Monday, 27 July 2026

दर्शन ने क्या-क्या किया है, के बारे में -- पत्र - 88 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


कौन इस बात पर संदेह कर सकता है, प्रिय लूसीलियस, कि हमारा जीवन अमर देवताओं का उपहार है, परन्तु अच्छा जीवन जीने की कला दर्शन का उपहार है? इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि हम दर्शन के प्रति देवताओं से भी अधिक ऋणी हैं क्योंकि केवल जीवन की अपेक्षा उत्तम जीवन कहीं बड़ा वरदान है। फिर भी ऐसा तभी तक कहा जा सकता है, जब तक यह न याद रखा जाए कि स्वयं दर्शन भी देवताओं का ही दिया हुआ उपहार है। उन्होंने किसी को भी दर्शन का ज्ञान जन्म से नहीं दिया। परन्तु उसे प्राप्त करने की क्षमता सभी को प्रदान की है। यदि उन्होंने इस ज्ञान को सबका जन्मसिद्ध अधिकार बना दिया होता और प्रत्येक मनुष्य को जन्म से ही विवेकवान बना दिया होता तो बुद्धिमत्ता अपनी सबसे बड़ी विशेषता खो बैठती। वह संयोग से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। इसके विपरीत, उसका वास्तविक मूल्य और गौरव इसी में है कि वह अपने-आप नहीं मिलती। उसके लिए हमें स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है। उसके लिए हम स्वयं अपने प्रति ऋणी होते हैं, किसी दूसरे से उसे माँगने या प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि दर्शन केवल एक उपहार भर होता तो उसमें प्रशंसा करने योग्य क्या रह जाता? 




    दर्शन का एकमात्र कार्य मानव और दैवीय विषयों के संबंध में सत्य की खोज करना है। दर्शन कभी भी भक्ति, श्रद्धा, न्याय तथा अन्य सभी परस्पर जुड़े और एक-दूसरे का सहारा बनने वाले सद्गुणों से अलग नहीं होता। वह हमें दैवीय सत्ता का सम्मान और उपासना करना सिखाता है तथा मनुष्यों से प्रेम करना भी सिखाता है। वह यह बताता है कि शक्ति देवताओं के अधीन है। जबकि मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ने वाली शक्ति सामाजिकता है।यह सामाजिकता बहुत लंबे समय तक निष्कलुष बनी रही। परंतु लोभ ने अंततः इस पारस्परिक बंधन को तोड़ दिया। लोभ ने उन लोगों को भी दरिद्र बना दिया जिन्हें उसने सबसे अधिक धनवान बनाया था क्योंकि जैसे ही मनुष्यों ने निजी स्वामित्व को अपनाया, उन्होंने सब कुछ मिल-जुलकर साझा रखना छोड़ दिया। 

    किन्तु प्रथम मनुष्य और उनके वे वंशज, जो प्रकृति के मार्ग से विचलित हुए बिना उसी के अनुसार जीवन जीते थे, किसी श्रेष्ठ व्यक्ति को अपना नेता और अपना नियम, दोनों मानते थे तथा स्वयं को उसके अधिकार के अधीन सौंप देते थे। क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि जो हीन है, वह श्रेष्ठ के अधीन रहता है। पशुओं के झुंडों में नेतृत्व सामान्यतः सबसे बड़े या सबसे प्रचंड प्राणी के हाथ में होता है। गायों के झुंड का अगुआ कोई दुर्बल बैल नहीं होता बल्कि वही होता है जो आकार और शक्ति में अन्य नर बैलों से बढ़कर हो। हाथियों के झुंड का नेतृत्व भी सबसे विशाल हाथी करता है। किन्तु मनुष्यों में महत्व शरीर के आकार का नहीं बल्कि चरित्र और उत्कृष्टता का होता है। इसलिए प्राचीन काल में नेताओं का चयन उनके मानसिक गुणों और सद्गुणों के आधार पर किया जाता था। यही कारण है कि वे समाज सबसे अधिक सौभाग्यशाली थे, जो केवल योग्यता के आधार पर सत्ता सौंपते थे। जिस व्यक्ति को यह विश्वास हो कि उसे उतनी ही शक्ति का प्रयोग करना चाहिए जितनी उचित है। उससे अधिक नहीं, उसकी शक्ति पर अंकुश लगाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। 

    इसी कारण पोसिडोनियस (Posidonius) का मत है कि तथाकथित स्वर्णयुग में शासन बुद्धिमान व्यक्तियों के हाथों में था। वे हिंसा और अत्याचार को रोकते थे, शक्तिशाली लोगों से निर्बलों की रक्षा करते थे, राज्य का संचालन करते थे और लोगों को बताते थे कि क्या उनके हित में है और क्या नहीं। उनकी बुद्धिमत्ता यह सुनिश्चित करती थी कि उनकी प्रजा को किसी वस्तु का अभाव न हो। उनका साहस उन्हें संकटों से सुरक्षित रखता था। उनकी उदारता अपनी प्रजा की समृद्धि को बढ़ाती थी। वे दूसरों पर प्रभुत्व जमाने के लिए नहीं बल्कि उनकी सेवा करने के लिए शासन करते थे। वे कभी भी अपनी शक्ति का प्रयोग उन्हीं लोगों के विरुद्ध नहीं करते थे, जिनसे उन्हें प्रारम्भ में वह शक्ति प्राप्त हुई थी। उनमें न तो अन्याय करने की इच्छा थी और न ही उसका कोई कारण। क्योंकि उनके आदेश न्यायसंगत होते थे। इसलिए उनका पालन भी स्वेच्छा से और उचित रूप से किया जाता था। किसी राजा के लिए अपनी आज्ञा न मानने वाली प्रजा के विरुद्ध इससे बड़ी कोई धमकी नहीं हो सकती थी कि वह स्वयं राजपद त्याग देगा।

    लेकिन जब दुर्गुणों के प्रवेश से राजतंत्र अत्याचारी शासन में बदल गए, तब कानूनों की आवश्यकता उत्पन्न हुई। इन कानूनों की रचना भी सबसे पहले बुद्धिमानों ने ही की। सोलन, जिसने न्याय और समानता के सिद्धांत पर एथेंस की शासन-व्यवस्था स्थापित की, उन सात महापुरुषों में से एक था जो अपनी बुद्धिमत्ता के कारण प्रसिद्ध हुए। यदि लाइकर्गस उसी काल में जीवित होता तो वह उस धन्य समूह का आठवाँ सदस्य होता। आज भी हम ज़ालेयूकस और कैरोंडास के बनाए हुए कानूनों का सम्मान करते हैं। इन लोगों ने सिसिली (जो उस समय अत्यंत समृद्ध था) तथा इटली के यूनानी नगरों के लिए जिन न्याय-सिद्धांतों की स्थापना की, उनका ज्ञान उन्होंने न तो न्यायालयों में प्राप्त किया था और न ही विधिवेत्ताओं के कार्यालयों में बल्कि पाइथागोरस के शांत और पवित्र आश्रम में प्राप्त किया था।

    अब तक मैं पोसिडोनियस से सहमत हूँ। परन्तु मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि दर्शन ने उन कलाओं और तकनीकों का आविष्कार किया जिनका हम अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। मैं दर्शन को वह यश नहीं दूँगा जो वास्तव में शिल्प-कला और कारीगरी का है। उसके अनुसार—

“जब मनुष्य इधर-उधर बिखरे हुए रहते थे और झोपड़ियों, गुफाओं या वृक्षों के खोखलों में आश्रय लेते थे, तब दर्शन ने ही उन्हें घर बनाना सिखाया।”

    मेरे विचार से न तो दर्शन ने आज की तरह ऊँची-ऊँची बहुमंज़िला इमारतें बनाना सिखाया और न ही बड़े-बड़े शहर बसाने की कला दी। उसी तरह यह भी दर्शन नहीं था जिसने मछलियों को पिंजरों में पालने का तरीका निकाला ताकि स्वाद के पीछे पागल लोग तूफ़ान का खतरा उठाए बिना ही बंदरगाह की सुरक्षित जगह पर हर तरह की मछलियाँ मोटी करते रहें, चाहे समुद्र में कितना भी भयंकर मौसम क्यों न हो। क्या आप कहेंगे कि लोगों को ताले लगाकर चीज़ें सुरक्षित रखना भी दर्शन ने सिखाया? क्या यही वह बात नहीं थी जिसने लालच को बढ़ावा दिया? क्या दर्शन ने ही ऐसी ऊँची-ऊँची इमारतें बनवाईं, जो अपने ही रहने वालों के लिए खतरा बन जाती हैं? मानो लोगों के लिए अपने आस-पास आसानी से मिलने वाली चीज़ों से घर बना लेना ही काफ़ी न था और बिना किसी विशेष कला या कठिन मेहनत के प्रकृति से मिला आश्रय उनके लिए पर्याप्त न था। 

    मेरा विश्वास कीजिए, वह समय सचमुच सुखी था जब न वास्तुकार थे और न बड़े-बड़े भवन बनाने वाले कारीगर। ये सारी कलाएँ और साधन तब आए, जब लोगों में आराम, ऐश्वर्य और भोग-विलास की चाह बढ़ गई। तभी लकड़ियों को बराबर आकार में काटा जाने लगा, आरी से उन पर सीधी रेखाओं के अनुसार चीरा लगाया जाने लगा और बहुत बारीकी से बढ़ईगिरी होने लगी। आदिम लोग तो मुलायम लकड़ी को केवल फाँकों (कीलों जैसे लकड़ी के टुकड़ों) की मदद से चीर लेते थे। 

    और ऐसा करना उनके लिए स्वाभाविक भी था क्योंकि वे किसी भविष्य के भव्य भोज-भवन की छत नहीं बना रहे थे। उस समय सड़कों पर देवदार और फर के विशाल पेड़ों को ढोने वाली लंबी-लंबी गाड़ियों की कतारें नहीं चलती थीं, जो सोने से सजी हुई छतों को सहारा देने के लिए लकड़ी पहुँचाती थीं। उनकी झोपड़ियाँ दोनों ओर गाड़े गए दोमुंहे खंभों पर टिकी होती थीं। शाखाओं के गट्ठरों और ढलान बनाकर बिछाई गई पत्तियों की मोटी परतों से बनी छत पर बारिश का पानी आसानी से बह जाता था, चाहे वर्षा कितनी ही तेज़ क्यों न हो। ऐसी छतों के नीचे वे पूरी सुरक्षा के साथ रहते थे। घास-फूस की उनकी झोपड़ियाँ उन्हें स्वतंत्र जीवन देती थीं। लेकिन जो लोग संगमरमर और सोने के महलों में रहते हैं, वे वास्तव में दासता में जीते हैं। 

    पोसिडोनियस की एक और बात से भी मैं सहमत नहीं हूँ। उसका कहना है कि लोहे के औज़ारों का आविष्कार बुद्धिमान लोगों ने किया था। मेरे विचार में यह बात भी सही नहीं है। अगर ऐसा माना जाए तो फिर यह भी कहना पड़ेगा कि बुद्धिमान लोगों ने ही "जंगली जानवरों को फँसाना सीखा, पक्षियों के लिए जाल बिछाए और जंगल की घाटियों के चारों ओर शिकार के लिए कुत्तों को तैनात किया।" 

    यह सब बुद्धिमानी से नहीं बल्कि इंसान की सूझ-बूझ और काम निकालने की क्षमता से खोजा गया था। मैं पोसिडोनियस की इस बात से भी सहमत नहीं हूँ कि जंगलों में आग लगने पर, जब धरती झुलस गई और उसकी ऊपरी परत के पास मौजूद धातु की नसों से पिघलकर लोहा और ताँबा बाहर निकल आया, तब उन धातुओं की खोज बुद्धिमान लोगों ने की थी। ऐसी चीज़ों की खोज वे लोग करते हैं जिनकी रुचि और काम ही इन्हीं बातों से जुड़ा होता है। फिर, पोसिडोनियस के विपरीत, मुझे यह भी कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं लगता कि हथौड़ा पहले बना या चिमटा। ये दोनों औज़ार किसी ऐसे व्यक्ति ने बनाए होंगे जिसकी बुद्धि तेज़ और काम करने में कुशल थी, लेकिन जो कोई महान या असाधारण बुद्धिमान व्यक्ति नहीं था। यही बात उन सभी चीज़ों पर लागू होती है, जिनकी खोज ऐसे लोग करते हैं जो झुककर मेहनत करते हैं और जिनका ध्यान हमेशा ज़मीन पर, अपने काम पर लगा रहता है। 

    बुद्धिमान व्यक्ति सादा जीवन जीता था। उसे ऐसा ही होना भी चाहिए था। आज के समय में भी सच्चा बुद्धिमान वही है जो अपने ऊपर जितना कम बोझ रख सके, उतना अच्छा समझे। मैं आपसे पूछता हूँ, आप एक साथ डायोजनीज़ और डेडलस, दोनों की प्रशंसा कैसे कर सकते हैं? आपके विचार में इनमें से वास्तव में बुद्धिमान कौन है? वह जिसने आरी का आविष्कार किया या वह जिसने एक लड़के को अपनी हथेली से पानी पीते देखा और तुरंत अपने झोले से प्याला निकालकर तोड़ दिया? फिर उसने स्वयं को डाँटते हुए कहा, "मैं कितना मूर्ख था कि इतने समय तक यह बेकार का सामान अपने साथ ढोता रहा!" इसके बाद वह अपने पीपे में जाकर लेट गया और सो गया। इसी तरह, आज आपके अनुसार अधिक बुद्धिमान कौन है? वह जो ऐसी तरकीब निकालता है कि छिपी हुई नलियों से केसर मिला हुआ सुगंधित पानी बहुत ऊँचाई तक फूटने लगे, जो एक झटके में पानी की धाराएँ भर और खाली कर दे, जो भोजन-कक्ष की छत पर चलने वाले पट बनाए ताकि हर नए पकवान के साथ उसकी सजावट भी तुरंत बदल जाए या फिर वह व्यक्ति, जो खुद भी समझता है और दूसरों को भी समझाता है कि प्रकृति ने हमसे कोई कठिन या कठोर माँग नहीं की है कि हम संगमरमर तराशने वाले कारीगरों और बड़े-बड़े निर्माण करने वाले इंजीनियरों के बिना भी घर बना सकते हैं कि रेशम के व्यापार के बिना भी कपड़े पहन सकते हैं और यह कि धरती की सतह पर जो कुछ प्रकृति ने हमें दिया है, यदि हम उसी में संतुष्ट रहना सीख लें तो हमारी ज़रूरत की हर चीज़ हमारे पास होगी। जिस दिन मनुष्य इस व्यक्ति की बात ध्यान से सुनने लगेगा, उस दिन उसे समझ में आ जाएगा कि रसोइए उतने ही अनावश्यक हैं, जितने सैनिक। 

    बुद्धिमान लोग या कम-से-कम वे लोग जो बुद्धिमानों जैसे थे, शरीर की सुरक्षा को बहुत सरल बात मानते थे। जीवन की ज़रूरी चीज़ें बहुत कम मेहनत से मिल जाती हैं। असली मेहनत तो आराम और विलास की चीज़ें जुटाने में लगती है। यदि आप प्रकृति का साथ दें तो आपको किसी कारीगर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। प्रकृति ने कभी नहीं चाहा कि हम इन बातों में अपनी जान खपा दें। उसने हमें अपनी सभी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पहले से ही पर्याप्त साधन दे दिए हैं। "नंगा शरीर ठंड कैसे सह सकता है?" तो फिर क्या हुआ? क्या जंगली जानवरों और दूसरे पशुओं की खाल ठंड से पूरी तरह बचाने के लिए काफ़ी नहीं है? क्या बहुत-से लोग पेड़ों की छाल से अपने शरीर को नहीं ढकते या पक्षियों के पंखों से कपड़े नहीं बनाते? क्या आज भी अधिकांश स्किथियन (मध्य एशिया के घुमंतू लोग) लोमड़ी और मार्टेन जैसे जानवरों की खाल नहीं पहनते? ये खालें छूने में मुलायम होती हैं और तेज़ हवा को भी अंदर नहीं आने देतीं। फिर बताइए, ऐसा कौन है जो टहनियों से एक ढाँचा न बना सके, उस पर साधारण मिट्टी न पोत सके, उसे घास-फूस या झाड़ियों से न ढक सके और पूरी सर्दी आराम और सुरक्षा से न बिता सके। जबकि बारिश का पानी उसकी छत से बहकर नीचे गिरता रहे? "लेकिन गर्मियों की तेज़ धूप से बचने के लिए तो गहरी छाया चाहिए।" तो फिर क्या? क्या बहुत पुराने समय से ऐसी गुफाएँ नहीं हैं, जो समय के बीतने या किसी प्राकृतिक कारण से अपने-आप बन गईं? क्या यह सच नहीं है कि उत्तरी अफ्रीका और दूसरे बहुत गर्म इलाकों के लोग ज़मीन खोदकर बनाए गए घरों में रहते हैं? जब कोई और उपाय काम नहीं आता, तब वे उसी तपी हुई धरती के भीतर रहकर गर्मी से अपनी रक्षा करते हैं। 

    प्रकृति हमारे साथ इतनी अन्यायी नहीं थी कि उसने दूसरे सभी जीवों के लिए जीवन आसान बना दिया हो। लेकिन मनुष्य के लिए बिना तरह-तरह की तकनीकी कलाओं के जीना असंभव कर दिया हो। उसने हमसे कोई कठोर माँग नहीं की। हमारे जीवन के लिए जो भी ज़रूरी था, उसे पाना कठिन नहीं बनाया। हम ऐसी दुनिया में पैदा हुए थे जहाँ हमारी ज़रूरत की चीज़ें पहले से ही मौजूद थीं। मुश्किलें हमने खुद पैदा कीं क्योंकि हमने आसान चीज़ों को तुच्छ समझना शुरू कर दिया। घर, कपड़े, शरीर को गर्म रखने के साधन, भोजन बल्कि वे सारी चीज़ें जो आज बहुत बड़ा कारोबार बन चुकी हैं, उस समय आसानी से उपलब्ध थीं। वे बिना किसी कीमत के मिल जाती थीं और उन्हें पाने के लिए बहुत कम मेहनत करनी पड़ती थी। क्योंकि कोई भी अपनी ज़रूरत से ज़्यादा नहीं लेता था। इन चीज़ों को महँगा, दुर्लभ और अनेक कठिन कलाओं तथा हुनरों से ही हासिल किया जा सकने वाला हमने स्वयं बना दिया है। 

    प्रकृति हमारी ज़रूरत की हर चीज़ देती है। लेकिन भोग-विलास ने प्रकृति का साथ छोड़ दिया है। वह हर दिन अपनी इच्छाओं को और बढ़ाता है, हर बीतती सदी के साथ फैलता जाता है और अपनी ही चतुराई से बुराइयों को बढ़ावा देता है। पहले इंसान ने उन चीज़ों की इच्छा की जो ज़रूरी नहीं थीं। फिर उसने उन चीज़ों की चाह की जो उसके लिए नुकसानदेह थीं। और अब तो हालत यह है कि उसने अपने मन को ही शरीर का गुलाम बना दिया है। अब मन का काम केवल शरीर की हर इच्छा पूरी करना रह गया है। समाज में जितने भी शोर-शराबे वाले धंधे और कारोबार चल रहे हैं, वे सब शरीर की सेवा के लिए हैं। एक समय था जब शरीर को उतना ही दिया जाता था जितना किसी नौकर को काम चलाने के लिए दिया जाता है। लेकिन आज शरीर मालिक बन बैठा है और उसकी हर माँग पूरी की जाती है। इसीलिए कहीं कपड़ों के बड़े-बड़े कारोबार दिखाई देते हैं, कहीं तरह-तरह के कारीगरों की कार्यशालाएँ। कहीं रसोइयों के बनाए सुगंधित और लुभावने व्यंजन हैं तो कहीं नृत्य सिखाने वालों की आकर्षक अदाएँ और मन को लुभाने वाले, कोमल और बनावटी गीत-संगीत। एक समय था जब हम अपनी इच्छाओं को केवल ज़रूरत भर की चीज़ों तक सीमित रखते थे और उतना ही चाहते थे जितना हमारी सामर्थ्य में था। लेकिन अब वह सीमा मिट चुकी है। आज यदि कोई व्यक्ति केवल उतना ही चाहता है जितना उसके लिए पर्याप्त है तो लोग उसे असभ्य, पिछड़ा और गरीब समझते हैं। 

    प्रिय लूसीलियस, यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि बड़े-बड़े विद्वान भी कभी-कभी अपनी भाषा की चमक और अपनी बात कहने के आनंद में इतने बह जाते हैं कि सच्चाई से भटक जाते हैं। उदाहरण के लिए पोसिडोनियस को ही देखिए। मेरे विचार में उसने दर्शन को बहुत बड़ा योगदान दिया है। लेकिन जब वह यह बताने लगता है कि ऊन के ढीले गुच्छों से कुछ रेशों को कैसे मरोड़ा जाता है, कुछ को कैसे खींचकर धागा बनाया जाता है, फिर कैसे करघे पर लटके हुए भार ताने के धागों को सीधा और तना हुआ रखते हैं और कैसे बाने के धागे को कसकर दबाया जाता है ताकि ताने के मोटे धागों के बीच कपड़ा अच्छी तरह बुना जा सके तो वह यह दावा करने लगता है कि बुनाई की कला का आविष्कार भी बुद्धिमान लोगों ने ही किया था। वह यह भूल जाता है कि बुनाई की यह जटिल विधि बहुत बाद में विकसित हुई, जिसमें—

"ताना करघे के बीम पर कसकर बाँधा जाता है। सरकंडे की कंघी से धागों को अलग-अलग रखा जाता है। बाने का धागा नाव जैसी छोटी शटल के सहारे उनके बीच से निकाला जाता है और फिर चौड़े दाँतेदार कंघे से उसे कसकर बैठा दिया जाता है।"

अगर पोसिडोनियस आज के करघों को देखता, जो इतने महीन और पारदर्शी कपड़े बनाते हैं कि वे न शरीर को ठीक से ढकते हैं और न ही लज्जा की रक्षा करते हैं तो पता नहीं वह क्या कहता। 

    फिर वह किसानों की बात करने लगता है। वह बड़े प्रभावशाली ढंग से बताता है कि पहले हल से ज़मीन कैसे जोती जाती है, फिर दूसरी बार जुताई करके मिट्टी को कैसे भुरभुरा किया जाता है ताकि पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकें। इसके बाद बीज बोए जाते हैं और खेत से खरपतवार हाथों से निकाल दी जाती है ताकि जंगली पौधे फसल का नुकसान न करें। पोसिडोनियस का कहना है कि खेती के ये तरीके भी बुद्धिमान लोगों की ही देन थे। लेकिन वह यह भूल जाता है कि किसान आज भी खेती को अधिक उपजाऊ और बेहतर बनाने के लिए लगातार नई-नई खोजें और तरीके विकसित कर रहे हैं। इन बातों से भी उसका मन नहीं भरता। वह बुद्धिमान व्यक्ति को चक्की तक ले आता है और कहता है कि सबसे पहले उसी ने प्रकृति की नकल करते हुए रोटी बनाना शुरू किया:

"जब अनाज मुँह में जाता है तो दाँतों के आपस में रगड़ने से वह पिस जाता है। जो दाने बच जाते हैं, उन्हें जीभ फिर से दाँतों के बीच ले आती है। इसके बाद वे लार के साथ मिल जाते हैं, जिससे वे नरम हो जाते हैं और आसानी से निगले जा सकते हैं। जब भोजन पेट में पहुँचता है तो वहाँ लगातार होने वाली पाचन-क्रिया से वह पकता और पचता है और अंत में शरीर का हिस्सा बन जाता है। इसी प्रक्रिया को देखकर किसी व्यक्ति ने दो खुरदरे पत्थर लिए और उन्हें एक-दूसरे के ऊपर इस तरह रखा कि वे दाँतों जैसे काम करें। एक पत्थर को स्थिर रखा गया और दूसरे को उसके ऊपर घुमाया गया ताकि दोनों के आपसी घर्षण से अनाज के दाने पिस जाएँ। उन्हें बार-बार पीसा गया, जब तक कि वे बहुत बारीक आटे में न बदल गए। फिर उस आटे में पानी मिलाया गया, उसे अच्छी तरह गूँथा गया और उससे रोटी बनाई गई। शुरू-शुरू में रोटी को गरम अंगारों पर या मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता था। बाद में धीरे-धीरे भट्टियों और दूसरे ऐसे पकाने के साधनों का आविष्कार हुआ, जिनकी गर्मी को आवश्यकता के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता था।" 

    अगर वह थोड़ा और आगे बढ़ जाता तो शायद यह भी कह देता कि जूते बनाने की कला का आविष्कार भी बुद्धिमान लोगों ने ही किया था! 

    इन सभी चीज़ों की खोज निश्चय ही बुद्धि ने की है। लेकिन वह पूर्ण और सर्वोच्च बुद्धि नहीं थी। ये साधारण मनुष्यों की खोजें हैं, किसी सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति की नहीं। यही बात उन नावों पर भी लागू होती है जिनसे हम नदियाँ और समुद्र पार करते हैं। उनकी पाल इस तरह बनाई जाती हैं कि वे हवा की ताकत को पकड़ सकें और पीछे लगा पतवार नाव को दाएँ-बाएँ मोड़कर उसकी दिशा नियंत्रित करता है। यह विचार भी मनुष्य ने मछलियों को देखकर सीखा क्योंकि मछलियाँ अपनी पूँछ को दाएँ-बाएँ हिलाकर अपनी दिशा बदलती हैं। पोसिडोनियस कहता है—

"असल में इन सभी चीज़ों का आविष्कार किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने ही किया था। लेकिन क्योंकि ये काम उसके लिए बहुत छोटे और साधारण थे। इसलिए उसने इन्हें अपने सेवकों और काम करने वाले लोगों के जिम्मे छोड़ दिया।" 

    असलियत यह है कि इन चीज़ों का आविष्कार उन्हीं लोगों ने किया, जिनका काम आज भी इन्हें बनाना है। हमें अच्छी तरह पता है कि कुछ चीज़ें तो हमारे ही समय में सामने आई हैं। जैसे, ऐसी खिड़कियाँ जिनमें पारदर्शी काँच लगाया जाता है, जिससे भरपूर रोशनी भीतर आती है या ऐसे स्नानघर जिनकी फ़र्श मेहराबदार होती है और जिनकी दीवारों के भीतर पाइप लगाए जाते हैं ताकि गर्मी पूरे कमरे में समान रूप से फैल जाए और ऊपर से नीचे तक हर जगह एक-सा ताप बना रहे। फिर उन संगमरमर के पत्थरों का क्या कहना, जिनसे हमारे मंदिर और घर चमक उठते हैं या उन गोल और चिकने तराशे हुए पत्थर के खंभों का, जो बरामदों और बड़ी-बड़ी इमारतों को सहारा देते हैं, जहाँ बहुत-से लोग एक साथ इकट्ठा हो सकते हैं। आशुलिपि (तेज़ी से लिखने की विशेष लेखन-पद्धति) के उन संकेतों का भी उल्लेख किया जा सकता है, जिनकी मदद से बोलने वाले की बहुत तेज़ गति से कही गई बातों को भी तुरंत लिख लिया जाता है और लिखने वाले का हाथ बोलने वाले की ज़बान की रफ़्तार के साथ चल पाता है। इन सभी चीज़ों का आविष्कार समाज के सबसे साधारण और मेहनतकश लोगों ने किया है न कि तथाकथित बुद्धिमान लोगों ने। 

    बुद्धिमत्ता का स्थान इससे कहीं ऊँचा है। वह हाथों को काम करना नहीं सिखाती बल्कि मन को शिक्षित करती है। क्या आप जानना चाहते हैं कि उसने क्या खोजा है और क्या उपलब्धि हासिल की है? उसका उत्तर न तो सुंदर नृत्य की मुद्राएँ हैं और न ही तुरही और बाँसुरी से निकलने वाले वे सुर, जो उनमें फूँकी गई हवा को अलग-अलग ढंग से बहाकर संगीत में बदल देते हैं। बुद्धिमत्ता का काम हथियार बनाना, किले खड़े करना या युद्ध के साधन तैयार करना नहीं है। उसका काम शांति को बढ़ावा देना है। वह पूरे मानव समाज को आपसी मेल-मिलाप और सद्भाव के साथ जीने का आह्वान करती है। मैं फिर कहता हूँ, बुद्धिमत्ता रोज़मर्रा के काम आने वाले औज़ार बनाने वाली नहीं है। आप इतनी छोटी-छोटी चीज़ों का श्रेय उसे क्यों देते हैं? आपके सामने तो वह शक्ति है जो स्वयं जीवन को दिशा देती है। असल में, बाकी सभी कलाएँ और हुनर उसी के अधीन हैं क्योंकि जब बुद्धिमत्ता जीवन की स्वामिनी है तो जीवन के लिए आवश्यक सभी साधनों की भी वही स्वामिनी है। बुद्धिमत्ता का लक्ष्य मनुष्य को सुख और सच्चे आनंद तक पहुँचाना है। वही उस मार्ग का नेतृत्व करती है और उसी तक पहुँचने के द्वार खोलती है। वह हमें बताती है कि वास्तव में बुरा क्या है और क्या केवल देखने में बुरा लगता है। वह हमारे मन से भ्रम दूर करती है। वह हमें ऐसा आत्मसम्मान देती है जिसका ठोस आधार होता है और उस झूठे दिखावे वाले सम्मान को कम करती है जो केवल बाहरी आडंबर पर टिका होता है। वह हमें महानता और केवल दिखावटी भव्यता के बीच का अंतर समझाती है। 

    वह हमें पूरे प्रकृति-जगत का ज्ञान कराती है और अपने स्वरूप को भी समझाती है। वह बताती है कि देवता कौन हैं, उनका स्वभाव क्या है। अधोलोक की दिव्य शक्तियाँ कौन हैं; घर-परिवार की रक्षा करने वाले देवता कौन हैं और वे रक्षक आत्माएँ कौन हैं जो मनुष्यों की देखभाल करती हैं। वह उन महान आत्माओं के बारे में भी बताती है जो मृत्यु के बाद देवताओं के समान सम्मान प्राप्त करती हैं। वह यह भी समझाती है कि उनका स्थान कहाँ है, वे क्या कार्य करती हैं, उनकी शक्ति क्या है और उनका उद्देश्य क्या है। 

    इसके बाद बुद्धिमत्ता हमें इस संसार की शुरुआत तक ले जाती है। वह हमें उस शाश्वत बुद्धि के बारे में बताती है जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है और उस शक्ति के बारे में भी, जिसके कारण हर जीव और हर वस्तु अपने स्वभाव के अनुसार जन्म लेती और विकसित होती है। फिर वह मन का अध्ययन शुरू करती है। वह पूछती है, मन कहाँ से आया? उसका स्थान कहाँ है? वह कितने समय तक बना रहता है? उसके कितने भाग हैं? इसके बाद वह भौतिक चीज़ों से आगे बढ़कर उन बातों की जाँच करती है जिनका कोई भौतिक रूप नहीं है। वह सत्य क्या है, इसे समझाती है और यह भी बताती है कि सत्य को पहचानने का सही आधार क्या है। अंत में वह हमें यह सिखाती है कि जीवन में और भाषा में पैदा होने वाले भ्रमों और उलझनों को कैसे दूर किया जाए क्योंकि दोनों ही जगह सत्य और असत्य अक्सर एक-दूसरे में मिल जाते हैं और उन्हें अलग-अलग पहचानना आवश्यक होता है।जब हम बुद्धिमत्ता के अनुयायी बनते हैं, तब हमें किसी एक नगर या स्थान के छोटे-से मंदिर में नहीं बल्कि सभी देवताओं के विराट मंदिर में प्रवेश मिलता है। उस आकाश में, जो स्वयं उनका विशाल निवास है। वहाँ हमारा मन पूरे ब्रह्मांड को उसके वास्तविक रूप में देखना सीखता है, क्योंकि हमारी साधारण आँखें इतने विशाल दृश्य को पूरी तरह देख पाने में सक्षम नहीं हैं।

    मैं यह नहीं मानता, जैसा कि पोसिडोनियस मानता है कि बुद्धिमान व्यक्ति ने कारीगरी और तकनीकी कलाओं से अपने आपको बाद में अलग कर लिया था। सच तो यह है कि वह कभी उन कामों में पड़ा ही नहीं।वह किसी ऐसी चीज़ का आविष्कार करना अपने योग्य नहीं समझता, जिसे बाद में खुद ही छोड़ देना पड़े। वह ऐसे काम में हाथ ही क्यों डालता, जिसे कुछ समय बाद त्याग देना हो? पोसिडोनियस का कहना है, "अनाकार्सिस ने कुम्हार का चाक बनाया था, जो घूमकर मिट्टी के बर्तन तैयार करता है।" लेकिन होमर की रचनाओं में कुम्हार के चाक का उल्लेख मिलता है। इसलिए पोसिडोनियस यह मानने के बजाय कि उसकी अपनी कहानी गलत हो सकती है, यह कहता है कि होमर का वह अंश बाद में जोड़ा गया है और असली नहीं है। मेरी बात अलग है। मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि कुम्हार का चाक अनाकार्सिस ने बनाया था। अगर मान भी लें कि उसने बनाया था, तब भी उसने यह काम इसलिए नहीं किया कि वह बुद्धिमान था। उसने यह काम इसलिए किया क्योंकि वह एक मनुष्य था। बुद्धिमान व्यक्ति भी बहुत-से काम केवल इसलिए करता है क्योंकि वह इंसान है न कि इसलिए कि वे उसकी बुद्धिमत्ता का परिणाम हैं। मान लीजिए कोई बुद्धिमान व्यक्ति बहुत तेज़ धावक भी है। अगर वह दौड़ में जीतता है तो वह अपनी तेज़ दौड़ने की क्षमता के कारण जीतता है, अपनी बुद्धिमत्ता के कारण नहीं। 

    मैं चाहता हूँ कि पोसिडोनियस किसी काँच बनाने वाले कारीगर को देखे। वह केवल अपनी साँस की मदद से काँच को ऐसे-ऐसे आकार दे देता है, जिन्हें बहुत कुशल हाथ भी बड़ी मुश्किल से बना पाएँ। यह ऐसी कला है जो उस समय विकसित हुई, जब उसके अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति अब दुनिया में रहे ही नहीं थे। पोसिडोनियस यह भी कहता है कि डेमोक्रिटस को मेहराब का आविष्कारक माना जाता है। मेहराब वह रचना है जिसमें बीच का सबसे ऊपर वाला पत्थर (कुंजी-पत्थर) दोनों ओर झुके हुए पत्थरों को सहारा देकर पूरी मेहराब को मज़बूती से बाँधे रखता है। लेकिन मैं इस बात को सही नहीं मानता। डेमोक्रिटस से बहुत पहले ही पुल और दरवाज़े बनाए जाते थे और उनके ऊपरी हिस्से अक्सर मेहराब के आकार के होते थे। तुम यह भी भूल रहे हो कि उसी डेमोक्रिटस के बारे में यह भी कहा जाता है कि उसने हाथी-दाँत को मुलायम बनाने का तरीका खोजा था और साधारण कंकड़ को पकाकर पन्ने जैसा हरा रंग देने की विधि भी बताई थी। आज भी कुछ पत्थरों को इसी तरह रंगा जाता है, यदि वे उस प्रक्रिया को स्वीकार कर लें। हो सकता है कि इन बातों की खोज वास्तव में किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने की हो, लेकिन उसने यह काम अपनी बुद्धिमत्ता के कारण नहीं किया। बुद्धिमान व्यक्ति भी अनेक ऐसे काम करता है जिन्हें हम साधारण लोग, जो किसी अर्थ में बुद्धिमान नहीं कहलाते, भी उतनी ही अच्छी तरह। कई बार उससे भी अधिक कुशलता और आसानी से कर लेते हैं। 

    क्या आप जानना चाहते हैं कि दर्शन ने वास्तव में कौन-सी खोजें की हैं? सबसे पहले, उसने हमें प्रकृति के गहरे सत्य समझाए। उसने उन्हें दूसरे जीवों से बिल्कुल अलग ढंग से जाना क्योंकि दूसरे प्राणियों की समझ दैवीय और सार्वभौमिक सत्य को देखने में सीमित होती है। दूसरी बात, उसने जीवन जीने का नियम बताया और उसे पूरे ब्रह्मांड की व्यवस्था के अनुरूप रखा। उसने हमें केवल देवताओं के बारे में जानना ही नहीं सिखाया बल्कि उनके अनुसार जीवन जीना भी सिखाया। उसने यह भी सिखाया कि जो कुछ भी घटित होता है, उसे देवताओं की इच्छा मानकर स्वीकार करना चाहिए। उसने हमें झूठी धारणाओं के पीछे न भागने की शिक्षा दी। उसने हर चीज़ का मूल्य सही कसौटी पर परखा। उसने उन सुखों की निंदा की जिनके पीछे अंत में पछतावा मिलता है। उन सच्चे अच्छे गुणों की प्रशंसा की जो हमेशा संतोष देते हैं। उसने हमें बताया कि सबसे भाग्यशाली वह है जिसे भाग्य के सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती। सबसे शक्तिशाली वह है जो स्वयं पर अधिकार रखता है। 

    मैं जिस दर्शन की बात कर रहा हूँ, वह ऐसा दर्शन नहीं है जो मनुष्य को उसके समाज से अलग कर दे या देवताओं को इस संसार से बाहर मान ले, या सद्गुण को केवल सुख पाने का साधन बना दे। मैं उस दर्शन की बात कर रहा हूँ जो मानता है कि सम्मान और नैतिक श्रेष्ठता के अलावा कोई भी चीज़ वास्तव में अच्छी नहीं है। जिसे न मनुष्यों के उपहार लुभा सकते हैं और न भाग्य की कृपा और जिसका सबसे बड़ा पुरस्कार यही है कि उसके अनुयायियों को किसी भी प्रकार के पुरस्कार या लालच से डगमगाया नहीं जा सकता। 

    मैं यह नहीं मानता कि उस आदिम युग में दर्शन का अस्तित्व था, जब न कोई तकनीकी कला विकसित हुई थी और न ही लोग चीज़ों का उपयोग ठीक से जानते थे। उस समय लोग अनुभव करते-करते और बार-बार कोशिश करके सीख रहे थे कि किस चीज़ का कैसे इस्तेमाल करना है। दर्शन तो उस सुखद युग के बाद आया, जब प्रकृति की दी हुई चीज़ें सबके लिए आसानी से उपलब्ध थीं। उस समय न लालच ने लोगों को एक-दूसरे से अलग किया था, न भोग-विलास ने उन्हें बाँटा था। उन्होंने अभी तक लाभ कमाने के लिए मिल-जुलकर रहने की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति को नहीं छोड़ा था। उस समय के लोग बुद्धिमान नहीं थे, भले ही उनका जीवन और उनका व्यवहार वैसा था जैसा किसी बुद्धिमान व्यक्ति का होना चाहिए। 

    मनुष्य जाति के लिए इससे बेहतर जीवन की कल्पना करना कठिन है। यहाँ तक कि यदि स्वयं ईश्वर किसी को यह अवसर दे दें कि वह पृथ्वी की व्यवस्था नए सिरे से बनाए और लोगों के लिए जीवन के नियम तय करे, तब भी वह इससे अच्छा जीवन नहीं बना सकेगा। उस जीवन-पद्धति से बेहतर कोई दूसरी व्यवस्था नहीं हो सकती, जिसके बारे में कहा गया है—

"कोई किसान खेत नहीं जोतता था
यहाँ तक कि ज़मीन पर अपनी सीमा-रेखाएँ खींचना भी अनुमति नहीं थी
लोगों का श्रम और उनका प्रयास सबके साझा हित के लिए होता था
और धरती भी, जब उससे ज़बरदस्ती कुछ नहीं माँगा जाता था
तो अपने सारे उपहार और भी अधिक उदारता से देती थी"

 मनुष्य जाति इससे अधिक सुखी और सौभाग्यशाली कैसे हो सकती थी? प्रकृति के दिए हुए फलों और संसाधनों में सबका बराबर हिस्सा था। जैसे कोई माता या पिता अपने सभी बच्चों का पालन-पोषण करता है, वैसे ही प्रकृति सबकी ज़रूरतें पूरी करती थी। लोग चिंता से मुक्त थे क्योंकि वे प्रकृति की चीज़ों का उपयोग तो करते थे। लेकिन उन पर अपना निजी अधिकार नहीं जताते थे। वे उन्हें सबकी साझी संपत्ति मानते थे। निश्चय ही मैं उस समाज को सबसे अधिक समृद्ध कह सकता हूँ क्योंकि वहाँ आपको एक भी व्यक्ति गरीब नहीं मिलता था।

    उस सुंदर व्यवस्था को लालच ने नष्ट कर दिया। ज़्यादा-से-ज़्यादा पाने और हर चीज़ पर अपना निजी अधिकार जमाने की चाह में उसने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि जो चीज़ें पहले सबकी थीं, वे अलग-अलग लोगों की संपत्ति बन गईं। इस तरह उसने अपनी ही पहले की असीम संपदा को बहुत छोटा कर लिया। लालच ने ही गरीबी को जन्म दिया। उसने सब कुछ पाने की इच्छा की। लेकिन उसी इच्छा में वह सब कुछ खो बैठा। आज भी लालच अपनी खोई हुई चीज़ों को वापस पाने की कोशिश करता है। वह एक ज़मीन के साथ दूसरी ज़मीन जोड़ता जाता है। पड़ोसियों की ज़मीन कभी खरीदकर तो कभी उन्हें हटाकर अपने अधिकार में कर लेता है। अपनी संपत्ति का विस्तार करते-करते वह पूरे-के-पूरे प्रांतों जितना बड़ा इलाका अपने नाम कर लेता है। उसकी ज़मीन इतनी फैल जाती है कि उसे अपनी ही संपत्ति के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ती है और वह इसे अपना मालिकाना हक़ कहता है। लेकिन चाहे हम अपनी ज़मीन की सीमाएँ कितनी भी बढ़ा लें, हम कभी उस पहली अवस्था में वापस नहीं पहुँच सकते। जब हम यह सब कर लेंगे, तब हमारे पास बहुत-सी संपत्ति होगी। लेकिन एक समय ऐसा था जब पूरी पृथ्वी ही हमारी थी। 

    धरती उस समय कहीं अधिक उपजाऊ थी, जब उसे जोता नहीं जाता था। वह उन लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए भरपूर उपज देती थी, जो लूटकर इकट्ठा करने वाले नहीं थे। प्रकृति की उदारता से मिली किसी चीज़ को खोज लेने में जितनी खुशी मिलती थी, उतनी ही खुशी उसे किसी दूसरे के साथ बाँटने में भी होती थी। कोई भी व्यक्ति अपनी ज़रूरत से ज़्यादा या कम नहीं रखता था। लोग आपस में मिल-जुलकर हर चीज़ साझा करते थे। वह समय अभी नहीं आया था जब ताकतवर लोग कमज़ोरों पर कब्ज़ा करने लगे थे। लालची लोग अपने लिए चीज़ें छिपाकर जमा नहीं करते थे और इस तरह दूसरों को जीवन की ज़रूरी चीज़ों से वंचित नहीं करते थे। वे दूसरों की भलाई का उतना ही ध्यान रखते थे, जितना अपना। उस समय हथियार हर समय इस्तेमाल नहीं होते थे। लोगों के हाथ इंसानों के खून से नहीं रंगे होते थे। उनका संघर्ष केवल जंगली जानवरों से होता था। उस युग के लोग घने जंगलों की छाया में धूप से बचते थे। पत्तों से बने साधारण आश्रय उन्हें बारिश और तूफ़ान से सुरक्षित रखते थे। वे दिन भर निश्चिंत रहते थे और रात को बिना किसी चिंता या आह के गहरी नींद सोते थे। इसके विपरीत, आज हम मुलायम और शानदार बिस्तरों पर भी बेचैनी में करवटें बदलते रहते हैं। हमारी चिंताएँ हमें सोने नहीं देतीं। लेकिन वे लोग कठोर ज़मीन पर भी कितनी गहरी और मीठी नींद सोते थे! उनके सिर पर नक्काशीदार और सजी हुई छतें नहीं थीं। वे खुले आकाश के नीचे लेटते थे। उनके ऊपर असंख्य तारे धीरे-धीरे चलते दिखाई देते थे, और पूरा आकाश बिना किसी आवाज़ के अपनी महान गति से चलता रहता था। दिन हो या रात, प्रकृति का यह अद्भुत संसार उनकी आँखों के सामने खुला रहता था। वे देखते थे कि कुछ नक्षत्र आकाश में ऊपर पहुँचकर पश्चिम की ओर डूब रहे हैं और कुछ दूसरे फिर से उगकर दिखाई देने लगते हैं। इतने विशाल और आश्चर्य से भरे इस ब्रह्मांड के बीच घूमना-फिरना क्या अपने आप में एक अनोखा आनंद नहीं था? 

    लेकिन आज के लोग हर छोटी-सी आवाज़ से घबरा उठते हैं। अगर उनके घर में कहीं ज़रा-सी चरमराहट सुनाई दे जाए, तो वे अपनी रंग-बिरंगी चित्रकारी से सजी दीवारों के बीच भी डरकर भागने लगते हैं। उस समय के लोगों के घर आज के नगरों जैसे विशाल और जटिल नहीं थे। खुले वातावरण की स्वच्छ और ठंडी हवा, चट्टानों या पेड़ों की हल्की छाया, बिलकुल साफ़ पानी वाले झरने, बिना किसी बाँध, नहर, पाइप या दूसरी कृत्रिम व्यवस्था के बहती नदियाँ और अपनी प्राकृतिक सुंदरता से भरे घास के मैदान, यही उनके घरों का परिवेश था।उनके घर केवल गाँव के साधारण कारीगरों की मेहनत से बने होते थे। उनमें कोई दिखावा नहीं था। वे पूरी तरह प्रकृति के अनुरूप थे। ऐसे घरों में रहना आनंद की बात थी। न तो उन घरों के कारण कोई चिंता होती थी और न ही उनकी रक्षा या देखभाल की फ़िक्र सताती थी। लेकिन आज हमारे घर ही हमारी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बन गए हैं। 

    उनका जीवन भले ही बहुत सुंदर और निष्कपट था, लेकिन वे बुद्धिमान नहीं थे। 'बुद्धिमान' कहलाने का अधिकार केवल उसी को है जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि तक पहुँच चुका हो। फिर भी मैं यह नहीं कहूँगा कि वे साधारण लोग थे। उनमें ऊँचे विचार और महान स्वभाव था। यदि ऐसा कहना उचित हो तो वे मानो अभी-अभी देवताओं के सान्निध्य से पृथ्वी पर आए थे। जब संसार अभी अपनी पूरी शक्ति से भरा हुआ था, तब वह ऐसे ही श्रेष्ठ मनुष्यों को जन्म देता था। उनका स्वभाव अधिक मज़बूत था। वे शारीरिक मेहनत के लिए हमसे कहीं अधिक सक्षम थे। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे चरित्र की पूर्णता तक पहुँच चुके थे। प्रकृति हमें सद्गुण देकर पैदा नहीं करती। अच्छा इंसान बनना एक ऐसी कला है जिसे अभ्यास और प्रयास से सीखना पड़ता है।निश्चय ही वे लोग धरती की गहराइयों में सोना, चाँदी या चमकते हुए रत्न खोजने के लिए खदानें नहीं खोदते थे। उस समय ऐसा भी नहीं था कि लोग केवल तमाशा देखने के आनंद के लिए एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य की हत्या करवाएँ। न उनमें क्रोध ऐसा था, न भय, जो उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करे। वे तो बोल न सकने वाले पशुओं पर भी दया करते थे। वे न कढ़ाईदार कपड़े पहनते थे और न सोने के तारों से बुने हुए वस्त्र क्योंकि उस समय तक सोना धरती से निकाला ही नहीं गया था।

    तो फिर हमारा निष्कर्ष क्या है? यह कि वे लोग बुरे नहीं थे। लेकिन उनकी भलमनसाहत ज्ञान के कारण नहीं बल्कि अज्ञान के कारण थी। किसी व्यक्ति का गलत काम न करना और यह न जानना कि गलत काम कैसे किया जाता है, इन दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है। उनमें न्याय, विवेक, संयम और साहस जैसे सद्गुण वास्तव में मौजूद नहीं थे। हाँ, उनका सरल जीवन इन गुणों जैसा ज़रूर दिखाई देता था। लेकिन वह सच्चा सद्गुण नहीं था। सच्चा सद्गुण केवल उसी मन में जन्म लेता है जिसे शिक्षा मिली हो, जिसने सही प्रशिक्षण पाया हो, और जो निरंतर अभ्यास के द्वारा अपने सर्वोच्च स्तर तक पहुँच गया हो। निस्संदेह, हम सबमें सद्गुण प्राप्त करने की क्षमता लेकर जन्म होता है, लेकिन हम जन्म से ही सद्गुणी नहीं होते। जब तक मनुष्य को उचित शिक्षा और अभ्यास नहीं मिलता, तब तक उसका स्वभाव चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसके पास केवल सद्गुण बनने की संभावना होती है, स्वयं सद्गुण नहीं।


अभी के लिए विराम 

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