु को उस झिल्ली की कोई चिंता नहीं होती जिससे वह जन्मा है, उसी प्रकार आत्मा को भी अपने छोड़े हुए शरीर की कोई चिंता नहीं होती। यदि पक्षी उस शव को टुकड़े-टुकड़े कर दें या वह समुद्री जीवों का आहार बन जाए तो उससे उस व्यक्ति का क्या बिगड़ता है, जो अब स्वयं कुछ भी नहीं रहा? लेकिन जब तक आत्मा जीवितों के बीच रहती है, तब भी क्या वह मृत्यु के बाद मिलने वाले ऐसे अपमानों से भयभीत होगी, जबकि उसे केवल मृत्यु की धमकियाँ ही पर्याप्त नहीं लगीं? वह कहती है, “मैं जल्लाद के लोहे के काँटे से नहीं डरता, न ही अपने शव का अपमान करने के लिए किए जाने वाले घृणित अंग-भंग से। मैं किसी से अपने अंतिम संस्कार की याचना नहीं करता और न ही अपने अवशेषों को किसी के भरोसे छोड़ता हूँ। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था की है कि कोई भी बिना कब्र के नहीं रहता। जिसे क्रूरता खुला छोड़ देगी, उसे समय स्वयं दफ़ना देगा।” मैकेनस ने इस विचार को बड़े सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है—
“मुझे कब्र की कोई चिंता नहीं। जिन्हें लोग यूँ ही छोड़ देते हैं, उन्हें प्रकृति स्वयं दफ़ना देती है।”
ऐसा लगता है मानो यह किसी पूर्ण शस्त्र-सज्जित सैनिक का कथन हो। वास्तव में मैकेनस में महान और पुरुषोचित प्रतिभा थी। यदि निरंतर ऐश्वर्य ने उसे शिथिल और विलासी न बना दिया होता तो वह और भी महान सिद्ध होता।
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