Tuesday, 28 July 2026

नियति को समझने वाले मन के बारे में -- पत्र - 89 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 


हमारे मित्र लिबेरालिस को यह समाचार सुनकर गहरा आघात पहुँचा है कि आग ने लियॉन नगर को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। यह विपत्ति किसी भी व्यक्ति को विचलित कर सकती थी, फिर वह तो अपने जन्मस्थान से अत्यंत प्रेम करने वाला व्यक्ति है। इस घटना ने उसके मन की उस दृढ़ता को भी डगमगा दिया है, जिसे उसने उन सभी संभावित भयावह परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार किया था जिनकी वह कल्पना करता था। फिर भी मुझे आश्चर्य नहीं है कि उसे इस आपदा का पहले से कोई भय नहीं था। यह घटना इतनी अप्रत्याशित और लगभग अकल्पनीय थी कि पहले कभी इसका कोई उदाहरण ही नहीं था। आग ने अनेक नगरों को क्षति पहुँचाई है। पर उन्हें पूरी तरह मिटा नहीं दिया। शत्रुओं द्वारा लगाई गई आग में भी कुछ न कुछ भवन बच ही जाते हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि आग, चाहे वह बार-बार भड़काई जाए, सब कुछ इस सीमा तक भस्म कर दे कि गिराने के औज़ारों के लिए भी कुछ शेष न रहे। यहाँ तक कि भूकंप भी बहुत कम ऐसे हुए हैं जो पूरे नगरों को समतल कर दें और पूर्ण विनाश का कारण बनें। संक्षेप में, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। इतनी भयंकर और अडिग आग कि उसके बाद जलाने के लिए भी कुछ शेष न बचा। 



    ऐसी भव्य इमारतों की इतनी विशाल शृंखला जिनमें से प्रत्येक अकेले ही किसी नगर की शोभा बढ़ाने के लिए पर्याप्त थी। एक ही रात ने उन सबको धराशायी कर दिया! इतने लंबे शांति-काल में हमने ऐसी हानि झेली है, जो युद्ध से भी होने की हमने कभी कल्पना नहीं की थी। यह बात विश्वास करने योग्य कैसे लग सकती है? जब हर ओर युद्ध थम चुका था, जब समूचे सभ्य संसार में सुरक्षा और शांति का वातावरण था, तब गॉल (प्राचीन यूरोप का एक विशाल भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र) का रत्न कहलाने वाला लियॉन देखते-ही-देखते विलुप्त हो गया।अतीत में, जब कोई व्यापक विपत्ति आती थी, तब भी लोगों को उसके आने की आशंका पहले से हो जाती थी। इतना बड़ा और महत्त्वपूर्ण नगर कभी एक ही क्षण में नष्ट नहीं हुआ था। पर यहाँ तो केवल एक ही रात ने एक महान और समृद्ध नगर को अस्तित्वहीन बना दिया। उसके विनाश में उससे भी कम समय लगा, जितना समय मुझे तुम्हें यह घटना सुनाने में लगा।

    यद्यपि हमारा मित्र लिबेरालिस अपनी व्यक्तिगत विपत्तियों का सामना करने में दुर्बल नहीं है, फिर भी इस घटना ने उसे गहरे अवसाद में डाल दिया है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं। जब कोई आपदा बिना किसी पूर्व संकेत के आ घेरती है तो उसका आघात और भी अधिक तीव्र होता है क्योंकि अचानक लगा हुआ धक्का दुख को और बढ़ा देता है। ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है जिसका शोक इस कारण अधिक गहरा न हो जाए कि उसकी हानि के साथ विस्मय भी जुड़ गया हो। इसीलिए हमें किसी भी घटना के लिए अप्रस्तुत नहीं रहना चाहिए। हमें हर संभावित परिस्थिति का पहले से अनुमान लगाने का प्रयास करना चाहिए और इस पर विचार करना चाहिए कि क्या-क्या संभव है, न कि केवल इस पर कि सामान्यतः क्या होता है। 

    भाग्य की मनमानी से कोई भी वस्तु, चाहे वह अपनी समृद्धि और वैभव के चरम पर ही क्यों न हो, एक ही क्षण में धराशायी हो सकती है। जितना अधिक कोई चमकता है, उतना ही वह आक्रमण और आघात का लक्ष्य बनता है। भाग्य के लिए कुछ भी कठिन या दुष्कर नहीं है। वह हमेशा एक ही मार्ग से नहीं आता, न ही हमेशा उन्हीं रास्तों पर चलता है जिन पर वह पहले चल चुका है। कभी वह हमारे अपने ही हाथों को एक-दूसरे के विरुद्ध कर देता है तो कभी केवल अपनी शक्ति के बल पर ऐसी विपत्तियाँ उत्पन्न कर देता है जिनके लिए किसी बाहरी कारण या व्यक्ति की आवश्यकता ही नहीं होती। कोई भी क्षण सुरक्षित नहीं है। आनंद के बीच ही ऐसी घटनाएँ जन्म ले लेती हैं जो दुःख का कारण बनती हैं। शांति के समय में ही युद्ध छिड़ जाता है। जिन बातों पर हमने अपनी सुरक्षा का भरोसा किया होता है, वही भय का कारण बन जाती हैं। मित्र शत्रु बन जाते हैं और सहयोगी विरोधी। ग्रीष्म ऋतु के शांत दिन भी अचानक ऐसी भयंकर आँधियों में बदल जाते हैं जो शीत ऋतु के तूफ़ानों से भी अधिक प्रचंड होती हैं। शत्रु सामने न होने पर भी हमें युद्ध के समान कष्ट सहने पड़ते हैं। यदि विपत्ति का कोई दूसरा कारण न भी हो तो अत्यधिक समृद्धि स्वयं अपने विनाश के कारण खोज लेती है। सबसे सावधान व्यक्ति भी बीमारी का शिकार हो जाता है। सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी शारीरिक दुर्बलता से घिर जाता है। जो पूरी तरह निर्दोष हैं, वे भी दंड भोगते हैं और जो पूर्ण एकांत में रहते हैं, वे भी उपद्रवों की चपेट में आ जाते हैं। जो लोग संयोग की शक्ति को लगभग भूल चुके होते हैं, वही किसी नई और अनपेक्षित विपत्ति के लिए चुन लिए जाते हैं। जीवन भर के परिश्रम, अनगिनत प्रयासों और अनेक प्रार्थनाओं से प्राप्त उपलब्धियाँ एक ही दिन में नष्ट हो जाती हैं। बल्कि एक दिन कहना भी इन तीव्र गति से आने वाली विपत्तियों को वास्तविकता से अधिक धीमा बताना है। किसी साम्राज्य को उलट देने के लिए एक घंटा, बल्कि एक क्षण ही पर्याप्त है। यदि सब कुछ उसी धीमी गति से नष्ट होता जिस धीमी गति से वह अस्तित्व में आता है तो हमारी दुर्बलता और हमारी चिंताओं को कुछ राहत मिल सकती थी। पर वास्तविकता यह है कि किसी वस्तु के विकसित होने में समय लगता है। जबकि उसके नष्ट होने में बहुत कम समय लगता है या बिल्कुल भी नहीं।

    चाहे सार्वजनिक जीवन हो या निजी, इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं रहता। व्यक्ति और नगर, दोनों ही भाग्य की गति के साथ बहते चले जाते हैं। जब चारों ओर पूर्ण शांति दिखाई देती है, तभी भय अचानक सामने आ खड़ा होता है और जब क्षितिज पर किसी संकट का कोई संकेत भी नहीं होता, तब विपत्ति वहीं से फूट पड़ती है जहाँ उसकी सबसे कम अपेक्षा होती है। जो राज्य गृहयुद्धों और विदेशी युद्धों के बीच भी अडिग बने रहे, वे भी कभी-कभी बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के ही ढह जाते हैं। कोई नगर लंबे समय तक निरंतर समृद्ध बना रहे, ऐसा कितना दुर्लभ है! इसलिए हमें हर संभावना पर विचार करना चाहिए और अपने मन को इस प्रकार दृढ़ बनाना चाहिए कि वह हर प्रकार की संभावित परिस्थिति का सामना कर सके।

    निर्वासन, यातना, युद्ध, जलपोत के डूब जाने जैसी घटनाओं का अपने मन में बार-बार अभ्यास करते रहो। ऐसा हो सकता है कि तुम्हें अपने देश से दूर कर दिया जाए, या तुम्हारा देश ही तुमसे छिन जाए। ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हें किसी निर्जन प्रदेश में निर्वासित कर दिया जाए या जहाँ आज लोगों की भीड़ उमड़ती है, वही स्थान स्वयं एक उजाड़ मरुभूमि बन जाए। मानव जीवन में घट सकने वाली हर प्रकार की परिस्थिति को अपनी आँखों के सामने रखो और भविष्य के बारे में अपने विचारों का अनुमान केवल उन घटनाओं से मत लगाओ जो सामान्यतः घटती हैं बल्कि उन सब बातों से लगाओ जो घट सकती हैं। यदि हम यह नहीं चाहते कि कोई दुर्लभ घटना हमें इस प्रकार स्तब्ध कर दे मानो वह पहले कभी हुई ही न हो तो हमें भाग्य के समूचे स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए। एशिया और यूनान के कितने ही नगर एक ही भूकंप में धराशायी हो चुके हैं! सीरिया और मकदूनिया के कितने ही नगर धरती में समा गए! कितनी ही बार इस प्रकार की विपत्ति ने साइप्रस को उजाड़ दिया है! कितनी ही बार पाफ़ोस स्वयं अपने ऊपर ढह गया है! हमें बार-बार यह समाचार मिलता रहा है कि पूरे-के-पूरे नगर नष्ट हो गए और हम तो उन असंख्य लोगों का केवल एक छोटा-सा भाग हैं जो ऐसे समाचार बार-बार सुनते रहते हैं। 

    इसलिए हमें भाग्य के प्रहारों का दृढ़ता से सामना करना चाहिए। यह जानते हुए कि अफ़वाहें हमेशा घटित घटनाओं के महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करती हैं। एक समृद्ध नगर जलकर नष्ट हो गया। वह प्रांतों में स्थित होने पर भी केवल उनमें से एक नहीं था बल्कि उन सबकी शोभा था। फिर भी वह केवल एक पहाड़ी पर बसा था। वह पहाड़ी भी कोई बहुत बड़ी नहीं थी। लेकिन आज जिन नगरों की समृद्धि और वैभव की बड़ी ख्याति है, समय एक दिन उनके अस्तित्व के सभी चिह्न भी मिटा देगा। क्या तुम नहीं देखते कि यूनान के कितने ही प्रसिद्ध नगर आज पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं? उनके तो आधार तक शेष नहीं बचे, जिनसे यह भी पता चल सके कि वे कभी अस्तित्व में थे। केवल मनुष्य के बनाए हुए कार्य ही नष्ट नहीं होते, केवल मानव-निर्मित संरचनाएँ ही समय के प्रवाह से नहीं ढहतीं। पर्वतों की चोटियाँ भी टूटकर बिखर जाती हैं। पूरे-के-पूरे प्रदेश धरती में धँस जाते हैं। जो भूमि कभी समुद्र से बहुत दूर थी, वह समुद्र की लहरों से ढक जाती है। प्रचंड ज्वालामुखीय अग्नि उन पहाड़ियों को भी काट-घिस देती है जिनसे कभी उसकी ज्वाला फूटती थी। जो ऊँचे-ऊँचे शिखर कभी नाविकों के लिए आश्वस्त करने वाले मार्गदर्शक थे, वे भी समय के साथ बहुत छोटे हो जाते हैं। जब स्वयं प्रकृति की रचनाएँ भी विनाश से सुरक्षित नहीं हैं, तब नगरों के नष्ट होने पर हमें शिकायत नहीं करनी चाहिए। 

    नगर केवल इसलिए खड़े हैं कि एक दिन गिर जाएँ। यही अंत उन सबकी प्रतीक्षा कर रहा है। कभी धरती के भीतर की वायु का दबाव अपनी सीमाएँ तोड़कर उन्हें ढहा देता है; कभी भूमिगत जल इकट्ठा होकर प्रचंड वेग से फूट पड़ता है और उन्हें चकनाचूर कर देता है। कभी ज्वालामुखी का विस्फोट पृथ्वी की सतह को फाड़ देता है। कभी समय, जिससे कुछ भी सुरक्षित नहीं है, धीरे-धीरे उन्हें निगल जाता है और कभी महामारी पूरी आबादी का सफाया कर देती है, जिसके बाद उजड़ी हुई इमारतें उपेक्षा के कारण स्वयं ढह जाती हैं। विपत्ति किन-किन मार्गों से आ सकती है, उन सबकी गणना करना बहुत लंबा काम होगा। पर मैं एक बात निश्चित रूप से जानता हूँ। हम नश्वर मनुष्यों द्वारा निर्मित हर वस्तु स्वयं नश्वर होने के लिए अभिशप्त है। हम ऐसी वस्तुओं के बीच जीवन बिताते हैं जिनका एक दिन नष्ट होना निश्चित है।

    इसी प्रकार की सांत्वना मैं हमारे मित्र लिबेरालिस को भेजता हूँ, जो अपनी जन्मभूमि के प्रति असाधारण प्रेम के कारण इस समय दुःख की अग्नि में जल रहा है। संभव है कि वह नगर इसलिए नष्ट हुआ हो ताकि पहले से भी अधिक सुंदर रूप में उसका पुनर्निर्माण किया जा सके। अनेक बार विनाश ने ही अधिक समृद्धि के लिए स्थान बनाया है। बहुत-सी वस्तुएँ केवल इसलिए गिरी हैं कि वे पहले से भी अधिक ऊँचाई तक उठ सकें। रोम की उन्नति से ईर्ष्या रखने वाला टिमाजेनीज़ कहा करता था कि रोम में लगी आग से उसे केवल इसलिए दुःख होता है क्योंकि वह जानता था कि जो इमारतें दोबारा बनेंगी, वे जली हुई इमारतों से भी अधिक भव्य होंगी। लियॉन के विषय में भी संभवतः यही होगा। लोग पूरी लगन से उन भवनों की अपेक्षा और भी अधिक सुंदर तथा ऊँची इमारतें बनाएँगे, जिन्हें उन्होंने खो दिया है। हमारी कामना है कि उनका यह निर्माण अधिक स्थायी सिद्ध हो और अधिक शुभ भविष्य की नींव पर लंबे समय तक टिके रहे। इस नगर की स्थापना को अभी केवल सौ वर्ष ही हुए हैं। इतना समय भी नहीं, जितना किसी दीर्घायु मनुष्य का जीवन हो सकता है। प्लैंकस ने इसकी स्थापना की थी। अपनी अनुकूल भौगोलिक स्थिति के कारण यह शीघ्र ही उस घनी आबादी वाले समृद्ध नगर में बदल गया जिसे हम आज जानते हैं। फिर भी सोचो, केवल एक वृद्ध व्यक्ति के जीवनकाल के भीतर ही इसे कितनी भीषण विपत्तियों का सामना करना पड़ा है! 

    इसलिए हमें अपने मन को ऐसा बनाना चाहिए कि वह अपनी नियति को समझ भी सके और उसे सह भी सके। यह जान लो कि भाग्य किसी पर भी दया नहीं करता। वह साम्राज्य और सम्राट, दोनों पर समान अधिकार रखता है। नगरों पर भी उतनी ही शक्ति चलाता है जितनी व्यक्तियों पर। इन बातों पर क्रोधित होने का हमारे पास कोई कारण नहीं है। हम ऐसे संसार में जन्मे हैं जहाँ जीवन इन्हीं शर्तों पर जीया जाता है। या तो इन्हें स्वीकार करके इनके अनुरूप जीवन बिताओ या इन्हें अस्वीकार करके जिस मार्ग से चाहो इस संसार से विदा हो जाओ।यदि तुम्हारे साथ व्यक्तिगत रूप से कोई अन्याय हो तो उस पर तुम्हें शिकायत करने का अधिकार है। लेकिन यदि वही अनिवार्यता समाज के प्रत्येक वर्ग को समान रूप से अपने अधीन रखती है तो उस नियति के साथ समझौता कर लो जो अंततः हर वस्तु का अंत कर देती है। हमारा मूल्यांकन हमारी कब्रों या मार्ग के किनारे बने विभिन्न ऊँचाई वाले स्मारकों से नहीं किया जाना चाहिए। राख बन जाने के बाद हम सब एक ही समान हो जाते हैं। जन्म के समय हम चाहे समान न हों, मृत्यु हमें समान बना देती है। जो बात मैं मनुष्यों के बारे में कह रहा हूँ, वही नगरों पर भी लागू होती है। रोम भी पराजित हुआ था, ठीक वैसे ही जैसे आर्देआ हुआ था। जिसने मानव जीवन के नियम निर्धारित किए, उसने जन्म, पद या प्रसिद्धि के आधार पर हमारे बीच कोई भेद नहीं किया। उसने केवल हमारे जीवन की अवधि में अंतर रखा। जब हमारा नश्वर जीवन समाप्त होता है, तब वह मानो कहता है, “अब महत्वाकांक्षा को छोड़ दो। पृथ्वी पर चलने वाले प्रत्येक प्राणी पर एक ही नियम लागू होगा।” हम सब समान हैं क्योंकि हममें से प्रत्येक हर प्रकार के दुःख और विपत्ति का पात्र है। कोई भी दूसरे से अधिक सुरक्षित नहीं है। किसी को भी यह निश्चित नहीं है कि वह कल तक जीवित रहेगा। 

    सिकंदर महान ज्यामिति का अध्ययन करने लगा था। एक ऐसा अध्ययन जिसने उसे दुखी कर दिया क्योंकि उससे उसे पता चला कि पृथ्वी कितनी छोटी है और उसने उसका कितना थोड़ा-सा भाग ही जीत पाया है। मैं फिर कहता हूँ, वह वास्तव में दुखी था क्योंकि तब उसे यह समझ जाना चाहिए था कि उसका 'महान' कहलाना उचित नहीं था। जो व्यक्ति इतनी छोटी-सी पृथ्वी के एक छोटे-से हिस्से का स्वामी हो, वह भला किस अर्थ में 'महान' कहलाने का अधिकारी है? वह जिन विषयों का अध्ययन कर रहा था, वे जटिल थे और उन्हें समझने के लिए गहरी एकाग्रता की आवश्यकता थी। वे ऐसी बातें नहीं थीं जिन्हें कोई उन्मत्त व्यक्ति, जिसका मन समुद्रों के पार विजय के स्वप्नों में भटक रहा हो, आसानी से समझ सके। उसने कहा, “मुझे आसान बातें सिखाओ।” उसके शिक्षक ने उत्तर दिया, “ये बातें सबके लिए समान हैं और सबके लिए समान रूप से कठिन हैं।” कल्पना करो कि स्वयं प्रकृति भी तुमसे यही कह रही है, “जिन बातों की तुम शिकायत कर रहे हो, वे सबके साथ समान रूप से घटित होती हैं। मैं किसी के लिए इन्हें अधिक आसान नहीं बना सकता। लेकिन जो चाहे, वह इन्हें अपने लिए आसान बना सकता है।” कैसे? अपने मन को शांत और स्थिर रखकर।

    तुम्हें पीड़ा सहनी होगी, प्यास और भूख का अनुभव करना होगा। यदि तुम्हें मनुष्यों के बीच अधिक समय तक जीवित रहने का अवसर मिलता है तो वृद्धावस्था भी आएगी। तुम्हें बीमारी का सामना करना होगा, अपने प्रियजनों या अपनी संपत्ति का वियोग सहना होगा। अंततः मृत्यु को भी स्वीकार करना होगा। फिर भी, तुम्हें उन लोगों की बातों पर विश्वास करने की कोई आवश्यकता नहीं है जो लगातार तुम्हारे कानों में इन्हीं बातों का भय भरते रहते हैं। वास्तव में इन सबमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो अपने आप में हानिकारक, असहनीय या अत्यंत कठोर हो। लोगों का भय केवल इसलिए है क्योंकि इस विषय में सब एक-दूसरे की बातों से सहमत हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति केवल अफ़वाह के कारण मृत्यु से डरने लगे। जबकि शब्दों या अफ़वाहों से डरने से अधिक हास्यास्पद और क्या हो सकता है? हमारे मित्र दिमीत्रियस एक व्यंग्यपूर्ण बात कहा करते थे, जिससे वे यह जताते थे कि अज्ञानी लोगों की बातें उनके लिए पेट की गुड़गुड़ाहट से अधिक महत्त्व नहीं रखतीं। वे कहते थे, “मुझे इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि आवाज़ ऊपर से निकल रही है या नीचे से?” 

    यह तो मूर्खता की पराकाष्ठा है कि मनुष्य तुच्छ लोगों द्वारा तुच्छ समझे जाने की चिंता करे। लोगों की बातों से डरने का तुम्हारे पास कभी कोई उचित कारण नहीं था। यही बात उन सभी चीज़ों पर भी लागू होती है जिनसे तुम केवल इसलिए डरते हो क्योंकि लोग उनसे डरते हैं। क्या किसी सज्जन व्यक्ति को उसके विरुद्ध फैलाई गई झूठी बदनामी वास्तव में कोई हानि पहुँचा सकती है? निश्चय ही नहीं। उसी प्रकार हमें मृत्यु के बारे में फैली हुई बुरी धारणाओं पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि उसकी बदनामी भी केवल लोगों की बनाई हुई है। मृत्यु के विरुद्ध आरोप लगाने वालों में से किसी ने भी स्वयं मृत्यु का अनुभव नहीं किया है। जब तक उसका अनुभव न हो, तब तक जिस वस्तु को तुम जानते ही नहीं, उसकी निंदा करना उतावलेपन की बात है। लेकिन एक बात तुम निश्चित रूप से जानते हो, कितने ही लोगों के लिए मृत्यु वरदान सिद्ध हुई है। कितनों को उसने यातना, अभाव, बीमारी, कष्ट और जीवन की थकान से मुक्त किया है। जब मृत्यु हमारे अपने अधिकार में है, तब वास्तव में कोई भी व्यक्ति हम पर पूर्ण अधिकार नहीं रखता।


अभी के लिए विदा 

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