Monday, 27 July 2026

दर्शन ने क्या-क्या किया है, के बारे में -- पत्र - 88 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


कौन इस बात पर संदेह कर सकता है, प्रिय लूसीलियस, कि हमारा जीवन अमर देवताओं का उपहार है, परन्तु अच्छा जीवन जीने की कला दर्शन का उपहार है? इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि हम दर्शन के प्रति देवताओं से भी अधिक ऋणी हैं क्योंकि केवल जीवन की अपेक्षा उत्तम जीवन कहीं बड़ा वरदान है। फिर भी ऐसा तभी तक कहा जा सकता है, जब तक यह न याद रखा जाए कि स्वयं दर्शन भी देवताओं का ही दिया हुआ उपहार है। उन्होंने किसी को भी दर्शन का ज्ञान जन्म से नहीं दिया। परन्तु उसे प्राप्त करने की क्षमता सभी को प्रदान की है। यदि उन्होंने इस ज्ञान को सबका जन्मसिद्ध अधिकार बना दिया होता और प्रत्येक मनुष्य को जन्म से ही विवेकवान बना दिया होता तो बुद्धिमत्ता अपनी सबसे बड़ी विशेषता खो बैठती। वह संयोग से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। इसके विपरीत, उसका वास्तविक मूल्य और गौरव इसी में है कि वह अपने-आप नहीं मिलती। उसके लिए हमें स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है। उसके लिए हम स्वयं अपने प्रति ऋणी होते हैं, किसी दूसरे से उसे माँगने या प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि दर्शन केवल एक उपहार भर होता तो उसमें प्रशंसा करने योग्य क्या रह जाता? 




    दर्शन का एकमात्र कार्य मानव और दैवीय विषयों के संबंध में सत्य की खोज करना है। दर्शन कभी भी भक्ति, श्रद्धा, न्याय तथा अन्य सभी परस्पर जुड़े और एक-दूसरे का सहारा बनने वाले सद्गुणों से अलग नहीं होता। वह हमें दैवीय सत्ता का सम्मान और उपासना करना सिखाता है तथा मनुष्यों से प्रेम करना भी सिखाता है। वह यह बताता है कि शक्ति देवताओं के अधीन है। जबकि मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ने वाली शक्ति सामाजिकता है।यह सामाजिकता बहुत लंबे समय तक निष्कलुष बनी रही। परंतु लोभ ने अंततः इस पारस्परिक बंधन को तोड़ दिया। लोभ ने उन लोगों को भी दरिद्र बना दिया जिन्हें उसने सबसे अधिक धनवान बनाया था क्योंकि जैसे ही मनुष्यों ने निजी स्वामित्व को अपनाया, उन्होंने सब कुछ मिल-जुलकर साझा रखना छोड़ दिया। 

    किन्तु प्रथम मनुष्य और उनके वे वंशज, जो प्रकृति के मार्ग से विचलित हुए बिना उसी के अनुसार जीवन जीते थे, किसी श्रेष्ठ व्यक्ति को अपना नेता और अपना नियम, दोनों मानते थे तथा स्वयं को उसके अधिकार के अधीन सौंप देते थे। क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि जो हीन है, वह श्रेष्ठ के अधीन रहता है। पशुओं के झुंडों में नेतृत्व सामान्यतः सबसे बड़े या सबसे प्रचंड प्राणी के हाथ में होता है। गायों के झुंड का अगुआ कोई दुर्बल बैल नहीं होता बल्कि वही होता है जो आकार और शक्ति में अन्य नर बैलों से बढ़कर हो। हाथियों के झुंड का नेतृत्व भी सबसे विशाल हाथी करता है। किन्तु मनुष्यों में महत्व शरीर के आकार का नहीं बल्कि चरित्र और उत्कृष्टता का होता है। इसलिए प्राचीन काल में नेताओं का चयन उनके मानसिक गुणों और सद्गुणों के आधार पर किया जाता था। यही कारण है कि वे समाज सबसे अधिक सौभाग्यशाली थे, जो केवल योग्यता के आधार पर सत्ता सौंपते थे। जिस व्यक्ति को यह विश्वास हो कि उसे उतनी ही शक्ति का प्रयोग करना चाहिए जितनी उचित है। उससे अधिक नहीं, उसकी शक्ति पर अंकुश लगाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। 

    इसी कारण पोसिडोनियस (Posidonius) का मत है कि तथाकथित स्वर्णयुग में शासन बुद्धिमान व्यक्तियों के हाथों में था। वे हिंसा और अत्याचार को रोकते थे, शक्तिशाली लोगों से निर्बलों की रक्षा करते थे, राज्य का संचालन करते थे और लोगों को बताते थे कि क्या उनके हित में है और क्या नहीं। उनकी बुद्धिमत्ता यह सुनिश्चित करती थी कि उनकी प्रजा को किसी वस्तु का अभाव न हो। उनका साहस उन्हें संकटों से सुरक्षित रखता था। उनकी उदारता अपनी प्रजा की समृद्धि को बढ़ाती थी। वे दूसरों पर प्रभुत्व जमाने के लिए नहीं बल्कि उनकी सेवा करने के लिए शासन करते थे। वे कभी भी अपनी शक्ति का प्रयोग उन्हीं लोगों के विरुद्ध नहीं करते थे, जिनसे उन्हें प्रारम्भ में वह शक्ति प्राप्त हुई थी। उनमें न तो अन्याय करने की इच्छा थी और न ही उसका कोई कारण। क्योंकि उनके आदेश न्यायसंगत होते थे। इसलिए उनका पालन भी स्वेच्छा से और उचित रूप से किया जाता था। किसी राजा के लिए अपनी आज्ञा न मानने वाली प्रजा के विरुद्ध इससे बड़ी कोई धमकी नहीं हो सकती थी कि वह स्वयं राजपद त्याग देगा।

    लेकिन जब दुर्गुणों के प्रवेश से राजतंत्र अत्याचारी शासन में बदल गए, तब कानूनों की आवश्यकता उत्पन्न हुई। इन कानूनों की रचना भी सबसे पहले बुद्धिमानों ने ही की। सोलन, जिसने न्याय और समानता के सिद्धांत पर एथेंस की शासन-व्यवस्था स्थापित की, उन सात महापुरुषों में से एक था जो अपनी बुद्धिमत्ता के कारण प्रसिद्ध हुए। यदि लाइकर्गस उसी काल में जीवित होता तो वह उस धन्य समूह का आठवाँ सदस्य होता। आज भी हम ज़ालेयूकस और कैरोंडास के बनाए हुए कानूनों का सम्मान करते हैं। इन लोगों ने सिसिली (जो उस समय अत्यंत समृद्ध था) तथा इटली के यूनानी नगरों के लिए जिन न्याय-सिद्धांतों की स्थापना की, उनका ज्ञान उन्होंने न तो न्यायालयों में प्राप्त किया था और न ही विधिवेत्ताओं के कार्यालयों में बल्कि पाइथागोरस के शांत और पवित्र आश्रम में प्राप्त किया था।

    अब तक मैं पोसिडोनियस से सहमत हूँ। परन्तु मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि दर्शन ने उन कलाओं और तकनीकों का आविष्कार किया जिनका हम अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। मैं दर्शन को वह यश नहीं दूँगा जो वास्तव में शिल्प-कला और कारीगरी का है। उसके अनुसार—

“जब मनुष्य इधर-उधर बिखरे हुए रहते थे और झोपड़ियों, गुफाओं या वृक्षों के खोखलों में आश्रय लेते थे, तब दर्शन ने ही उन्हें घर बनाना सिखाया।”

    मेरे विचार से न तो दर्शन ने आज की तरह ऊँची-ऊँची बहुमंज़िला इमारतें बनाना सिखाया और न ही बड़े-बड़े शहर बसाने की कला दी। उसी तरह यह भी दर्शन नहीं था जिसने मछलियों को पिंजरों में पालने का तरीका निकाला ताकि स्वाद के पीछे पागल लोग तूफ़ान का खतरा उठाए बिना ही बंदरगाह की सुरक्षित जगह पर हर तरह की मछलियाँ मोटी करते रहें, चाहे समुद्र में कितना भी भयंकर मौसम क्यों न हो। क्या आप कहेंगे कि लोगों को ताले लगाकर चीज़ें सुरक्षित रखना भी दर्शन ने सिखाया? क्या यही वह बात नहीं थी जिसने लालच को बढ़ावा दिया? क्या दर्शन ने ही ऐसी ऊँची-ऊँची इमारतें बनवाईं, जो अपने ही रहने वालों के लिए खतरा बन जाती हैं? मानो लोगों के लिए अपने आस-पास आसानी से मिलने वाली चीज़ों से घर बना लेना ही काफ़ी न था और बिना किसी विशेष कला या कठिन मेहनत के प्रकृति से मिला आश्रय उनके लिए पर्याप्त न था। 

    मेरा विश्वास कीजिए, वह समय सचमुच सुखी था जब न वास्तुकार थे और न बड़े-बड़े भवन बनाने वाले कारीगर। ये सारी कलाएँ और साधन तब आए, जब लोगों में आराम, ऐश्वर्य और भोग-विलास की चाह बढ़ गई। तभी लकड़ियों को बराबर आकार में काटा जाने लगा, आरी से उन पर सीधी रेखाओं के अनुसार चीरा लगाया जाने लगा और बहुत बारीकी से बढ़ईगिरी होने लगी। आदिम लोग तो मुलायम लकड़ी को केवल फाँकों (कीलों जैसे लकड़ी के टुकड़ों) की मदद से चीर लेते थे। 

    और ऐसा करना उनके लिए स्वाभाविक भी था क्योंकि वे किसी भविष्य के भव्य भोज-भवन की छत नहीं बना रहे थे। उस समय सड़कों पर देवदार और फर के विशाल पेड़ों को ढोने वाली लंबी-लंबी गाड़ियों की कतारें नहीं चलती थीं, जो सोने से सजी हुई छतों को सहारा देने के लिए लकड़ी पहुँचाती थीं। उनकी झोपड़ियाँ दोनों ओर गाड़े गए दोमुंहे खंभों पर टिकी होती थीं। शाखाओं के गट्ठरों और ढलान बनाकर बिछाई गई पत्तियों की मोटी परतों से बनी छत पर बारिश का पानी आसानी से बह जाता था, चाहे वर्षा कितनी ही तेज़ क्यों न हो। ऐसी छतों के नीचे वे पूरी सुरक्षा के साथ रहते थे। घास-फूस की उनकी झोपड़ियाँ उन्हें स्वतंत्र जीवन देती थीं। लेकिन जो लोग संगमरमर और सोने के महलों में रहते हैं, वे वास्तव में दासता में जीते हैं। 

    पोसिडोनियस की एक और बात से भी मैं सहमत नहीं हूँ। उसका कहना है कि लोहे के औज़ारों का आविष्कार बुद्धिमान लोगों ने किया था। मेरे विचार में यह बात भी सही नहीं है। अगर ऐसा माना जाए तो फिर यह भी कहना पड़ेगा कि बुद्धिमान लोगों ने ही "जंगली जानवरों को फँसाना सीखा, पक्षियों के लिए जाल बिछाए और जंगल की घाटियों के चारों ओर शिकार के लिए कुत्तों को तैनात किया।" 

    यह सब बुद्धिमानी से नहीं बल्कि इंसान की सूझ-बूझ और काम निकालने की क्षमता से खोजा गया था। मैं पोसिडोनियस की इस बात से भी सहमत नहीं हूँ कि जंगलों में आग लगने पर, जब धरती झुलस गई और उसकी ऊपरी परत के पास मौजूद धातु की नसों से पिघलकर लोहा और ताँबा बाहर निकल आया, तब उन धातुओं की खोज बुद्धिमान लोगों ने की थी। ऐसी चीज़ों की खोज वे लोग करते हैं जिनकी रुचि और काम ही इन्हीं बातों से जुड़ा होता है। फिर, पोसिडोनियस के विपरीत, मुझे यह भी कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं लगता कि हथौड़ा पहले बना या चिमटा। ये दोनों औज़ार किसी ऐसे व्यक्ति ने बनाए होंगे जिसकी बुद्धि तेज़ और काम करने में कुशल थी, लेकिन जो कोई महान या असाधारण बुद्धिमान व्यक्ति नहीं था। यही बात उन सभी चीज़ों पर लागू होती है, जिनकी खोज ऐसे लोग करते हैं जो झुककर मेहनत करते हैं और जिनका ध्यान हमेशा ज़मीन पर, अपने काम पर लगा रहता है। 

    बुद्धिमान व्यक्ति सादा जीवन जीता था। उसे ऐसा ही होना भी चाहिए था। आज के समय में भी सच्चा बुद्धिमान वही है जो अपने ऊपर जितना कम बोझ रख सके, उतना अच्छा समझे। मैं आपसे पूछता हूँ, आप एक साथ डायोजनीज़ और डेडलस, दोनों की प्रशंसा कैसे कर सकते हैं? आपके विचार में इनमें से वास्तव में बुद्धिमान कौन है? वह जिसने आरी का आविष्कार किया या वह जिसने एक लड़के को अपनी हथेली से पानी पीते देखा और तुरंत अपने झोले से प्याला निकालकर तोड़ दिया? फिर उसने स्वयं को डाँटते हुए कहा, "मैं कितना मूर्ख था कि इतने समय तक यह बेकार का सामान अपने साथ ढोता रहा!" इसके बाद वह अपने पीपे में जाकर लेट गया और सो गया। इसी तरह, आज आपके अनुसार अधिक बुद्धिमान कौन है? वह जो ऐसी तरकीब निकालता है कि छिपी हुई नलियों से केसर मिला हुआ सुगंधित पानी बहुत ऊँचाई तक फूटने लगे, जो एक झटके में पानी की धाराएँ भर और खाली कर दे, जो भोजन-कक्ष की छत पर चलने वाले पट बनाए ताकि हर नए पकवान के साथ उसकी सजावट भी तुरंत बदल जाए या फिर वह व्यक्ति, जो खुद भी समझता है और दूसरों को भी समझाता है कि प्रकृति ने हमसे कोई कठिन या कठोर माँग नहीं की है कि हम संगमरमर तराशने वाले कारीगरों और बड़े-बड़े निर्माण करने वाले इंजीनियरों के बिना भी घर बना सकते हैं कि रेशम के व्यापार के बिना भी कपड़े पहन सकते हैं और यह कि धरती की सतह पर जो कुछ प्रकृति ने हमें दिया है, यदि हम उसी में संतुष्ट रहना सीख लें तो हमारी ज़रूरत की हर चीज़ हमारे पास होगी। जिस दिन मनुष्य इस व्यक्ति की बात ध्यान से सुनने लगेगा, उस दिन उसे समझ में आ जाएगा कि रसोइए उतने ही अनावश्यक हैं, जितने सैनिक। 

    बुद्धिमान लोग या कम-से-कम वे लोग जो बुद्धिमानों जैसे थे, शरीर की सुरक्षा को बहुत सरल बात मानते थे। जीवन की ज़रूरी चीज़ें बहुत कम मेहनत से मिल जाती हैं। असली मेहनत तो आराम और विलास की चीज़ें जुटाने में लगती है। यदि आप प्रकृति का साथ दें तो आपको किसी कारीगर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। प्रकृति ने कभी नहीं चाहा कि हम इन बातों में अपनी जान खपा दें। उसने हमें अपनी सभी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पहले से ही पर्याप्त साधन दे दिए हैं। "नंगा शरीर ठंड कैसे सह सकता है?" तो फिर क्या हुआ? क्या जंगली जानवरों और दूसरे पशुओं की खाल ठंड से पूरी तरह बचाने के लिए काफ़ी नहीं है? क्या बहुत-से लोग पेड़ों की छाल से अपने शरीर को नहीं ढकते या पक्षियों के पंखों से कपड़े नहीं बनाते? क्या आज भी अधिकांश स्किथियन (मध्य एशिया के घुमंतू लोग) लोमड़ी और मार्टेन जैसे जानवरों की खाल नहीं पहनते? ये खालें छूने में मुलायम होती हैं और तेज़ हवा को भी अंदर नहीं आने देतीं। फिर बताइए, ऐसा कौन है जो टहनियों से एक ढाँचा न बना सके, उस पर साधारण मिट्टी न पोत सके, उसे घास-फूस या झाड़ियों से न ढक सके और पूरी सर्दी आराम और सुरक्षा से न बिता सके। जबकि बारिश का पानी उसकी छत से बहकर नीचे गिरता रहे? "लेकिन गर्मियों की तेज़ धूप से बचने के लिए तो गहरी छाया चाहिए।" तो फिर क्या? क्या बहुत पुराने समय से ऐसी गुफाएँ नहीं हैं, जो समय के बीतने या किसी प्राकृतिक कारण से अपने-आप बन गईं? क्या यह सच नहीं है कि उत्तरी अफ्रीका और दूसरे बहुत गर्म इलाकों के लोग ज़मीन खोदकर बनाए गए घरों में रहते हैं? जब कोई और उपाय काम नहीं आता, तब वे उसी तपी हुई धरती के भीतर रहकर गर्मी से अपनी रक्षा करते हैं। 

    प्रकृति हमारे साथ इतनी अन्यायी नहीं थी कि उसने दूसरे सभी जीवों के लिए जीवन आसान बना दिया हो। लेकिन मनुष्य के लिए बिना तरह-तरह की तकनीकी कलाओं के जीना असंभव कर दिया हो। उसने हमसे कोई कठोर माँग नहीं की। हमारे जीवन के लिए जो भी ज़रूरी था, उसे पाना कठिन नहीं बनाया। हम ऐसी दुनिया में पैदा हुए थे जहाँ हमारी ज़रूरत की चीज़ें पहले से ही मौजूद थीं। मुश्किलें हमने खुद पैदा कीं क्योंकि हमने आसान चीज़ों को तुच्छ समझना शुरू कर दिया। घर, कपड़े, शरीर को गर्म रखने के साधन, भोजन बल्कि वे सारी चीज़ें जो आज बहुत बड़ा कारोबार बन चुकी हैं, उस समय आसानी से उपलब्ध थीं। वे बिना किसी कीमत के मिल जाती थीं और उन्हें पाने के लिए बहुत कम मेहनत करनी पड़ती थी। क्योंकि कोई भी अपनी ज़रूरत से ज़्यादा नहीं लेता था। इन चीज़ों को महँगा, दुर्लभ और अनेक कठिन कलाओं तथा हुनरों से ही हासिल किया जा सकने वाला हमने स्वयं बना दिया है। 

    प्रकृति हमारी ज़रूरत की हर चीज़ देती है। लेकिन भोग-विलास ने प्रकृति का साथ छोड़ दिया है। वह हर दिन अपनी इच्छाओं को और बढ़ाता है, हर बीतती सदी के साथ फैलता जाता है और अपनी ही चतुराई से बुराइयों को बढ़ावा देता है। पहले इंसान ने उन चीज़ों की इच्छा की जो ज़रूरी नहीं थीं। फिर उसने उन चीज़ों की चाह की जो उसके लिए नुकसानदेह थीं। और अब तो हालत यह है कि उसने अपने मन को ही शरीर का गुलाम बना दिया है। अब मन का काम केवल शरीर की हर इच्छा पूरी करना रह गया है। समाज में जितने भी शोर-शराबे वाले धंधे और कारोबार चल रहे हैं, वे सब शरीर की सेवा के लिए हैं। एक समय था जब शरीर को उतना ही दिया जाता था जितना किसी नौकर को काम चलाने के लिए दिया जाता है। लेकिन आज शरीर मालिक बन बैठा है और उसकी हर माँग पूरी की जाती है। इसीलिए कहीं कपड़ों के बड़े-बड़े कारोबार दिखाई देते हैं, कहीं तरह-तरह के कारीगरों की कार्यशालाएँ। कहीं रसोइयों के बनाए सुगंधित और लुभावने व्यंजन हैं तो कहीं नृत्य सिखाने वालों की आकर्षक अदाएँ और मन को लुभाने वाले, कोमल और बनावटी गीत-संगीत। एक समय था जब हम अपनी इच्छाओं को केवल ज़रूरत भर की चीज़ों तक सीमित रखते थे और उतना ही चाहते थे जितना हमारी सामर्थ्य में था। लेकिन अब वह सीमा मिट चुकी है। आज यदि कोई व्यक्ति केवल उतना ही चाहता है जितना उसके लिए पर्याप्त है तो लोग उसे असभ्य, पिछड़ा और गरीब समझते हैं। 

    प्रिय लूसीलियस, यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि बड़े-बड़े विद्वान भी कभी-कभी अपनी भाषा की चमक और अपनी बात कहने के आनंद में इतने बह जाते हैं कि सच्चाई से भटक जाते हैं। उदाहरण के लिए पोसिडोनियस को ही देखिए। मेरे विचार में उसने दर्शन को बहुत बड़ा योगदान दिया है। लेकिन जब वह यह बताने लगता है कि ऊन के ढीले गुच्छों से कुछ रेशों को कैसे मरोड़ा जाता है, कुछ को कैसे खींचकर धागा बनाया जाता है, फिर कैसे करघे पर लटके हुए भार ताने के धागों को सीधा और तना हुआ रखते हैं और कैसे बाने के धागे को कसकर दबाया जाता है ताकि ताने के मोटे धागों के बीच कपड़ा अच्छी तरह बुना जा सके तो वह यह दावा करने लगता है कि बुनाई की कला का आविष्कार भी बुद्धिमान लोगों ने ही किया था। वह यह भूल जाता है कि बुनाई की यह जटिल विधि बहुत बाद में विकसित हुई, जिसमें—

"ताना करघे के बीम पर कसकर बाँधा जाता है। सरकंडे की कंघी से धागों को अलग-अलग रखा जाता है। बाने का धागा नाव जैसी छोटी शटल के सहारे उनके बीच से निकाला जाता है और फिर चौड़े दाँतेदार कंघे से उसे कसकर बैठा दिया जाता है।"

अगर पोसिडोनियस आज के करघों को देखता, जो इतने महीन और पारदर्शी कपड़े बनाते हैं कि वे न शरीर को ठीक से ढकते हैं और न ही लज्जा की रक्षा करते हैं तो पता नहीं वह क्या कहता। 

    फिर वह किसानों की बात करने लगता है। वह बड़े प्रभावशाली ढंग से बताता है कि पहले हल से ज़मीन कैसे जोती जाती है, फिर दूसरी बार जुताई करके मिट्टी को कैसे भुरभुरा किया जाता है ताकि पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकें। इसके बाद बीज बोए जाते हैं और खेत से खरपतवार हाथों से निकाल दी जाती है ताकि जंगली पौधे फसल का नुकसान न करें। पोसिडोनियस का कहना है कि खेती के ये तरीके भी बुद्धिमान लोगों की ही देन थे। लेकिन वह यह भूल जाता है कि किसान आज भी खेती को अधिक उपजाऊ और बेहतर बनाने के लिए लगातार नई-नई खोजें और तरीके विकसित कर रहे हैं। इन बातों से भी उसका मन नहीं भरता। वह बुद्धिमान व्यक्ति को चक्की तक ले आता है और कहता है कि सबसे पहले उसी ने प्रकृति की नकल करते हुए रोटी बनाना शुरू किया:

"जब अनाज मुँह में जाता है तो दाँतों के आपस में रगड़ने से वह पिस जाता है। जो दाने बच जाते हैं, उन्हें जीभ फिर से दाँतों के बीच ले आती है। इसके बाद वे लार के साथ मिल जाते हैं, जिससे वे नरम हो जाते हैं और आसानी से निगले जा सकते हैं। जब भोजन पेट में पहुँचता है तो वहाँ लगातार होने वाली पाचन-क्रिया से वह पकता और पचता है और अंत में शरीर का हिस्सा बन जाता है। इसी प्रक्रिया को देखकर किसी व्यक्ति ने दो खुरदरे पत्थर लिए और उन्हें एक-दूसरे के ऊपर इस तरह रखा कि वे दाँतों जैसे काम करें। एक पत्थर को स्थिर रखा गया और दूसरे को उसके ऊपर घुमाया गया ताकि दोनों के आपसी घर्षण से अनाज के दाने पिस जाएँ। उन्हें बार-बार पीसा गया, जब तक कि वे बहुत बारीक आटे में न बदल गए। फिर उस आटे में पानी मिलाया गया, उसे अच्छी तरह गूँथा गया और उससे रोटी बनाई गई। शुरू-शुरू में रोटी को गरम अंगारों पर या मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता था। बाद में धीरे-धीरे भट्टियों और दूसरे ऐसे पकाने के साधनों का आविष्कार हुआ, जिनकी गर्मी को आवश्यकता के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता था।" 

    अगर वह थोड़ा और आगे बढ़ जाता तो शायद यह भी कह देता कि जूते बनाने की कला का आविष्कार भी बुद्धिमान लोगों ने ही किया था! 

    इन सभी चीज़ों की खोज निश्चय ही बुद्धि ने की है। लेकिन वह पूर्ण और सर्वोच्च बुद्धि नहीं थी। ये साधारण मनुष्यों की खोजें हैं, किसी सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति की नहीं। यही बात उन नावों पर भी लागू होती है जिनसे हम नदियाँ और समुद्र पार करते हैं। उनकी पाल इस तरह बनाई जाती हैं कि वे हवा की ताकत को पकड़ सकें और पीछे लगा पतवार नाव को दाएँ-बाएँ मोड़कर उसकी दिशा नियंत्रित करता है। यह विचार भी मनुष्य ने मछलियों को देखकर सीखा क्योंकि मछलियाँ अपनी पूँछ को दाएँ-बाएँ हिलाकर अपनी दिशा बदलती हैं। पोसिडोनियस कहता है—

"असल में इन सभी चीज़ों का आविष्कार किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने ही किया था। लेकिन क्योंकि ये काम उसके लिए बहुत छोटे और साधारण थे। इसलिए उसने इन्हें अपने सेवकों और काम करने वाले लोगों के जिम्मे छोड़ दिया।" 

    असलियत यह है कि इन चीज़ों का आविष्कार उन्हीं लोगों ने किया, जिनका काम आज भी इन्हें बनाना है। हमें अच्छी तरह पता है कि कुछ चीज़ें तो हमारे ही समय में सामने आई हैं। जैसे, ऐसी खिड़कियाँ जिनमें पारदर्शी काँच लगाया जाता है, जिससे भरपूर रोशनी भीतर आती है या ऐसे स्नानघर जिनकी फ़र्श मेहराबदार होती है और जिनकी दीवारों के भीतर पाइप लगाए जाते हैं ताकि गर्मी पूरे कमरे में समान रूप से फैल जाए और ऊपर से नीचे तक हर जगह एक-सा ताप बना रहे। फिर उन संगमरमर के पत्थरों का क्या कहना, जिनसे हमारे मंदिर और घर चमक उठते हैं या उन गोल और चिकने तराशे हुए पत्थर के खंभों का, जो बरामदों और बड़ी-बड़ी इमारतों को सहारा देते हैं, जहाँ बहुत-से लोग एक साथ इकट्ठा हो सकते हैं। आशुलिपि (तेज़ी से लिखने की विशेष लेखन-पद्धति) के उन संकेतों का भी उल्लेख किया जा सकता है, जिनकी मदद से बोलने वाले की बहुत तेज़ गति से कही गई बातों को भी तुरंत लिख लिया जाता है और लिखने वाले का हाथ बोलने वाले की ज़बान की रफ़्तार के साथ चल पाता है। इन सभी चीज़ों का आविष्कार समाज के सबसे साधारण और मेहनतकश लोगों ने किया है न कि तथाकथित बुद्धिमान लोगों ने। 

    बुद्धिमत्ता का स्थान इससे कहीं ऊँचा है। वह हाथों को काम करना नहीं सिखाती बल्कि मन को शिक्षित करती है। क्या आप जानना चाहते हैं कि उसने क्या खोजा है और क्या उपलब्धि हासिल की है? उसका उत्तर न तो सुंदर नृत्य की मुद्राएँ हैं और न ही तुरही और बाँसुरी से निकलने वाले वे सुर, जो उनमें फूँकी गई हवा को अलग-अलग ढंग से बहाकर संगीत में बदल देते हैं। बुद्धिमत्ता का काम हथियार बनाना, किले खड़े करना या युद्ध के साधन तैयार करना नहीं है। उसका काम शांति को बढ़ावा देना है। वह पूरे मानव समाज को आपसी मेल-मिलाप और सद्भाव के साथ जीने का आह्वान करती है। मैं फिर कहता हूँ, बुद्धिमत्ता रोज़मर्रा के काम आने वाले औज़ार बनाने वाली नहीं है। आप इतनी छोटी-छोटी चीज़ों का श्रेय उसे क्यों देते हैं? आपके सामने तो वह शक्ति है जो स्वयं जीवन को दिशा देती है। असल में, बाकी सभी कलाएँ और हुनर उसी के अधीन हैं क्योंकि जब बुद्धिमत्ता जीवन की स्वामिनी है तो जीवन के लिए आवश्यक सभी साधनों की भी वही स्वामिनी है। बुद्धिमत्ता का लक्ष्य मनुष्य को सुख और सच्चे आनंद तक पहुँचाना है। वही उस मार्ग का नेतृत्व करती है और उसी तक पहुँचने के द्वार खोलती है। वह हमें बताती है कि वास्तव में बुरा क्या है और क्या केवल देखने में बुरा लगता है। वह हमारे मन से भ्रम दूर करती है। वह हमें ऐसा आत्मसम्मान देती है जिसका ठोस आधार होता है और उस झूठे दिखावे वाले सम्मान को कम करती है जो केवल बाहरी आडंबर पर टिका होता है। वह हमें महानता और केवल दिखावटी भव्यता के बीच का अंतर समझाती है। 

    वह हमें पूरे प्रकृति-जगत का ज्ञान कराती है और अपने स्वरूप को भी समझाती है। वह बताती है कि देवता कौन हैं, उनका स्वभाव क्या है। अधोलोक की दिव्य शक्तियाँ कौन हैं; घर-परिवार की रक्षा करने वाले देवता कौन हैं और वे रक्षक आत्माएँ कौन हैं जो मनुष्यों की देखभाल करती हैं। वह उन महान आत्माओं के बारे में भी बताती है जो मृत्यु के बाद देवताओं के समान सम्मान प्राप्त करती हैं। वह यह भी समझाती है कि उनका स्थान कहाँ है, वे क्या कार्य करती हैं, उनकी शक्ति क्या है और उनका उद्देश्य क्या है। 

    इसके बाद बुद्धिमत्ता हमें इस संसार की शुरुआत तक ले जाती है। वह हमें उस शाश्वत बुद्धि के बारे में बताती है जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है और उस शक्ति के बारे में भी, जिसके कारण हर जीव और हर वस्तु अपने स्वभाव के अनुसार जन्म लेती और विकसित होती है। फिर वह मन का अध्ययन शुरू करती है। वह पूछती है, मन कहाँ से आया? उसका स्थान कहाँ है? वह कितने समय तक बना रहता है? उसके कितने भाग हैं? इसके बाद वह भौतिक चीज़ों से आगे बढ़कर उन बातों की जाँच करती है जिनका कोई भौतिक रूप नहीं है। वह सत्य क्या है, इसे समझाती है और यह भी बताती है कि सत्य को पहचानने का सही आधार क्या है। अंत में वह हमें यह सिखाती है कि जीवन में और भाषा में पैदा होने वाले भ्रमों और उलझनों को कैसे दूर किया जाए क्योंकि दोनों ही जगह सत्य और असत्य अक्सर एक-दूसरे में मिल जाते हैं और उन्हें अलग-अलग पहचानना आवश्यक होता है।जब हम बुद्धिमत्ता के अनुयायी बनते हैं, तब हमें किसी एक नगर या स्थान के छोटे-से मंदिर में नहीं बल्कि सभी देवताओं के विराट मंदिर में प्रवेश मिलता है। उस आकाश में, जो स्वयं उनका विशाल निवास है। वहाँ हमारा मन पूरे ब्रह्मांड को उसके वास्तविक रूप में देखना सीखता है, क्योंकि हमारी साधारण आँखें इतने विशाल दृश्य को पूरी तरह देख पाने में सक्षम नहीं हैं।

    मैं यह नहीं मानता, जैसा कि पोसिडोनियस मानता है कि बुद्धिमान व्यक्ति ने कारीगरी और तकनीकी कलाओं से अपने आपको बाद में अलग कर लिया था। सच तो यह है कि वह कभी उन कामों में पड़ा ही नहीं।वह किसी ऐसी चीज़ का आविष्कार करना अपने योग्य नहीं समझता, जिसे बाद में खुद ही छोड़ देना पड़े। वह ऐसे काम में हाथ ही क्यों डालता, जिसे कुछ समय बाद त्याग देना हो? पोसिडोनियस का कहना है, "अनाकार्सिस ने कुम्हार का चाक बनाया था, जो घूमकर मिट्टी के बर्तन तैयार करता है।" लेकिन होमर की रचनाओं में कुम्हार के चाक का उल्लेख मिलता है। इसलिए पोसिडोनियस यह मानने के बजाय कि उसकी अपनी कहानी गलत हो सकती है, यह कहता है कि होमर का वह अंश बाद में जोड़ा गया है और असली नहीं है। मेरी बात अलग है। मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि कुम्हार का चाक अनाकार्सिस ने बनाया था। अगर मान भी लें कि उसने बनाया था, तब भी उसने यह काम इसलिए नहीं किया कि वह बुद्धिमान था। उसने यह काम इसलिए किया क्योंकि वह एक मनुष्य था। बुद्धिमान व्यक्ति भी बहुत-से काम केवल इसलिए करता है क्योंकि वह इंसान है न कि इसलिए कि वे उसकी बुद्धिमत्ता का परिणाम हैं। मान लीजिए कोई बुद्धिमान व्यक्ति बहुत तेज़ धावक भी है। अगर वह दौड़ में जीतता है तो वह अपनी तेज़ दौड़ने की क्षमता के कारण जीतता है, अपनी बुद्धिमत्ता के कारण नहीं। 

    मैं चाहता हूँ कि पोसिडोनियस किसी काँच बनाने वाले कारीगर को देखे। वह केवल अपनी साँस की मदद से काँच को ऐसे-ऐसे आकार दे देता है, जिन्हें बहुत कुशल हाथ भी बड़ी मुश्किल से बना पाएँ। यह ऐसी कला है जो उस समय विकसित हुई, जब उसके अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति अब दुनिया में रहे ही नहीं थे। पोसिडोनियस यह भी कहता है कि डेमोक्रिटस को मेहराब का आविष्कारक माना जाता है। मेहराब वह रचना है जिसमें बीच का सबसे ऊपर वाला पत्थर (कुंजी-पत्थर) दोनों ओर झुके हुए पत्थरों को सहारा देकर पूरी मेहराब को मज़बूती से बाँधे रखता है। लेकिन मैं इस बात को सही नहीं मानता। डेमोक्रिटस से बहुत पहले ही पुल और दरवाज़े बनाए जाते थे और उनके ऊपरी हिस्से अक्सर मेहराब के आकार के होते थे। तुम यह भी भूल रहे हो कि उसी डेमोक्रिटस के बारे में यह भी कहा जाता है कि उसने हाथी-दाँत को मुलायम बनाने का तरीका खोजा था और साधारण कंकड़ को पकाकर पन्ने जैसा हरा रंग देने की विधि भी बताई थी। आज भी कुछ पत्थरों को इसी तरह रंगा जाता है, यदि वे उस प्रक्रिया को स्वीकार कर लें। हो सकता है कि इन बातों की खोज वास्तव में किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने की हो, लेकिन उसने यह काम अपनी बुद्धिमत्ता के कारण नहीं किया। बुद्धिमान व्यक्ति भी अनेक ऐसे काम करता है जिन्हें हम साधारण लोग, जो किसी अर्थ में बुद्धिमान नहीं कहलाते, भी उतनी ही अच्छी तरह। कई बार उससे भी अधिक कुशलता और आसानी से कर लेते हैं। 

    क्या आप जानना चाहते हैं कि दर्शन ने वास्तव में कौन-सी खोजें की हैं? सबसे पहले, उसने हमें प्रकृति के गहरे सत्य समझाए। उसने उन्हें दूसरे जीवों से बिल्कुल अलग ढंग से जाना क्योंकि दूसरे प्राणियों की समझ दैवीय और सार्वभौमिक सत्य को देखने में सीमित होती है। दूसरी बात, उसने जीवन जीने का नियम बताया और उसे पूरे ब्रह्मांड की व्यवस्था के अनुरूप रखा। उसने हमें केवल देवताओं के बारे में जानना ही नहीं सिखाया बल्कि उनके अनुसार जीवन जीना भी सिखाया। उसने यह भी सिखाया कि जो कुछ भी घटित होता है, उसे देवताओं की इच्छा मानकर स्वीकार करना चाहिए। उसने हमें झूठी धारणाओं के पीछे न भागने की शिक्षा दी। उसने हर चीज़ का मूल्य सही कसौटी पर परखा। उसने उन सुखों की निंदा की जिनके पीछे अंत में पछतावा मिलता है। उन सच्चे अच्छे गुणों की प्रशंसा की जो हमेशा संतोष देते हैं। उसने हमें बताया कि सबसे भाग्यशाली वह है जिसे भाग्य के सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती। सबसे शक्तिशाली वह है जो स्वयं पर अधिकार रखता है। 

    मैं जिस दर्शन की बात कर रहा हूँ, वह ऐसा दर्शन नहीं है जो मनुष्य को उसके समाज से अलग कर दे या देवताओं को इस संसार से बाहर मान ले, या सद्गुण को केवल सुख पाने का साधन बना दे। मैं उस दर्शन की बात कर रहा हूँ जो मानता है कि सम्मान और नैतिक श्रेष्ठता के अलावा कोई भी चीज़ वास्तव में अच्छी नहीं है। जिसे न मनुष्यों के उपहार लुभा सकते हैं और न भाग्य की कृपा और जिसका सबसे बड़ा पुरस्कार यही है कि उसके अनुयायियों को किसी भी प्रकार के पुरस्कार या लालच से डगमगाया नहीं जा सकता। 

    मैं यह नहीं मानता कि उस आदिम युग में दर्शन का अस्तित्व था, जब न कोई तकनीकी कला विकसित हुई थी और न ही लोग चीज़ों का उपयोग ठीक से जानते थे। उस समय लोग अनुभव करते-करते और बार-बार कोशिश करके सीख रहे थे कि किस चीज़ का कैसे इस्तेमाल करना है। दर्शन तो उस सुखद युग के बाद आया, जब प्रकृति की दी हुई चीज़ें सबके लिए आसानी से उपलब्ध थीं। उस समय न लालच ने लोगों को एक-दूसरे से अलग किया था, न भोग-विलास ने उन्हें बाँटा था। उन्होंने अभी तक लाभ कमाने के लिए मिल-जुलकर रहने की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति को नहीं छोड़ा था। उस समय के लोग बुद्धिमान नहीं थे, भले ही उनका जीवन और उनका व्यवहार वैसा था जैसा किसी बुद्धिमान व्यक्ति का होना चाहिए। 

    मनुष्य जाति के लिए इससे बेहतर जीवन की कल्पना करना कठिन है। यहाँ तक कि यदि स्वयं ईश्वर किसी को यह अवसर दे दें कि वह पृथ्वी की व्यवस्था नए सिरे से बनाए और लोगों के लिए जीवन के नियम तय करे, तब भी वह इससे अच्छा जीवन नहीं बना सकेगा। उस जीवन-पद्धति से बेहतर कोई दूसरी व्यवस्था नहीं हो सकती, जिसके बारे में कहा गया है—

"कोई किसान खेत नहीं जोतता था
यहाँ तक कि ज़मीन पर अपनी सीमा-रेखाएँ खींचना भी अनुमति नहीं थी
लोगों का श्रम और उनका प्रयास सबके साझा हित के लिए होता था
और धरती भी, जब उससे ज़बरदस्ती कुछ नहीं माँगा जाता था
तो अपने सारे उपहार और भी अधिक उदारता से देती थी"

 मनुष्य जाति इससे अधिक सुखी और सौभाग्यशाली कैसे हो सकती थी? प्रकृति के दिए हुए फलों और संसाधनों में सबका बराबर हिस्सा था। जैसे कोई माता या पिता अपने सभी बच्चों का पालन-पोषण करता है, वैसे ही प्रकृति सबकी ज़रूरतें पूरी करती थी। लोग चिंता से मुक्त थे क्योंकि वे प्रकृति की चीज़ों का उपयोग तो करते थे। लेकिन उन पर अपना निजी अधिकार नहीं जताते थे। वे उन्हें सबकी साझी संपत्ति मानते थे। निश्चय ही मैं उस समाज को सबसे अधिक समृद्ध कह सकता हूँ क्योंकि वहाँ आपको एक भी व्यक्ति गरीब नहीं मिलता था।

    उस सुंदर व्यवस्था को लालच ने नष्ट कर दिया। ज़्यादा-से-ज़्यादा पाने और हर चीज़ पर अपना निजी अधिकार जमाने की चाह में उसने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि जो चीज़ें पहले सबकी थीं, वे अलग-अलग लोगों की संपत्ति बन गईं। इस तरह उसने अपनी ही पहले की असीम संपदा को बहुत छोटा कर लिया। लालच ने ही गरीबी को जन्म दिया। उसने सब कुछ पाने की इच्छा की। लेकिन उसी इच्छा में वह सब कुछ खो बैठा। आज भी लालच अपनी खोई हुई चीज़ों को वापस पाने की कोशिश करता है। वह एक ज़मीन के साथ दूसरी ज़मीन जोड़ता जाता है। पड़ोसियों की ज़मीन कभी खरीदकर तो कभी उन्हें हटाकर अपने अधिकार में कर लेता है। अपनी संपत्ति का विस्तार करते-करते वह पूरे-के-पूरे प्रांतों जितना बड़ा इलाका अपने नाम कर लेता है। उसकी ज़मीन इतनी फैल जाती है कि उसे अपनी ही संपत्ति के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ती है और वह इसे अपना मालिकाना हक़ कहता है। लेकिन चाहे हम अपनी ज़मीन की सीमाएँ कितनी भी बढ़ा लें, हम कभी उस पहली अवस्था में वापस नहीं पहुँच सकते। जब हम यह सब कर लेंगे, तब हमारे पास बहुत-सी संपत्ति होगी। लेकिन एक समय ऐसा था जब पूरी पृथ्वी ही हमारी थी। 

    धरती उस समय कहीं अधिक उपजाऊ थी, जब उसे जोता नहीं जाता था। वह उन लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए भरपूर उपज देती थी, जो लूटकर इकट्ठा करने वाले नहीं थे। प्रकृति की उदारता से मिली किसी चीज़ को खोज लेने में जितनी खुशी मिलती थी, उतनी ही खुशी उसे किसी दूसरे के साथ बाँटने में भी होती थी। कोई भी व्यक्ति अपनी ज़रूरत से ज़्यादा या कम नहीं रखता था। लोग आपस में मिल-जुलकर हर चीज़ साझा करते थे। वह समय अभी नहीं आया था जब ताकतवर लोग कमज़ोरों पर कब्ज़ा करने लगे थे। लालची लोग अपने लिए चीज़ें छिपाकर जमा नहीं करते थे और इस तरह दूसरों को जीवन की ज़रूरी चीज़ों से वंचित नहीं करते थे। वे दूसरों की भलाई का उतना ही ध्यान रखते थे, जितना अपना। उस समय हथियार हर समय इस्तेमाल नहीं होते थे। लोगों के हाथ इंसानों के खून से नहीं रंगे होते थे। उनका संघर्ष केवल जंगली जानवरों से होता था। उस युग के लोग घने जंगलों की छाया में धूप से बचते थे। पत्तों से बने साधारण आश्रय उन्हें बारिश और तूफ़ान से सुरक्षित रखते थे। वे दिन भर निश्चिंत रहते थे और रात को बिना किसी चिंता या आह के गहरी नींद सोते थे। इसके विपरीत, आज हम मुलायम और शानदार बिस्तरों पर भी बेचैनी में करवटें बदलते रहते हैं। हमारी चिंताएँ हमें सोने नहीं देतीं। लेकिन वे लोग कठोर ज़मीन पर भी कितनी गहरी और मीठी नींद सोते थे! उनके सिर पर नक्काशीदार और सजी हुई छतें नहीं थीं। वे खुले आकाश के नीचे लेटते थे। उनके ऊपर असंख्य तारे धीरे-धीरे चलते दिखाई देते थे, और पूरा आकाश बिना किसी आवाज़ के अपनी महान गति से चलता रहता था। दिन हो या रात, प्रकृति का यह अद्भुत संसार उनकी आँखों के सामने खुला रहता था। वे देखते थे कि कुछ नक्षत्र आकाश में ऊपर पहुँचकर पश्चिम की ओर डूब रहे हैं और कुछ दूसरे फिर से उगकर दिखाई देने लगते हैं। इतने विशाल और आश्चर्य से भरे इस ब्रह्मांड के बीच घूमना-फिरना क्या अपने आप में एक अनोखा आनंद नहीं था? 

    लेकिन आज के लोग हर छोटी-सी आवाज़ से घबरा उठते हैं। अगर उनके घर में कहीं ज़रा-सी चरमराहट सुनाई दे जाए, तो वे अपनी रंग-बिरंगी चित्रकारी से सजी दीवारों के बीच भी डरकर भागने लगते हैं। उस समय के लोगों के घर आज के नगरों जैसे विशाल और जटिल नहीं थे। खुले वातावरण की स्वच्छ और ठंडी हवा, चट्टानों या पेड़ों की हल्की छाया, बिलकुल साफ़ पानी वाले झरने, बिना किसी बाँध, नहर, पाइप या दूसरी कृत्रिम व्यवस्था के बहती नदियाँ और अपनी प्राकृतिक सुंदरता से भरे घास के मैदान, यही उनके घरों का परिवेश था।उनके घर केवल गाँव के साधारण कारीगरों की मेहनत से बने होते थे। उनमें कोई दिखावा नहीं था। वे पूरी तरह प्रकृति के अनुरूप थे। ऐसे घरों में रहना आनंद की बात थी। न तो उन घरों के कारण कोई चिंता होती थी और न ही उनकी रक्षा या देखभाल की फ़िक्र सताती थी। लेकिन आज हमारे घर ही हमारी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बन गए हैं। 

    उनका जीवन भले ही बहुत सुंदर और निष्कपट था, लेकिन वे बुद्धिमान नहीं थे। 'बुद्धिमान' कहलाने का अधिकार केवल उसी को है जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि तक पहुँच चुका हो। फिर भी मैं यह नहीं कहूँगा कि वे साधारण लोग थे। उनमें ऊँचे विचार और महान स्वभाव था। यदि ऐसा कहना उचित हो तो वे मानो अभी-अभी देवताओं के सान्निध्य से पृथ्वी पर आए थे। जब संसार अभी अपनी पूरी शक्ति से भरा हुआ था, तब वह ऐसे ही श्रेष्ठ मनुष्यों को जन्म देता था। उनका स्वभाव अधिक मज़बूत था। वे शारीरिक मेहनत के लिए हमसे कहीं अधिक सक्षम थे। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे चरित्र की पूर्णता तक पहुँच चुके थे। प्रकृति हमें सद्गुण देकर पैदा नहीं करती। अच्छा इंसान बनना एक ऐसी कला है जिसे अभ्यास और प्रयास से सीखना पड़ता है।निश्चय ही वे लोग धरती की गहराइयों में सोना, चाँदी या चमकते हुए रत्न खोजने के लिए खदानें नहीं खोदते थे। उस समय ऐसा भी नहीं था कि लोग केवल तमाशा देखने के आनंद के लिए एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य की हत्या करवाएँ। न उनमें क्रोध ऐसा था, न भय, जो उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करे। वे तो बोल न सकने वाले पशुओं पर भी दया करते थे। वे न कढ़ाईदार कपड़े पहनते थे और न सोने के तारों से बुने हुए वस्त्र क्योंकि उस समय तक सोना धरती से निकाला ही नहीं गया था।

    तो फिर हमारा निष्कर्ष क्या है? यह कि वे लोग बुरे नहीं थे। लेकिन उनकी भलमनसाहत ज्ञान के कारण नहीं बल्कि अज्ञान के कारण थी। किसी व्यक्ति का गलत काम न करना और यह न जानना कि गलत काम कैसे किया जाता है, इन दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है। उनमें न्याय, विवेक, संयम और साहस जैसे सद्गुण वास्तव में मौजूद नहीं थे। हाँ, उनका सरल जीवन इन गुणों जैसा ज़रूर दिखाई देता था। लेकिन वह सच्चा सद्गुण नहीं था। सच्चा सद्गुण केवल उसी मन में जन्म लेता है जिसे शिक्षा मिली हो, जिसने सही प्रशिक्षण पाया हो, और जो निरंतर अभ्यास के द्वारा अपने सर्वोच्च स्तर तक पहुँच गया हो। निस्संदेह, हम सबमें सद्गुण प्राप्त करने की क्षमता लेकर जन्म होता है, लेकिन हम जन्म से ही सद्गुणी नहीं होते। जब तक मनुष्य को उचित शिक्षा और अभ्यास नहीं मिलता, तब तक उसका स्वभाव चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसके पास केवल सद्गुण बनने की संभावना होती है, स्वयं सद्गुण नहीं।


अभी के लिए विराम 

विज़डम और दर्शनशास्त्र के बीच अंतर के बारे में -- पत्र - 87 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


दर्शनशास्त्र को विभाजित करके उसके विशाल स्वरूप को विभिन्न अंगों में समझने का जो अनुरोध तुम कर रहे हो, वह उपयोगी ही नहीं बल्कि उस व्यक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है जो शीघ्रता से प्रज्ञा प्राप्त करना चाहता है। किसी संपूर्ण वस्तु को उसके विभिन्न भागों के माध्यम से समझना हमारे लिए अधिक सरल होता है। यदि हम दर्शनशास्त्र को उसके पूर्ण रूप में वैसे ही देख पाते, जैसे एक ही दृष्टि में पूरे आकाश का अवलोकन करते हैं तो वह दृश्य भी आकाश के समान ही विस्मयकारी होता। तब प्रत्येक मनुष्य उसे देखकर आश्चर्य से भर जाता और उन वस्तुओं का मोह छोड़ देता जिन्हें आज हम केवल इसलिए महान समझते हैं क्योंकि हमें वास्तविक महानता का ज्ञान नहीं है। किन्तु चूँकि ऐसा संभव नहीं है। इसलिए हमें दर्शनशास्त्र का अध्ययन उसी प्रकार करना चाहिए जैसे कोई व्यक्ति आकाश के विभिन्न भागों का अलग-अलग निरीक्षण करके अंततः पूरे आकाश को समझने का प्रयास करता है।



    निस्संदेह, बुद्धिमान व्यक्ति की बुद्धि दर्शनशास्त्र के सम्पूर्ण विस्तार को अपने भीतर समेट लेती है और उस पर उतनी ही शीघ्रता से दृष्टि डालती है, जितनी शीघ्रता से हमारी आँख पूरे आकाश का अवलोकन कर लेती है। परन्तु हम, जिनकी दृष्टि उन धुंधों से सीमित है जिनके बीच से हमें देखना पड़ता है, उनके लिए अलग-अलग बातों को समझना अधिक सरल है क्योंकि अभी हम सम्पूर्णता को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। इसलिए मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा और दर्शनशास्त्र को विभाजित करूँगा, किन्तु उसे अत्यन्त सूक्ष्म टुकड़ों में नहीं बल्कि उसके मुख्य भागों में। इस प्रकार का विभाजन उपयोगी है परन्तु उसे अत्यधिक छोटे-छोटे अंशों में बाँट देना उचित नहीं। जो वस्तु अत्यन्त सूक्ष्म हो जाती है, उसे समझना उतना ही कठिन होता है जितना किसी अत्यन्त विशाल वस्तु को समझना। जैसे किसी जनसमुदाय को विभिन्न जनजातियों में विभाजित किया जाता है और किसी सेना को सौ-सौ सैनिकों की टुकड़ियों में बाँटा जाता है, उसी प्रकार जो भी वस्तु पर्याप्त विशाल हो, उसे उसके उपयुक्त भागों में विभाजित करके समझना अधिक सरल होता है। किन्तु, जैसा मैंने कहा, ये भाग इतने अधिक और इतने छोटे नहीं होने चाहिए कि उनका कोई स्वतंत्र स्वरूप ही न रह जाए। अत्यधिक विभाजन उतना ही दोषपूर्ण है जितना बिल्कुल भी विभाजन न करना; क्योंकि जब किसी वस्तु को पीसकर चूर्ण बना दिया जाता है, तब उसकी संरचना ही समाप्त हो जाती है।

    यदि तुम्हें उचित लगे तो मैं सबसे पहले विज़डम और दर्शनशास्त्र के बीच का अंतर बताकर आरम्भ करूँगा।प्रज्ञा मानव-मन का सर्वोच्च कल्याण है जबकि दर्शनशास्त्र प्रज्ञा के प्रति प्रेम और उसकी प्राप्ति की आकांक्षा है। दर्शनशास्त्र उस लक्ष्य की ओर बढ़ना है, जहाँ प्रज्ञा पहले ही पहुँच चुकी होती है। 'फिलॉसफी' शब्द की व्युत्पत्ति क्या है? यह तो स्पष्ट है। इसका नाम ही घोषित करता है कि यह किससे प्रेम करता है। कुछ लोगों ने प्रज्ञा को मानव और दैवीय विषयों का विज्ञान कहा है। अन्य लोगों ने इसे मानव और दैवीय विषयों तथा उनके कारणों का ज्ञान बताया है। मेरे विचार से यह अंतिम जोड़ अनावश्यक है क्योंकि मानव और दैवीय विषयों के कारण स्वयं दैवीय क्षेत्र का ही एक भाग हैं। दर्शनशास्त्र की अन्य परिभाषाएँ भी दी गई हैं। कुछ ने इसे सद्गुण के प्रति समर्पण कहा है। कुछ ने मन को सुधारने का संकल्प और कुछ विचारकों के अनुसार यह सही ढंग से तर्क करने का प्रयास है। सामान्यतः सभी इस बात से सहमत हैं कि दर्शनशास्त्र और प्रज्ञा में अंतर है क्योंकि जिस वस्तु की आकांक्षा की जाती है, वह स्वयं आकांक्षा नहीं हो सकती। जिस प्रकार लोभ और धन में बहुत अंतर है। एक चाहने की प्रवृत्ति है और दूसरा चाही जाने वाली वस्तु। उसी प्रकार दर्शनशास्त्र और प्रज्ञा भी भिन्न हैं। दर्शनशास्त्र एक यात्रा है और प्रज्ञा उस यात्रा का फल तथा पुरस्कार। दर्शनशास्त्र आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। जबकि प्रज्ञा उसका अंतिम गंतव्य है। 'सोफिया' (Sophia) वास्तव में यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'प्रज्ञा' या 'बुद्धिमत्ता' है। रोमन लोग भी कभी 'सोफिया' शब्द का प्रयोग करते थे, ठीक वैसे ही जैसे आज भी हम यूनानी शब्द 'फिलॉसोफिया' (Philosophia) का प्रयोग करते हैं। इसका प्रमाण हमारी प्राचीन हास्य-रचनाओं में मिलता है और डोसेनस की समाधि पर अंकित इस लेख में भी, "हे पथिक, ठहरो और डोसेनस की प्रज्ञा (सोफिया) को पढ़ो।"

    यद्यपि दर्शनशास्त्र को सद्गुण के प्रति समर्पण कहा जाता है, जहाँ एक साधक है और दूसरा साध्य, फिर भी हमारे मत (स्टोइक परंपरा) के कुछ विचारकों का मानना है कि इन दोनों में कोई वास्तविक भेद नहीं किया जा सकता क्योंकि न तो सद्गुण के बिना दर्शनशास्त्र संभव है और न ही दर्शनशास्त्र के बिना सद्गुण। वास्तव में दर्शनशास्त्र सद्गुण के प्रति समर्पण है। परन्तु वह स्वयं सद्गुण के माध्यम से ही संभव होता है। न तो सद्गुण उसके प्रति समर्पण के बिना अस्तित्व में रह सकता है और न ही सद्गुण के बिना उसके प्रति समर्पण हो सकता है। यह उस धनुर्धर के समान नहीं है, जो दूर स्थित किसी लक्ष्य पर निशाना साधता है। यहाँ लक्ष्य साधक से अलग किसी अन्य स्थान पर नहीं है। उसी प्रकार सद्गुण तक पहुँचने के मार्ग भी सद्गुण से बाहर नहीं होते, जैसे किसी नगर तक पहुँचने के लिए सड़कें नगर से बाहर होती हैं। मनुष्य सद्गुण तक स्वयं सद्गुण के माध्यम से ही पहुँचता है। इसलिए दर्शनशास्त्र और सद्गुण एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। 

    अधिकांश और सबसे प्रतिष्ठित दार्शनिकों के अनुसार दर्शनशास्त्र के तीन भाग हैं। नीतिशास्त्र (एथिक्स), प्रकृतिशास्त्र (फिज़िक्स) और तर्कशास्त्र (लॉजिक)। इनमें से पहला भाग मन को संयमित और निर्देशित करता है। दूसरा वस्तुओं के स्वभाव और प्रकृति का अध्ययन करता है और तीसरा शब्दों के अर्थ, वाक्यों की संरचना तथा तर्कों के रूपों की परीक्षा करता है ताकि असत्य सत्य का रूप धारण करके लोगों को धोखा न दे सके।किन्तु कुछ दार्शनिक परंपराओं ने दर्शनशास्त्र के इन विभागों को या तो कम कर दिया या बढ़ा दिया। कुछ पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) दार्शनिकों ने राजनीति को दर्शनशास्त्र का चौथा भाग माना क्योंकि उनके विचार में उसके लिए एक विशिष्ट प्रकार के अध्ययन और अलग विषय-वस्तु की आवश्यकता होती है। कुछ ने इसके अतिरिक्त 'अर्थशास्त्र' (ओइकोनोमिक्स) को भी जोड़ा, जिसका अर्थ है गृह-प्रबंधन का विज्ञान। कुछ ने 'जीवन की विभिन्न शैलियों' को भी एक स्वतंत्र विषय माना। परन्तु इन सभी विषयों को वास्तव में नीतिशास्त्र के अंतर्गत ही समाहित किया जा सकता है। एपिक्यूरियन दार्शनिकों का मत था कि दर्शनशास्त्र के केवल दो ही भाग हैं। प्रकृतिशास्त्र और नीतिशास्त्र। उन्होंने तर्कशास्त्र को अलग विभाग के रूप में स्वीकार नहीं किया। लेकिन जब उन्हें शब्दों की अस्पष्टताओं को दूर करने और उन असत्यों का पर्दाफाश करने की आवश्यकता पड़ी जो सत्य का रूप धारण कर लेते हैं, तब उन्होंने भी 'निर्णय और मानदंड' नामक एक विषय को स्वीकार किया। वस्तुतः यही तर्कशास्त्र था, यद्यपि वे इसे प्रकृतिशास्त्र का केवल एक पूरक मानते थे। 

    साइरेनाइक दार्शनिकों ने तो प्रकृतिशास्त्र और तर्कशास्त्र, दोनों को ही हटाकर केवल नीतिशास्त्र को स्वीकार किया। फिर भी उन्होंने दूसरे ढंग से उन्हीं विषयों को पुनः शामिल कर लिया। उन्होंने नीतिशास्त्र को पाँच भागों में विभाजित किया—

  1. किन वस्तुओं का अनुसरण करना चाहिए और किनसे बचना चाहिए।

  2. भावनाएँ।

  3. कर्म।

  4. कारण।

  5. तर्क।

वास्तव में 'कारणों' का अध्ययन प्रकृतिशास्त्र के अंतर्गत आता है और 'तर्कों' का अध्ययन तर्कशास्त्र के अंतर्गत।किओस के अरिस्टो का मत था कि प्रकृतिशास्त्र और तर्कशास्त्र न केवल अनावश्यक हैं बल्कि हानिकारक भी हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने नीतिशास्त्र का भी संकुचन कर दिया जबकि वही एकमात्र भाग था जिसे उन्होंने स्वीकार किया था। उन्होंने उपदेश और नैतिक परामर्श से संबंधित विषय को भी हटाते हुए कहा कि यह कार्य किसी विद्यालय के शिक्षक का है। दार्शनिक का नहीं, मानो दार्शनिक मानवता का शिक्षक ही न हो! 

    चूँकि दर्शनशास्त्र के तीन भाग हैं। इसलिए हम उसके नीतिशास्त्र (एथिक्स) से आरम्भ करें। परंपरागत रूप से नीतिशास्त्र को तीन शाखाओं में विभाजित किया जाता है। पहली शाखा प्रत्येक वस्तु का उचित मूल्य निर्धारित करती है और यह निर्णय करती है कि उसका वास्तविक महत्व कितना है। यह अत्यंत उपयोगी अध्ययन है क्योंकि वस्तुओं का सही मूल्यांकन करने से अधिक आवश्यक और क्या हो सकता है? दूसरी शाखा मनुष्य की प्रवृत्तियों और इच्छाओं (आवेगों) का अध्ययन करती है। तीसरी शाखा कर्मों का अध्ययन करती है। अर्थात नीतिशास्त्र का उद्देश्य यह है कि—

  1. सबसे पहले, तुम यह सही ढंग से निर्णय कर सको कि प्रत्येक वस्तु का वास्तविक मूल्य क्या है।

  2. दूसरे, उन वस्तुओं के प्रति तुम्हारी इच्छाएँ और प्रवृत्तियाँ संतुलित, संयमित और विवेकपूर्ण हों।

  3. तीसरे, तुम्हारी इच्छाओं तथा तुम्हारे कर्मों में पूर्ण सामंजस्य हो ताकि तुम्हारे समस्त आचरण में एकरूपता, स्थिरता और संगति बनी रहे।

यही वह अवस्था है जिसमें मनुष्य जैसा उचित समझता है, वैसा ही चाहता है और जैसा चाहता है, वैसा ही करता भी है। यही नैतिक जीवन की पूर्णता है।

    इन तीनों क्षेत्रों में से किसी एक में भी दोष आ जाए तो उसका प्रभाव शेष दोनों पर भी पड़ता है। यदि तुमने सभी वस्तुओं का सही मूल्यांकन कर लिया हो, लेकिन तुम्हारी इच्छाएँ और आवेग असंयमित हों तो उस ज्ञान का क्या लाभ? यदि तुमने अपनी इच्छाओं को वश में कर लिया हो तथा अपनी कामनाओं पर नियंत्रण पा लिया हो, लेकिन कर्म करते समय परिस्थितियों की समझ न हो, और यह न जानते हो कि किस समय, किस स्थान पर और किस प्रकार कार्य करना उचित है तो उससे भी क्या लाभ? वस्तुओं का मूल्य और महत्व समझना एक बात है। समय की माँग को समझना दूसरी बात है और अपनी इच्छाओं को संयमित रखते हुए बिना उतावलेपन के उचित कर्म करना उससे भी भिन्न बात है। जीवन तभी अपने भीतर पूर्ण सामंजस्य प्राप्त करता है, जब कर्म, इच्छा से पीछे न रह जाए और इच्छा भी प्रत्येक वस्तु के वास्तविक मूल्य के आधार पर उत्पन्न हो तथा उसकी तीव्रता भी उसी वस्तु के महत्व के अनुरूप हो। 

    दर्शनशास्त्र का प्रकृतिशास्त्र (फिज़िक्स) दो उपभागों में विभाजित किया जाता है— साकार (शारीरिक) वस्तुएँ और निराकार (अशारीरिक) वस्तुएँ। इन दोनों के भी अपने-अपने स्तर या विभाग हैं। साकार वस्तुओं का अध्ययन मुख्यतः दो वर्गों में किया जाता है—

  1. वे वस्तुएँ जो कारण (कारक) हैं।

  2. वे वस्तुएँ जो कारणों से उत्पन्न होती हैं अर्थात तत्त्व (एलिमेंट्स)।

जहाँ तक तत्त्वों का प्रश्न है, कुछ दार्शनिकों के अनुसार उनका कोई और विभाजन नहीं है। किन्तु अन्य विचारक उन्हें तीन भागों में बाँटते हैं—

  • पदार्थ (मैटर),

  • वह सक्रिय कारण (क्रियाशील सिद्धांत) जो समस्त वस्तुओं को गति और कार्यशीलता प्रदान करता है,

तत्त्व (एलिमेंट्स) स्वयं। 

पहले प्रकार को तकनीकी भाषा में वाक्पटुता (रेटोरिक) कहा जाता है, और दूसरे को द्वंद्वात्मक तर्क (डायलेक्टिक)

वाक्पटुता का संबंध भाषा की अभिव्यक्ति, विचारों और उनकी सुव्यवस्थित प्रस्तुति से है। द्वंद्वात्मक तर्क दो भागों में विभाजित होता है, शब्दों का अध्ययन और अर्थों का अध्ययन अर्थात एक ओर वे बातें जो कही जाती हैं। दूसरी ओर वे शब्द या कथन जिनके माध्यम से वे बातें व्यक्त की जाती हैं।

इसके बाद इन दोनों विषयों के भी अत्यंत विस्तृत उपविभाग हैं। किन्तु इस समय मैं अपनी सूची को यहीं संक्षेप में समाप्त करता हूँ और केवल 'मुख्य बिंदुओं का स्पर्श' भर करूँगा। अन्यथा यदि मैं इन विभाजनों को इसी प्रकार विस्तार से बताने लगूँ तो यह पत्र एक साधारण संवाद न रहकर एक तकनीकी ग्रंथ बन जाएगा। अब मेरे लिए दर्शनशास्त्र के तर्कशास्त्र (लॉजिक) का विभाजन करना शेष रह जाता है। समस्त वाक्-विनिमय (विमर्श) दो प्रकार का होता है या तो वह निरंतर प्रवाह के रूप में होता है अथवा प्रश्न और उत्तर के रूप में विभाजित होता है। इन विषयों का अध्ययन तुम स्वयं भी कर सकते हो, प्रिय ल्यूसीलियस। मेरा उद्देश्य तुम्हें उनसे विमुख करना नहीं है। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि जो कुछ भी तुम पढ़ो, उसे तुरंत अपने आचरण से जोड़ो। 

    अपने चरित्र को अनुशासित करो। अपने भीतर जो गुण शिथिल पड़ गए हैं, उन्हें जागृत करो। जो प्रवृत्तियाँ आवश्यकता से अधिक उन्मुक्त हो गई हैं, उन्हें संयमित करो। जो विद्रोही हैं, उन्हें वश में लाओ। अपने भीतर की वासनाओं पर प्रहार करने में कोई कसर न छोड़ो, और जहाँ तक संभव हो, संसार में व्याप्त दोषों और विकारों का भी प्रतिरोध करो। जो लोग तुमसे कहते हैं, "क्या तुम कभी रुकने वाले नहीं हो?", उन्हें यह उत्तर दो— "तुम्हें तो मुझसे यह पूछना चाहिए। 'तुम अपनी भूलों को दोहराना कब बंद करोगे?' क्या तुम चाहते हो कि रोग से पहले ही उसका उपचार समाप्त हो जाए? मैं तो इस विषय पर और भी अधिक बोलूँगा और तुम्हारे विरोध के कारण ही इसे और दृढ़ता से करता रहूँगा। जिस प्रकार सुन्न पड़ चुके अंग पर लगाई गई औषधि तभी प्रभाव दिखाने लगती है, जब उसके स्पर्श से पीड़ा का अनुभव होने लगे, उसी प्रकार मेरी बातें भी तुम्हारे लिए लाभकारी होंगी। चाहे तुम्हें वे अच्छी लगें या नहीं। अब समय आ गया है कि एक निर्भीक और निष्कपट स्वर तुम्हारे कानों तक पहुँचे। जब मैं तुममें से प्रत्येक को अलग-अलग समझाने में सफल नहीं हो सकता, तब मैं तुम सबको एक साथ, सार्वजनिक रूप से संबोधित करूँगा।"
    "तुम अपनी संपत्ति की सीमाएँ बढ़ाना आखिर कब बंद करोगे? जो भूमि कभी एक पूरे राष्ट्र के लिए पर्याप्त थी, क्या वह अब एक अकेले स्वामी के लिए भी छोटी पड़ गई है? तुम अपने विशाल कृषि-भूखंडों का विस्तार कब तक करते रहोगे? तुम्हें तो इतना भी पर्याप्त नहीं लगता कि तुम्हारी निजी जागीरें पूरे-पूरे प्रांतों के बराबर फैली हों। प्रसिद्ध नदियाँ पूरी की पूरी तुम्हारी निजी संपत्ति के बीच से बहती हैं। वे महान नदियाँ, जो कभी शक्तिशाली राष्ट्रों की सीमाएँ निर्धारित करती थीं, अपने उद्गम से लेकर समुद्र में मिलने तक तुम्हारे अधिकार में हैं। फिर भी तुम्हें यह सब कम लगता है, यदि तुम्हारी ज़मीन समुद्रों तक न पहुँच जाए। यदि तुम्हारा प्रबंधक एड्रियाटिक, आयोनियन और एजियन समुद्रों के पार तक आदेश न दे। यदि वे द्वीप, जो कभी महान शासकों के निवास रहे थे, तुम्हें तुच्छ संपत्ति न प्रतीत हों। जितना चाहे अपनी संपत्ति का विस्तार कर लो। जिसे कभी एक साम्राज्य कहा जाता था, उसे अपनी निजी जागीर बना लो। जितना कुछ अपने अधिकार में ले सकते हो, ले लो। फिर भी दूसरों की संपत्ति तुम्हारी संपत्ति से अधिक ही रहेगी।"
    "अब मैं तुम लोगों से भी संबोधित होता हूँ, जिनका भोग-विलास उतना ही असीम है जितना उन दूसरे लोगों का लोभ। मैं तुमसे पूछता हूँ, यह सब आखिर कब तक चलता रहेगा? हर झील के किनारे तुम्हारी अट्टालिकाएँ खड़ी हैं। हर नदी के तट पर तुम्हारी इमारतें फैली हुई हैं। जहाँ कहीं भी गर्म जल के स्रोत फूटते हैं, वहीं तुम नए विलास-भवन बनाना शुरू कर देते हो। जहाँ भी समुद्र का किनारा किसी खाड़ी का रूप लेता है, तुम तुरंत उसकी भूमि पर नींव डाल देते हो। जिस भूमि को तुमने अपनी इच्छा के अनुसार बदल न दिया हो, उससे तुम्हें संतोष नहीं होता। यहाँ तक कि तुम समुद्र को भी अपनी भूमि के भीतर खींच लाते हो। तुम्हारे भवन हर ओर चमकते दिखाई देते हैं। कहीं वे पर्वतों की चोटियों पर इसलिए बनाए जाते हैं कि वहाँ से धरती और समुद्र का विशाल दृश्य दिखाई दे, तो कहीं समतल भूमि पर उन्हें पर्वतों जितना ऊँचा खड़ा कर दिया जाता है। किन्तु इतने विशाल और भव्य निर्माण कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास रहने के लिए केवल एक ही शरीर है और वह भी अत्यंत छोटा और दुर्बल। इतने अधिक शयनकक्षों का क्या लाभ? तुम एक समय में केवल एक ही कमरे में सो सकते हो। जिस स्थान पर तुम स्वयं रहते ही नहीं, वह वास्तव में तुम्हारा नहीं है।"
    "और अंत में, मैं तुम लोगों से भी कहता हूँ जिनकी अतृप्त और असीम भोग-लालसा स्वादिष्ट भोजन की खोज में समुद्रों और धरती को छान मारती है। कभी काँटों से, कभी फंदों से और कभी तरह-तरह के जालों से। जब तक तुम उनसे ऊब नहीं जाते, तब तक किसी भी जीव को चैन नहीं मिलता। इतने लोगों की मेहनत से जुटाए गए तुम्हारे इन भव्य भोजों में से तुम अपने सुख-भोग से थके हुए मुँह से कितना ही थोड़ा-सा चखते हो! इतने जोखिम उठाकर पकड़े गए उस शिकार में से अपच और मतली से पीड़ित स्वामी कितना ही थोड़ा-सा खा पाता है! इतनी दूर-दूर से मँगाए गए उन असंख्य शंख-सीपों और समुद्री व्यंजनों में से तुम्हारे इस अतृप्त पेट में वास्तव में कितना ही थोड़ा-सा पहुँचता है! अभागे लोगो! क्या तुम्हें यह भी समझ में नहीं आता कि तुम्हारी भूख तुम्हारे पेट से कहीं अधिक बड़ी है?"
    यह सब दूसरों से कहो, पर इस भावना के साथ कि बोलते समय तुम स्वयं भी उसे सुन रहे हो। इसे लिखो पर इस उद्देश्य से कि लिखते समय तुम स्वयं उसे पढ़ भी रहे हो और जो कुछ लिखो उसे अपने आचरण तथा अपनी उन्मत्त वासनाओं के शमन से जोड़ो। अपने अध्ययन का लक्ष्य अधिक जानना नहीं बल्कि बेहतर ढंग से जानना बनाओ।

अभी के लिए विदा 

लिबरल आर्ट्स एवं दर्शन के बारे में -- पत्र - 86 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम पूछते हो कि लिबरल आर्ट्स के विषय में मेरा क्या विचार है। मुझे उनमें से किसी के प्रति कोई विशेष सम्मान नहीं है और न ही मैं उस अध्ययन को अच्छा मानता हूँ जिसका उद्देश्य केवल धन कमाना हो। ये तो केवल ऐसी कलाएँ हैं जिन्हें बाज़ार में उपयोग में लाया जा सकता है। उनका महत्त्व केवल इतना है कि वे मन को आगे की शिक्षा के लिए तैयार करती हैं, न कि इसलिए कि उन्हें जीवनभर का व्यवसाय बना लिया जाए। इनका अध्ययन केवल तब तक करना चाहिए, जब तक मन किसी अधिक महत्त्वपूर्ण विषय को ग्रहण करने योग्य न हो जाए। ये हमारी प्रारम्भिक शिक्षा हैं, हमारा वास्तविक कार्य नहीं। यह स्पष्ट है कि इन्हें 'लिबरल' स्टडीज़ क्यों कहा जाता है क्योंकि वे एक स्वतंत्र व्यक्ति के योग्य हैं। किन्तु वास्तव में केवल एक ही अध्ययन ऐसा है जो सच्चे अर्थों में उदार है और वह है वह अध्ययन जो मनुष्य को मुक्त करता है अर्थात् दर्शन का अध्ययन। केवल दर्शन ही उदात्त है, सामर्थ्यवान है और महान आत्मा वाला है। अन्य सभी विद्याएँ तुच्छ और बालसुलभ हैं। या क्या तुम यह सोचते हो कि किसी ऐसी विद्या में वास्तव में कोई मूल्य हो सकता है, जिसके शिक्षक या उसे अपना व्यवसाय बनाने वाले लोग स्वयं अत्यन्त भ्रष्ट और तिरस्करणीय हों? हमारा उद्देश्य इन विद्याओं को सीखते रहना नहीं होना चाहिए बल्कि इन्हें सीखकर आगे बढ़ जाना होना चाहिए।


By Caravaggio 


    कुछ लोगों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या लिबरल आर्ट्स मनुष्य को अच्छा बनाती हैं। परन्तु स्वयं वे विद्याएँ भी ऐसा दावा नहीं करतीं  क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह नहीं है। साहित्य का अध्ययन भाषा की शुद्धता से संबंधित है। यदि उसे आगे बढ़ाया जाए तो वह कथाओं तथा आख्यानों के अध्ययन तक पहुँचता है। अधिक से अधिक वह कविता के अध्ययन तक विस्तृत होता है। किन्तु इनमें से कौन-सा विषय सद्गुण की ओर जाने वाला मार्ग प्रशस्त करता है? अक्षरों और वर्णों की पहचान, शब्दों और वाक्यांशों का सूक्ष्म विश्लेषण, कथाओं का कंठस्थ करना, छंद-रचना के नियम, या छंदों के परिवर्तन, इनमें से कौन-सी बात हमारे भय को शांत करती है, हमारे लोभ को दूर करती है या हमारी इच्छाओं पर संयम स्थापित करती है? अब ज्यामिति और संगीत की ओर चलो। वहाँ भी ऐसी कोई शिक्षा नहीं मिलती जो हमें भय और वासना से मुक्त होने का उपदेश दे। यदि हमें यह नहीं आता कि भय और इच्छा पर कैसे विजय प्राप्त की जाए तो अन्य किसी भी ज्ञान का होना व्यर्थ है। 

    प्रश्न यह है कि क्या ये लोग सद्गुण की शिक्षा देते हैं। यदि नहीं तो वे अपने विद्यार्थियों को सद्गुण नहीं सिखा रहे हैं। और यदि हाँ तो वे दार्शनिक हैं। क्या तुम जानना चाहते हो कि वे इस उद्देश्य से कितने दूर हैं? बस यह देखो कि उनकी सभी विद्याएँ एक-दूसरे से कितनी भिन्न हैं। यदि वे सभी एक ही सत्य की शिक्षा दे रही होतीं तो उनमें किसी न किसी प्रकार की समानता अवश्य दिखाई देती। 

    जब तक कि वे तुम्हें यह विश्वास न दिला दें कि होमर एक दार्शनिक था! किन्तु ऐसा करते हुए वे स्वयं अपने तर्कों का खंडन कर बैठते हैं। कभी वे उसे स्टोइक सिद्ध करते हैं, जो केवल सद्गुण को ही श्रेष्ठ मानता है और अमर जीवन प्राप्त करने के लिए भी सम्माननीय आचरण का त्याग नहीं करता, कभी वे उसे एपिक्यूरियन बताते हैं, जो गीत-संगीत और उत्सवों के बीच रहते हुए शांत नागरिक जीवन की प्रशंसा करता है, कभी वे उसे पेरिपैटेटिक कहते हैं, जो तीन प्रकार के शुभों का प्रतिपादन करता है और कभी उसे अकादमिक घोषित करते हैं, जो यह मानता है कि किसी भी विषय में पूर्ण निश्चितता संभव नहीं है। इससे तो केवल यही सिद्ध होता है कि इनमें से कोई भी दर्शन वास्तव में उसका नहीं है क्योंकि यदि वे सभी उसके होते तो वे एक-दूसरे के साथ असंगत न होते। किन्तु मान लो कि होमर वास्तव में एक दार्शनिक था। तब भी वह दार्शनिक तो अपनी कविताएँ सीखने या रचने से पहले ही बन चुका होगा। इसलिए हमें उन बातों का अध्ययन करना चाहिए जिन्होंने होमर को बुद्धिमान बनाया, न कि केवल उसकी कविताओं का। 

    मेरे लिए यह जाँच करना कि होमर पहले हुए या हेसिओड, उतना ही निरर्थक है जितना यह जानना कि हेकुबा समय से पहले वृद्ध कैसे हो गई, जबकि वास्तव में वह हेलेन से छोटी थी। मैं तुमसे पूछता हूँ, पैट्रोक्लस और अकिलीस की आयु में कौन बड़ा था और कौन छोटा, यह जानने का क्या महत्व है? क्या तुम यह जानना चाहते हो कि यूलिसीस (ओडीसियस) अपनी भटकनों के दौरान कहाँ-कहाँ गया था या यह सीखना चाहते हो कि हमें अपनी निरंतर भटकन से कैसे मुक्त होना चाहिए? हमारे पास यह सुनने का समय नहीं है कि वह इटली और सिसिली के बीच के समुद्र में तूफ़ान का शिकार हुआ था या ज्ञात संसार की सीमाओं से बाहर क्योंकि इतना लंबा समय वह इतने संकरे जलडमरूमध्य में भटक ही नहीं सकता था। सच्चाई यह है कि हम स्वयं अपने जीवन के प्रत्येक दिन मन के तूफ़ानों से घिरे रहते हैं, और हमारे अपने दुर्गुण हमें वही सब कष्ट देते हैं जिनका सामना यूलिसीस ने किया था। वे सब हमारे जीवन में उपस्थित हैं, ऐसा सौंदर्य जो आँखों को मोहित कर ले, शत्रु, मानव-रक्त के प्यासे भयंकर राक्षस, एक ओर सायरनों का मोहक गीत और दूसरी ओर जहाज़-डूबने तथा हर प्रकार के संकट। मुझे यह सिखाओ कि अपने देश से कैसे प्रेम करूँ, अपनी पत्नी से कैसे प्रेम करूँ, अपने पिता से कैसे प्रेम करूँ। मुझे यह सिखाओ कि यदि मार्ग में मेरा जहाज़ भी डूब जाए, तब भी मैं उस सम्मानपूर्ण लक्ष्य तक कैसे पहुँचूँ। तुम यह जानने का प्रयास क्यों करते हो कि पेनेलोपे पवित्र थी या नहीं? क्या उसने अपने आस-पास के सभी लोगों को धोखा दिया था? और क्या उसने यह पहचान लिया था कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति यूलिसीस ही है, उससे पहले कि किसी ने उसे यह बताया? मुझे यह सिखाओ कि पवित्रता क्या है, उसका वास्तविक मूल्य क्या है और वह शरीर में निवास करती है या मन में।

    अब मैं संगीत की ओर आता हूँ। तुम मुझे सिखाते हो कि ऊँचे और नीचे स्वरों में किस प्रकार सामंजस्य स्थापित होता है। भिन्न-भिन्न सुरों वाले तार किस प्रकार मधुर संगति उत्पन्न करते हैं। इसके स्थान पर मुझे यह सिखाओ कि मेरे अपने मन में सामंजस्य कैसे स्थापित हो और मेरे संकल्प एक-दूसरे के विरोधी न हों। तुम मुझे बताते हो कि कौन-से राग या संगीत-रूप विषाद व्यक्त करते हैं। इसके बजाय मुझे यह सिखाओ कि विपत्तियों के बीच भी मैं शोक से कैसे बचा रहूँ। 

    ज्यामिति का ज्ञाता मुझे यह सिखाता है कि किसी खेत का क्षेत्रफल कैसे निकाला जाए, किन्तु वह यह नहीं सिखाता कि मनुष्य के लिए कितनी संपत्ति पर्याप्त है। वह मुझे गणना करना सिखाता है और मेरी उँगलियों को लोभ की सेवा में लगा देता है। परन्तु वह यह नहीं सिखाता कि ऐसी गणनाएँ वास्तव में निरर्थक हैं और यह कि अपनी आय-व्यय का हिसाब रखने वालों को थका देने से कोई अधिक सुखी नहीं हो जाता। बल्कि सच्चाई तो यह है कि जो व्यक्ति अपनी संपत्ति का हिसाब स्वयं करने को ही दुर्भाग्य समझता है, उसके पास आवश्यकता से अधिक और अनावश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यदि मैं अपने भाई के साथ खेत का उचित बँटवारा करना ही नहीं जानता तो किसी भूमि का सही-सही विभाजन करना सीखने से मुझे क्या लाभ? यदि पड़ोसी मेरी भूमि की सीमा से थोड़ा-सा भाग काट ले जाने पर मैं व्याकुल हो उठता हूँ तो एक बगीचे के टुकड़े का क्षेत्रफल एक फुट के दसवें भाग तक की शुद्धता से निकालना मेरे किस काम का? वह मुझे सिखाता है कि अपनी भूमि की सीमा पर स्थित उस छोटे-से हिस्से को खोने से कैसे बचूँ। किन्तु मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि अपनी सारी संपत्ति खोकर भी प्रसन्नचित्त कैसे रहा जाए। “मुझसे वह भूमि छीनी जा रही है जो मेरे पिता और दादा की थी!” तो इससे क्या हुआ? तुम्हारे दादा से पहले उसका स्वामी कौन था? क्या तुम यह भी बता सकते हो कि वह किस जाति या राष्ट्र की थी, किसी व्यक्ति की तो बात ही छोड़ो? तुम उस भूमि पर स्वामी बनकर नहीं बल्कि एक अत्याचारी शासक की तरह अधिकार जमाकर बैठे हो। 

    तुम किसके किरायेदार हो? यदि तुम्हारा सौभाग्य है तो उसी व्यक्ति के किरायेदार हो जो तुम्हारे बाद उसका उत्तराधिकारी बनेगा। विधिवेत्ता कहते हैं कि सार्वजनिक भूमि पर कोई भी व्यक्ति स्थायी स्वामित्व स्थापित नहीं कर सकता। जिस भूमि पर तुम रहते हो और जिसे अपनी कहते हो, वह वास्तव में सार्वजनिक है बल्कि उससे भी बढ़कर, वह समस्त मानव-जाति की है। क्या अद्भुत कौशल है! तुम वक्र आकृतियों का माप जानते हो। तुम्हें जो भी आकृति दी जाए, उसे वर्ग में परिवर्तित कर सकते हो। तुम तारों के बीच की दूरी बता सकते हो। वास्तव में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे तुम माप न सको। यदि तुम इतने ही कुशल मापक हो तो मनुष्य के मन को मापो। बताओ कि वह कितना महान है और कितना तुच्छ भी हो सकता है। तुम जानते हो कि कौन-सी रेखा समकोण बनाती है। किन्तु यदि तुम्हें यह नहीं मालूम कि जीवन में क्या सही है, तो उस ज्ञान का तुम्हारे लिए क्या उपयोग है?

    अब मैं उस विद्या की ओर आता हूँ जो स्वयं को आकाश और नक्षत्रों के ज्ञान पर गर्व करती है—

जहाँ शीतल ज्योति वाला शनि अपना मार्ग बनाता है,
और चंचल बुध का अग्निमय तारा किन-किन कक्षाओं में विचरण करता है।

    इन बातों को जानकर मुझे क्या लाभ होगा? क्या केवल इसलिए कि जब शनि और मंगल आमने-सामने हों या जब बुध संध्या समय शनि की दृष्टि में अस्त हो, तब मैं चिंता करता रहूँ? इसके बजाय मुझे यह सीखना चाहिए कि ग्रह जहाँ कहीं भी हों, वे मेरे लिए अनुकूल ही हैं और उन्हें बदला नहीं जा सकता। उनकी गतियाँ भाग्य के निरंतर और अटल विधान द्वारा निर्धारित हैं। वे निश्चित मार्गों पर चलते हैं और या तो संसार की सभी घटनाओं का निर्धारण करते हैं अथवा उनका संकेत देते हैं। किन्तु यदि वे सब कुछ घटित कराते हैं तो ऐसी बातों को जानने से क्या लाभ जिन्हें बदला ही नहीं जा सकता? और यदि वे केवल भविष्य की घटनाओं का संकेत देते हैं तो उन बातों को पहले से जान लेने का क्या लाभ जिनसे बचा ही नहीं जा सकता? वे घटनाएँ तो तुम्हें पता हों या न हों, घटित होकर ही रहेंगी।

यदि तुम सूर्य की तीव्र गति पर और उसके पीछे क्रम से चलने वाले तारों पर दृष्टि रखो,
तो आने वाला कल तुम्हें कभी अचानक नहीं चौंकाएगा,
और निर्मल रात्रि भी तुम्हें किसी छिपे हुए आक्रमण से भयभीत नहीं करेगी।

किन्तु जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैंने ऐसे किसी भी आकस्मिक आघात से बचने के लिए पहले ही पर्याप्त तैयारी कर रखी है। 

    “क्या सचमुच यह सत्य है कि आने वाला कल मुझे कभी आश्चर्यचकित नहीं करेगा? जो घटना किसी व्यक्ति के ज्ञान के बिना घटती है, क्या वह उसे आश्चर्यचकित नहीं करती?” मैं यह नहीं जानता कि कल क्या होगा। किन्तु मैं यह अवश्य जानता हूँ कि क्या-क्या हो सकता है। ऐसी किसी भी संभावना को मैं अपनी अपेक्षा से बाहर नहीं रखता। मैं हर संभावित घटना की अपेक्षा करता हूँ और यदि उनमें से किसी से मेरा बचाव हो जाए, तो मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ। आने वाला कल मुझे तभी चकित करता है जब वह मुझे किसी विपत्ति से बचा लेता है। परन्तु तब भी वह मुझे वास्तव में आश्चर्यचकित नहीं करता क्योंकि जिस प्रकार मैं जानता हूँ कि ऐसी कोई भी घटना नहीं है जो मेरे साथ घटित न हो सके, उसी प्रकार मैं यह भी जानता हूँ कि उनमें से कोई भी घटना निश्चित रूप से घटित होगी, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए मैं सर्वोत्तम की आशा करता हूँ, किन्तु सबसे बुरे के लिए भी स्वयं को तैयार रखता हूँ। 

    यदि मैं नियमित क्रम का पालन न करूँ तो इसे सहन करना। मैं चित्रकारों को उदार कलाओं के साधकों में नहीं गिन सकता। उसी प्रकार मूर्तिकारों, संगमरमर तराशने वालों और विलासिता की सेवा करने वाले अन्य सभी कारीगरों को भी नहीं। इसी प्रकार मैं पहलवानों तथा उन सभी विद्याओं को भी अस्वीकार करता हूँ जिनका संबंध केवल तेल और धूल-मिट्टी से है। अन्यथा मुझे मालिश करने वालों, रसोइयों और उन सभी लोगों को भी उदार कलाओं में गिनना पड़ेगा जो अपनी कला को केवल हमारे भोग-विलास की पूर्ति में लगाते हैं। ज़रा बताओ तो सही, उन भूखे-से दिखने वाले लोगों की कला को कैसे उदार कला कहा जा सकता है, जो शरीर को तो भोजन की नाँद के सामने पालते-पोसते हैं। जबकि उनका मन पोषण के अभाव में दुर्बल होता जाता है? क्या हमें आज के युवकों की इस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए कि यही उदार शिक्षा है? हमारे पूर्वज अपने युवकों को सीधा और दृढ़ खड़ा होना सिखाते थे, भाला फेंकना, बरछी चलाना, घुड़सवारी करना तथा तलवार और ढाल का उपयोग करना सिखाते थे। वे अपने बच्चों को ऐसी कोई शिक्षा नहीं देते थे जिसे लेटकर सीखा जाए। किन्तु न तो ये प्राचीन कलाएँ और न ही आज की नई कलाएँ सद्गुण की शिक्षा देती हैं या उसका विकास करती हैं। क्योंकि घोड़े को नियंत्रित करना, लगाम से उसकी चाल को रोकना और दिशा देना सीख लेने से क्या लाभ, यदि स्वयं सवार ही अपनी अनियंत्रित और बेलगाम वासनाओं के वश में हो? कुश्ती या मुक्केबाज़ी में अनेक प्रतिद्वंद्वियों को परास्त कर लेने से क्या लाभ, यदि विजेता स्वयं अपने क्रोध का पराजित बंदी बना हुआ हो?

    “तो क्या उदार विद्याओं का हमें कोई लाभ ही नहीं है?” है, पर केवल कुछ सीमित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए। सद्गुण की प्राप्ति के लिए नहीं। क्योंकि वे कलाएँ भी, जो अपने निम्न स्तर को खुले रूप में स्वीकार करती हैं और जिनका आधार हाथ का कौशल है, जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। फिर भी उनका सद्गुण से कोई संबंध नहीं है। “तो फिर हम अपने बच्चों को उदार विद्याओं की शिक्षा क्यों देते हैं?” इसलिए नहीं कि वे उन्हें सद्गुण सिखा सकती हैं बल्कि इसलिए कि वे उनके मन को सद्गुण ग्रहण करने योग्य बनाती हैं। जैसे प्रारंभिक शिक्षा, जिसे पहले ‘अक्षर-ज्ञान’ कहा जाता था, बच्चों को शिक्षा की मूल बातें सिखाती है। पर स्वयं उदार विद्याओं की शिक्षा नहीं देती। वह केवल उनके लिए आधार तैयार करती है। उसी प्रकार उदार विद्याएँ भी मन को सीधे सद्गुण तक नहीं पहुँचातीं बल्कि उस यात्रा के लिए उसे तैयार करती हैं। 

    पॉसिडोनियस के अनुसार कलाएँ चार प्रकार की होती हैं— साधारण और निम्न कलाएँ, मनोरंजन की कलाएँ, बाल्यावस्था की कलाएँ और उदार कलाएँ। साधारण कलाएँ वे हैं जिनका अभ्यास कारीगर करते हैं। उनका आधार हाथ का कौशल है और उनका उद्देश्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। इनमें न तो कोई विशेष आकर्षण है और न ही सम्माननीयता का कोई आभास। मनोरंजन की कलाएँ वे हैं जिनका संबंध आँखों और कानों के सुख से है। इनमें उन अभियंताओं की कला भी आती है जो रंगमंच पर ऐसे यंत्र बनाते हैं जिनसे मंच बिना किसी सहारे के ऊपर उठता हुआ दिखाई देता है या मंच के भाग बिना किसी आवाज़ के आकाश की ओर उठ जाते हैं। इसी प्रकार वे अनेक विचित्र युक्तियाँ बनाते हैं, जहाँ समतल भूमि थी वहाँ अचानक दरारें खुल जाती हैं, फिर अपने-आप बंद हो जाती हैं या ऊँचे उठे हुए मंच धीरे-धीरे नीचे आ जाते हैं। जो लोग इन युक्तियों से परिचित नहीं होते, उनकी आँखों को ये सब अत्यंत अद्भुत लगते हैं। वे प्रत्येक अप्रत्याशित दृश्य पर आश्चर्य करते हैं क्योंकि वे उसके कारण को नहीं जानते। बाल्यावस्था की कलाएँ उदार विद्याओं से कुछ समानता रखती हैं। यूनानी इन्हें ‘एन्साइक्लिकल’ (encyclical) कहते हैं। हमारी भाषा में इन्हें ‘उदार विद्याएँ’ कहा जाता है। किन्तु वास्तव में केवल वही विद्याएँ उदार हैं और सच कहूँ तो केवल वही वास्तव में स्वतंत्र मनुष्य के योग्य हैं जिनका संबंध सद्गुण से है। 

    कोई इस प्रकार आपत्ति कर सकता है। “दर्शन के कई विभाग हैं। एक प्राकृतिक जगत का अध्ययन है, दूसरा नीतिशास्त्र और तीसरा तर्कशास्त्र। उसी प्रकार उदार विद्याएँ भी दर्शन के भीतर अपना स्थान चाहती हैं। जब हम प्रकृति से संबंधित प्रश्नों की जाँच करते हैं, तब हम ज्यामिति के प्रमाणों का सहारा लेते हैं। इसलिए, यदि ज्यामिति दर्शन की सहायता करती है तो वह दर्शन का एक भाग भी होनी चाहिए।” किन्तु अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो हमारी सहायता तो करती हैं पर हमारा अंग नहीं होतीं। बल्कि यदि वे स्वयं हमारा अंग होतीं तो वे हमारी सहायता करने वाली वस्तुएँ न कहलातीं। भोजन शरीर की सहायता करता है, फिर भी वह शरीर का अंग नहीं है। उसी प्रकार ज्यामिति दर्शन के लिए उपयोगी है जैसे, ज्यामिति के लिए उपकरण बनाने वाला कारीगर आवश्यक होता है। परंतु जैसे वह कारीगर स्वयं ज्यामिति का भाग नहीं है, वैसे ही ज्यामिति भी दर्शन का भाग नहीं है। इसके अतिरिक्त, दोनों का अपना-अपना निश्चित विषय है। दार्शनिक प्राकृतिक घटनाओं की जाँच करता है और उनका ज्ञान प्राप्त करता है। जबकि ज्यामितिज्ञ आकृतियों और मापों का अध्ययन करता है तथा उनके आधार पर गणनाएँ करता है। आकाशीय पिंडों की गति का कारण, उनका प्रभाव और उनका स्वभाव—ये सब दार्शनिक के अध्ययन के विषय हैं। किन्तु उनकी कक्षाएँ, उपवृत्त (एपिसाइकिल), और वे प्रत्यक्ष गतियाँ जिनमें वे कभी ऊपर उठते, कभी नीचे आते या कभी स्थिर प्रतीत होते हैं। जबकि वास्तव में कोई भी आकाशीय पिंड स्थिर नहीं रहता, ये सब गणितीय खगोलशास्त्री के विषय हैं। दार्शनिक यह जानता है कि दर्पण में प्रतिबिंब क्यों दिखाई देता है। जबकि ज्यामितिज्ञ तुम्हें बता सकता है कि वस्तु अपने प्रतिबिंब से कितनी दूरी पर होनी चाहिए और किस प्रकार का दर्पण किस प्रकार का प्रतिबिंब उत्पन्न करता है। दार्शनिक यह सिद्ध करेगा कि सूर्य विशाल है। जबकि खगोलशास्त्री अनुभव और निरीक्षण के आधार पर यह ज्ञात करेगा कि वह वास्तव में कितना बड़ा है। परंतु इस प्रकार निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए उसे कुछ मूल सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। कोई भी विद्या अपने बल पर पूर्ण नहीं हो सकती यदि उसके मूल सिद्धांत किसी दूसरी विद्या से प्राप्त होते हों। दर्शन किसी अन्य विद्या से कुछ नहीं माँगता। वह अपनी पूरी इमारत की नींव स्वयं रखता है। गणितीय खगोलशास्त्र मानो उस इमारत की ऊपरी मंज़िल है, जो किसी दूसरी नींव पर खड़ी की गई है। वह अपने मूल सिद्धांत कहीं और से ग्रहण करता है और उन्हीं के सहारे आगे बढ़ता है। यदि वह अपने बल पर सत्य तक पहुँच सकता, यदि वह स्वयं सम्पूर्ण विश्व-प्रकृति को समझ पाने में समर्थ होता, तो मैं स्वीकार कर लेता कि उसके पास हमें देने के लिए बहुत कुछ है। क्योंकि आकाशीय घटनाओं का अध्ययन करते हुए हमारा मन भी अधिक व्यापक और अधिक ऊँचा बनता है। 

    मनुष्य का मन अपनी पूर्ण ऊँचाई केवल एक ही मार्ग से प्राप्त करता है जब उसे इस बात का अटल ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में क्या शुभ है और क्या अशुभ। और इस विषय में किसी अन्य विद्या के पास सिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। अब आओ, हम एक-एक करके सद्गुणों का विचार करें। साहस वह सद्गुण है जो भय उत्पन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु का तिरस्कार करता है। जो कुछ भी हमें भयभीत करता है और हमारी स्वतंत्रता को दासता के जुए के नीचे झुका देता है, उसका साहस तिरस्कार करता है, उसका सामना करता है और उस पर विजय प्राप्त करता है। क्या उदार विद्याएँ इस साहस को दृढ़ बनाने में कोई सहायता करती हैं? निष्ठा मनुष्य के हृदय का सबसे पवित्र गुण है। कोई भी कष्ट उसे छल करने के लिए विवश नहीं कर सकता और कोई भी पुरस्कार उसे विश्वासघात के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। निष्ठा कहती है, “मुझे जला दो, मेरे अंग काट दो, मुझे मार डालो, फिर भी मैं अपने विश्वास के साथ विश्वासघात नहीं करूँगी। जितना अधिक पीड़ा मुझसे मेरे रहस्य उगलवाने का प्रयास करेगी, उतना ही अधिक मैं उन्हें अपने भीतर छिपाकर रखूँगी।” क्या उदार विद्याएँ ऐसा चरित्र गढ़ सकती हैं? आत्मसंयम हमारी इच्छाओं और भोगों पर शासन करता है। कुछ इच्छाओं का वह तिरस्कार करके उन्हें पूरी तरह त्याग देता है और कुछ को सीमित कर स्वस्थ मर्यादा के भीतर रखता है। वह कभी भी सुखों को केवल उनके अपने लिए नहीं चाहता क्योंकि वह जानता है कि इच्छाओं की सबसे उत्तम सीमा यही है कि जितनी आवश्यकता हो उतना ही ग्रहण किया जाए, न कि जितनी इच्छा हो उतना। सद्भाव या दयालुता मनुष्य को अपने साथियों के प्रति घमंडी या दोष-दृष्टि रखने वाला बनने से रोकती है। वह वाणी, व्यवहार और भावना, तीनों में सबके प्रति कोमल और सहज रहती है। वह दूसरों के प्रत्येक दुःख को अपना दुःख समझती है और प्रत्येक शुभ अवसर का स्वागत मुख्यतः इसलिए करती है कि उसका लाभ दूसरों के साथ बाँट सके। क्या उदार विद्याएँ ऐसा आचरण सिखाती हैं? नहीं। वे हमें ईमानदारी, आत्मसंयम, मर्यादा, सादगी और मितव्ययिता भी नहीं सिखातीं। उसी प्रकार वे हमें क्षमा और करुणा भी नहीं सिखातीं। वह करुणा जो दूसरे के रक्त के प्रति उतनी ही सावधान रहती है जितनी अपने रक्त के प्रति क्योंकि वह जानती है कि किसी भी मनुष्य को कभी भी दूसरे मनुष्य के जीवन का मूल्य नहीं भूलना चाहिए।

    “तुम लोग कहते हो कि उदार विद्याओं के बिना सद्गुण की प्राप्ति नहीं हो सकती। फिर तुम यह कैसे कहते हो कि उनका सद्गुण में कोई योगदान नहीं है?” इसका उत्तर यह है, जिस प्रकार भोजन के बिना भी सद्गुण की प्राप्ति नहीं हो सकती, फिर भी भोजन का सद्गुण से कोई संबंध नहीं है। उसी प्रकार लकड़ी जहाज़ के निर्माण में कोई योगदान नहीं देती, यद्यपि जहाज़ लकड़ी के बिना बनाया नहीं जा सकता। मेरा आशय यह है कि केवल इसलिए यह नहीं मान लेना चाहिए कि एक वस्तु दूसरी में योगदान देती है क्योंकि दूसरी वस्तु उसके बिना अस्तित्व में नहीं आ सकती। इसके अतिरिक्त, यह भी कहा जा सकता है कि वास्तव में उदार विद्याओं के बिना भी बुद्धिमत्ता प्राप्त की जा सकती है। क्योंकि यद्यपि सद्गुण को सीखना आवश्यक है, पर उसे इन विद्याओं के माध्यम से नहीं सीखा जाता। मेरे पास यह मानने का क्या कारण है कि जो व्यक्ति अक्षर-ज्ञान से वंचित है, वह बुद्धिमान नहीं बन सकता? बुद्धिमत्ता अक्षरों में नहीं रहती। अक्षर केवल तथ्य सिखाते हैं, शब्द नहीं और संभव है कि जब स्मृति को अपने अतिरिक्त किसी दूसरे सहारे पर निर्भर न रहना पड़े, तब वह और भी अधिक दृढ़ हो जाती है। 

    बुद्धिमत्ता विशाल और व्यापक होती है। उसे पर्याप्त स्थान चाहिए। मनुष्य को मानव-संबंधी और दैवी विषयों का अध्ययन करना चाहिए। भूतकाल और भविष्य का, नश्वर और शाश्वत का भी। समय के विषय में भी उसे विचार करना चाहिए और देखो, केवल इसी एक विषय पर कितने प्रश्न उठते हैं! पहला, क्या समय स्वयं में कोई स्वतंत्र सत्ता है? दूसरा, क्या समय से पहले भी कुछ था, क्या कोई ऐसी सत्ता है जो समय से परे है? क्या समय का आरंभ संसार के साथ ही हुआ या चूँकि संसार से पहले भी कुछ अस्तित्व में था, इसलिए समय भी तब से विद्यमान था? केवल आत्मा के विषय में ही असंख्य प्रश्न पूछे जा सकते हैं। वह कहाँ से आती है? उसका स्वरूप क्या है? उसका अस्तित्व कब प्रारंभ होता है। वह कितने समय तक रहती है? क्या वह एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती रहती है, एक जीवित प्राणी से दूसरे में अपना निवास बदलती रहती है? या क्या वह केवल एक बार ही इस देह-बंधन को सहती है और मुक्त होकर समस्त ब्रह्मांड में विचरण करती है? क्या वह साकार है या निराकार? जब वह हमारे माध्यम से कार्य करना बंद कर देती है, तब वह क्या करती है? इस कारागार से मुक्त होने के बाद वह अपनी स्वतंत्रता का उपयोग किस प्रकार करती है? या क्या वह अपने पूर्व जीवन को भूल जाती है और शरीर से अलग होकर उच्च लोकों में पहुँचते ही पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप को जानती है? मानव और दैवी विषयों में से तुम किसी भी एक को चुन लो, तुम्हें इतने अधिक प्रश्न मिलेंगे कि उनके अध्ययन और विचार में पूरा जीवन लग सकता है। जब हमारे मन को व्यस्त रखने के लिए इतने महान विषय उपस्थित हैं, तब हमें उनके लिए स्थान बनाना चाहिए और उन सब बातों को निकाल देना चाहिए जो अनावश्यक हैं। सद्गुण इतने संकुचित स्थान में निवास नहीं करता। इतना महान अतिथि विस्तृत स्थान चाहता है। इसलिए सब अनावश्यक बातों को हृदय से बाहर कर दो और अपने पूरे हृदय को सद्गुण के लिए खुला रहने दो। 

    “फिर भी अनेक प्रकार की विद्याओं का ज्ञान होना आनंददायक है।” यदि ऐसा है तो हमें उनमें से केवल उतना ही रखना चाहिए जितनी वास्तव में आवश्यकता हो। या क्या तुम्हें यह उचित लगता है कि जो व्यक्ति अपने घर के लिए अनुपयोगी सामान खरीदता है और महँगी वस्तुओं का प्रदर्शन करता है, उसकी तो आलोचना की जाए, पर जो व्यक्ति अनावश्यक साहित्यिक ज्ञान का विशाल भंडार इकट्ठा करने में लगा रहता है, उसकी नहीं? आवश्यकता से अधिक जानने की इच्छा भी असंयम का ही एक रूप है। वास्तव में उदार विद्याओं का ऐसा अध्ययन मनुष्यों को अप्रिय, वाचाल, आडंबरपूर्ण और आत्मसंतुष्ट बना देता है। क्योंकि वे उन बातों को सीखते रहते हैं जिन्हें जानने की उन्हें आवश्यकता नहीं होती, और परिणामस्वरूप वे उन बातों को सीख ही नहीं पाते जिन्हें वास्तव में जानना चाहिए। साहित्य के विद्वान डिडिमस ने चार हज़ार ग्रंथ लिखे थे। यदि उसने केवल उतनी ही निरर्थक पुस्तकों का अध्ययन किया होता तो भी मुझे उस पर दया आती। कुछ ग्रंथों में वह यह खोजता है कि होमर का जन्मस्थान कहाँ था। कुछ में यह कि ऐनियस की वास्तविक माता कौन थी। कुछ में यह कि अनाक्रेयोन अधिक कामुक था या अधिक मद्यपान का अभ्यासी। कुछ में यह कि क्या सैफो वास्तव में वेश्या थी और ऐसे ही अनेक अन्य विषयों पर भी उसने लिखा। यदि तुम्हें ऐसे प्रश्नों के उत्तर मालूम भी हों तो तुम्हें उन्हें भूलने का प्रयत्न करना चाहिए। फिर भी तुम कहते हो कि जीवन बहुत छोटा है! किन्तु हमारे अपने देशवासियों में भी ऐसी अनेक अतिशयताएँ हैं जिन्हें कुल्हाड़ी से काटकर हटाने की आवश्यकता है। कितना समय नष्ट करके और दूसरों के कानों को कितना कष्ट पहुँचाकर हम केवल यह प्रशंसा सुनने के लिए प्रयत्न करते हैं—“क्या विद्वान व्यक्ति है!” इससे कहीं अच्छा है कि हम एक कम आडंबरपूर्ण उपाधि से ही संतुष्ट रहें—“क्या अच्छा मनुष्य है!”

    तो क्या मुझे सभी राष्ट्रों के इतिहास खँगालने चाहिए ताकि यह पता लगा सकूँ कि कविता सबसे पहले किसने लिखी? क्या मुझे यह गणना करनी चाहिए कि ऑर्फ़ियस और होमर के बीच कितने वर्ष बीते। जबकि इस संबंध में कोई लिखित प्रमाण ही उपलब्ध नहीं हैं? क्या मुझे उन संपादकीय चिह्नों का अध्ययन करना चाहिए जिनसे अरिस्टार्कस ने दूसरे कवियों की रचनाओं पर अपनी टिप्पणियाँ अंकित की थीं और अपना जीवन मात्र अक्षरों और मात्राओं के विश्लेषण में बिता देना चाहिए? क्या मुझे ज्यामिति की धूल में ही उलझे रहना चाहिए? क्या मैं वह हितकारी उपदेश भूल गया हूँ, “अपने समय का सदुपयोग करो”? यदि मैं इन सब बातों को सीखने में लगा रहूँ तो फिर किन बातों को छोड़ दूँ? गायस सीज़र के शासनकाल में एपियोन नामक एक साहित्य-विद्वान यूनान की यात्रा पर गया। वहाँ के नगरों ने उसे होमर के नाम पर अपना नागरिक बना लिया। वह कहा करता था कि होमर ने ओडिसी और इलियड की रचना पूरी करने के बाद अपनी कृति के आरंभ में एक प्रस्तावना भी जोड़ दी थी, जिसमें पूरे ट्रॉय-युद्ध का सार समाहित था। इसके प्रमाण के रूप में वह यह तर्क देता था कि इलियड की पहली पंक्ति के पहले दो अक्षर जान-बूझकर इस उद्देश्य से रखे गए थे कि वे उस कृति के खंडों (पुस्तकों) की संख्या का संकेत दें। यही वे बातें हैं जिन्हें तथाकथित बहुश्रुत विद्वान के लिए जानना आवश्यक माना जाता है! ज़रा सोचो, तुम्हारे जीवन का कितना समय रोगों में बीत जाता है। कितना सार्वजनिक और निजी कार्यों में। कितना दैनिक आवश्यकताओं में और कितना नींद में। अपने जीवन का ठीक-ठीक हिसाब लगाओ। उसमें इतनी सारी निरर्थक बातों के लिए स्थान ही नहीं है। 

    मैं अब तक उदार विद्याओं की चर्चा कर रहा था। किन्तु दार्शनिकों के पास भी समय नष्ट करने के अपने तरीके हैं और उनके भी अपने निरर्थक विषय हैं। वे भी अक्षरों की मात्राएँ गिनने, तथा अव्ययों और संबंधबोधक शब्दों के सही अर्थ निर्धारित करने में लग जाते हैं। साहित्य-विदों और ज्यामितिज्ञों से ईर्ष्या करके उन्होंने उनकी सारी अनावश्यक सूक्ष्मताओं को अपना लिया है। परिणाम यह हुआ कि वे सही ढंग से बोलने की कला तो अधिक जानते हैं। पर सही ढंग से जीना नहीं। मैं तुम्हें बताता हूँ कि ऐसी अतिसूक्ष्म तर्कबाज़ी कितनी हानिकारक हो सकती है और वह सत्य से कितनी दूर ले जाती है। प्रोटागोरस का दावा था कि वह किसी भी प्रश्न के दोनों पक्षों का समान शक्ति से समर्थन कर सकता है, यहाँ तक कि इस प्रश्न का भी कि क्या वास्तव में हर प्रश्न के दोनों पक्षों का समर्थन किया जा सकता है। नाउसिफ़ानेस का कहना था कि जो वस्तुएँ हमें वास्तविक प्रतीत होती हैं, वे वास्तव में अवास्तविक वस्तुओं से अधिक वास्तविक नहीं हैं। पार्मेनिदेस का मत था कि जो कुछ हमें अनेक और भिन्न-भिन्न दिखाई देता है, वह वास्तव में उस एकमात्र सत्ता से अलग नहीं है। एलेआ के ज़ेनो ने तो पूरा विवाद ही समाप्त कर दिया। उसका कहना था कि वास्तव में कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। पाइर्रोनवादी, मेगारावादी, एरेट्रियावादी और अकादमिक, ये सब भी कमोबेश इसी दिशा में चले गए। उन्होंने एक ऐसी नई प्रकार की विद्या प्रस्तुत की, जो यह दावा करती है कि वह कुछ भी नहीं जानती। इन सबको भी लिबरल आर्ट्स की उसी निरर्थक भीड़ में डाल दो। पहली श्रेणी के लोग मुझे कोई उपयोगी ज्ञान नहीं देते। दूसरी श्रेणी तो मुझसे ज्ञान प्राप्त करने की आशा भी छीन लेती है। निरर्थक बातें सीख लेना, कुछ भी न सीखने से फिर भी बेहतर है। एक वर्ग मेरे सामने सत्य का मार्ग दिखाने के लिए कोई दीपक नहीं जलाता। दूसरा तो मेरी आँखें ही निकाल देता है। 

    यदि मैं प्रोटागोरस पर विश्वास करूँ तो संसार में कोई भी बात निश्चित नहीं रह जाती। सब कुछ विवादास्पद हो जाता है। यदि मैं नाउसिफ़ानेस पर विश्वास करूँ, तो केवल एक बात निश्चित है कि कुछ भी निश्चित नहीं है। यदि मैं पार्मेनिदेस पर विश्वास करूँ तो उस एकमात्र सत्ता के अतिरिक्त कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। और यदि मैं ज़ेनो पर विश्वास करूँ तो वह एकमात्र सत्ता भी नहीं है। तो फिर हम क्या हैं? और ये सब वस्तुएँ क्या हैं जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं, हमारा पालन-पोषण करती हैं और हमें जीवित रखती हैं? क्या यह समूचा संसार केवल एक छाया है या तो पूर्णतः शून्य या फिर छल से भरी हुई? मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि मुझे किस पर अधिक क्रोध आता है, उन पर, जिन्होंने चाहा कि हम कुछ भी न जानें या उन पर, जिन्होंने हमसे इतना भी छीन लिया कि हम यह भी न जान सकें कि हम कुछ नहीं जानते।


अभी के लिए विराम 

Sunday, 26 July 2026

कम संसाधनों पर आधारित जीवन के बारे में -- पत्र - 85 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


जहाज़ पर सवार होने से पहले ही मैं एक प्रकार से जहाज़-डूबा हुआ नाविक था। यह कैसे हुआ, इसका उल्लेख मैं नहीं करूँगा, कहीं ऐसा न हो कि तुम उसे स्टोइक दर्शन के विरोधाभासों में से एक समझ बैठो। उनमें से कोई भी असत्य नहीं है और न ही उनमें से कोई उतना विचित्र है जितना पहली दृष्टि में प्रतीत होता है। जब भी तुम चाहोगे, मैं यह तुम्हें सिद्ध कर दूँगा बल्कि यदि तुम न भी चाहो, तब भी। फिलहाल, इस यात्रा ने मुझे यह सिखाया है कि हमारी कितनी ही वस्तुएँ वास्तव में अनावश्यक होती हैं। हम उन्हें कितनी आसानी से स्वेच्छा से त्याग सकते हैं। क्योंकि जब आवश्यकता हमें उनसे वंचित कर देती है, तब उनके अभाव का हमें विशेष दुःख नहीं होता।



    मैक्सिमस और मैं केवल कुछ दासों के साथ जितनों के लिए एक साधारण गाड़ी में स्थान हो सकता है और उतने ही सामान के साथ, जितना हम अपने शरीर पर धारण किए हुए हैं, पिछले दो दिनों से अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक रह रहे हैं। मेरा बिछौना भूमि पर बिछा है और मैं उसी पर लेटता हूँ। मेरे पास केवल दो चोगे हैं।एक बिछौने को ढकने के लिए और दूसरा स्वयं को ढकने के लिए। हमारे दोपहर के भोजन में कोई अतिरिक्त व्यंजन नहीं था और उसे तैयार होने में एक घंटे से भी कम समय लगा। सूखे अंजीर मैं हर जगह अपने साथ रखता हूँ और अपनी लेखन-पट्टिकाएँ भी। यदि रोटी मिल जाती है तो अंजीर उसके साथ खाने का व्यंजन बन जाते हैं और यदि रोटी नहीं होती तो वही अंजीर मेरी रोटी बन जाते हैं। वे मेरे लिए प्रत्येक दिन को नए वर्ष का आरम्भ बना देते हैं। मैं भी उत्तम विचारों तथा महान आत्मबल के सहारे उसे सचमुच एक सुखद नया वर्ष बना लेता हूँ। क्योंकि मनुष्य की आत्मा उससे अधिक महान कभी नहीं होती, जितनी तब होती है जब वह उन सभी वस्तुओं का त्याग कर देती है जो वास्तव में उसकी अपनी नहीं हैं। किसी भी वस्तु से भय न रखकर वह शांति प्राप्त करती है और किसी भी वस्तु की इच्छा न करके वह सच्ची समृद्धि प्राप्त करती है।

    जिस गाड़ी में मैं यात्रा कर रहा हूँ, वह केवल एक साधारण देहाती बैलगाड़ी जैसी है। उसे खींचने वाले खच्चरों में जीवित होने का एकमात्र प्रमाण यही है कि वे चल रहे हैं। गाड़ीवान ने अपने जूते उतार रखे हैं और वह भी गर्मी के कारण नहीं। मुझे अपने-आप को यह समझाने में कठिनाई होती है कि कोई मुझे ऐसी गाड़ी में देखे। यह मेरे स्वभाव की एक विचित्र कमजोरी है कि सही काम करते हुए भी मुझे अब तक लज्जा आती है। जब भी रास्ते में किसी की अधिक भव्य सवारी दिखाई देती है तो अनचाहे ही मेरा चेहरा लज्जा से लाल हो जाता है। यही इस बात का प्रमाण है कि जिन आदतों को मैं सही मानता हूँ और जिनकी प्रशंसा करता हूँ, वे अभी मेरे भीतर पूरी तरह दृढ़ नहीं हुई हैं। जो व्यक्ति साधारण गाड़ी में बैठने पर लज्जित होता है, वही किसी महँगी और शानदार सवारी का स्वामी बनकर उसका घमंड भी करेगा। अब तक मैंने केवल थोड़ी-सी ही प्रगति की है। मैं अभी अपनी सादगी को खुले रूप में अपनाने का साहस नहीं जुटा पाया हूँ। मैं अब भी राह चलते लोगों की राय की परवाह करता हूँ जबकि मुझे तो पूरी मानव-जाति की राय के विरुद्ध निर्भीक होकर यह कहना चाहिए—

“तुम लोग पागल हो। तुम भ्रम में हो। तुम अनावश्यक वस्तुओं पर मुग्ध हो जाते हो और किसी मनुष्य का मूल्यांकन उसकी वास्तविक संपत्ति से नहीं करते। जब किसी को ऋण देना होता है या कोई उपकार करना होता है क्योंकि उपकार भी तुम एक प्रकार का खर्च ही मानते हो तब तुम उसकी आर्थिक स्थिति का ध्यानपूर्वक हिसाब लगाते हो।

‘इस व्यक्ति के पास बहुत संपत्ति है लेकिन उस पर भारी कर्ज भी है।’

‘इसका घर बहुत सुंदर है पर उसने उसे खरीदने के लिए उधार लिया है।’

‘इससे अधिक शानदार सेवकों का दल किसी के पास नहीं है लेकिन यह अपने ऋण नहीं चुकाता।’

‘यदि यह अपने सभी लेनदारों का भुगतान कर दे तो इसके पास कुछ भी नहीं बचेगा।’

इसी प्रकार तुम्हें हर व्यक्ति के विषय में भी विचार करना चाहिए। यह जानने का प्रयास करो कि उसके पास वास्तव में ऐसा क्या है जो सचमुच उसका अपना है।

क्या तुम किसी मनुष्य को केवल इसलिए धनी समझते हो कि वह घर से बाहर भी सोने की थालियों और प्यालों में भोजन करता है, कि हर प्रांत में उसकी एक-एक जागीर है, कि उसकी हिसाब-किताब की पुस्तकें इतनी अधिक हैं कि वे एक मोटे ग्रंथ का रूप ले लें, कि नगर के बाहर उसकी इतनी विशाल भूमि है कि यदि वह विरल जनसंख्या वाले अपूलिया में भी होती, तब भी लोगों को उससे ईर्ष्या होती?

फिर भी वह मनुष्य निर्धन है। क्यों? क्योंकि वह ऋणग्रस्त है।

तुम पूछोगे, “उस पर कितना ऋण है?”

सब कुछ!

या क्या तुम यह समझते हो कि अपनी सारी संपत्ति भाग्य की देन होने के कारण उस पर निर्भर होना, किसी मनुष्य का ऋणी होने से किसी प्रकार भिन्न है? क्या इससे कोई अंतर पड़ता है कि उसके खच्चर खूब हृष्ट-पुष्ट हैं और सब एक ही रंग के हैं? क्या उसकी अलंकृत और भव्य गाड़ी का कोई वास्तविक महत्व है?

तीव्र गति वाले घोड़े, बहुमूल्य जरीदार आवरणों से सुसज्जित हैं,
उनकी मार्टिंगेलें (घोड़े की लगाम का एक हिस्सा) सोने से जड़ी हुई हैं,
और उनके मुख में लगी लगामों के बिट भी शुद्ध स्वर्ण के बने हुए हैं।

ऐसी वस्तुएँ न तो उनके स्वामी को बेहतर बनाती हैं और न ही खच्चर को। कैटो द सेंसर, जिसका जीवन राज्य के लिए उतना ही लाभदायक था जितना सिपियो का क्योंकि एक ने हमारे शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध किया था और दूसरे ने हमारे दुर्गुणों के विरुद्ध, प्रायः एक साधारण बोझा ढोने वाले घोड़े पर यात्रा करता था। वास्तव में उस घोड़े पर दोनों ओर झोले लटके रहते थे ताकि वह अपने साथ आवश्यक और उपयोगी वस्तुएँ ले जा सके। मैं तो यही चाहता हूँ कि किसी दिन मार्ग में उसकी भेंट हमारे किसी धनी नवयुवक अश्वारोही से हो जाए, जिसके आगे-आगे दौड़ने वाले सेवक हों, न्यूमिडियाई दासों का दल साथ चल रहा हो और जिसके पीछे उड़ती हुई धूल का बड़ा बादल उठ रहा हो। निस्संदेह, ऐसा व्यक्ति मार्कस कैटो की अपेक्षा अधिक सुसज्जित और अधिक सेवकों से घिरा हुआ यात्री दिखाई देगा। फिर भी, उस सारी फैशनेबल सज-धज के बीच वह गंभीरतापूर्वक यह विचार कर रहा होगा कि कहीं वह स्वयं को किसी ग्लैडिएटर या जंगली पशुओं से लड़ने वाले योद्धा के रूप में किराए पर दे दे। उस युग के लिए इससे बढ़कर सम्मान की बात और क्या हो सकती है कि एक विजयी सेनापति, एक सेंसर और वह भी कैटो जैसा व्यक्ति, एक साधारण-से घोड़े में ही संतुष्ट था! और वह घोड़ा भी पूरी तरह उसके लिए उपलब्ध नहीं था क्योंकि उसके दोनों ओर लटके हुए गठ्ठरों ने उसका कुछ भाग घेर रखा था। फिर भी, क्या तुम उन मोटे-ताज़े, आरामदेह चाल वाले और तेज़ रफ़्तार शानदार घोड़ों की अपेक्षा उस एक साधारण घोड़े को नहीं चुनोगे, जिसकी पीठ कैटो के पैरों के स्पर्श से घिस गई थी?

    मुझे लगता है कि यदि मैं स्वयं ही इस विषय का अंत न करूँ तो इसका कोई अंत नहीं होगा। इसलिए अब मैं कम-से-कम सामान और यात्रा-भार की चर्चा यहीं समाप्त करता हूँ। जिसने सबसे पहले यात्रा के सामान को इम्पेडिमेंटा (अर्थात् ‘बोझ’ या ‘बाधा’) कहा था, उसने मानो पहले ही उसके वास्तविक स्वरूप की भविष्यवाणी कर दी थी। अब मैं तुम्हारे साथ हमारे स्टोइक विद्यालय के कुछ ऐसे विचार साझा करना चाहता हूँ जो सद्गुण से संबंधित हैं। हमारे मत में, मनुष्य के सुखी होने के लिए केवल सद्गुण ही पर्याप्त है। 

जो वस्तु वास्तव में अच्छी (शुभ) होती है, वही मनुष्य को भी अच्छा बनाती है। ठीक उसी प्रकार जैसे संगीत-कला में जो वस्तु अच्छी होती है, वही किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ बनाती है। भाग्य पर निर्भर रहने वाली वस्तुएँ मनुष्य को अच्छा नहीं बनातीं। अतः ऐसी वस्तुएँ वास्तविक अर्थ में अच्छी (शुभ) नहीं हैं।

इस तर्क का पेरिपैटेटिक दार्शनिक इस प्रकार खंडन करते हैं कि हमारी पहली मान्यता ही असत्य है। वे कहते हैं, “केवल किसी अच्छी वस्तु के कारण मनुष्य अपने-आप अच्छा नहीं बन जाता। उदाहरण के लिए, संगीत-कला में बाँसुरी, वीणा या वादन के लिए उपयुक्त कोई उत्तम वाद्य-यंत्र अच्छी वस्तुएँ हैं। परन्तु इनमें से कोई भी किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ नहीं बना देता।” 

    हम उन्हें इस प्रकार उत्तर देंगे। “तुम संगीत में ‘अच्छी वस्तु’ से हमारा अभिप्राय नहीं समझ पाए। हमारा संकेत उन वस्तुओं की ओर नहीं है जो केवल संगीतज्ञ को साधन उपलब्ध कराती हैं बल्कि उन गुणों की ओर है जो उसे वास्तव में संगीतज्ञ बनाते हैं। तुम केवल संगीत-कला के बाहरी उपकरणों पर ध्यान दे रहे हो, स्वयं उस कला पर नहीं। संगीत-कला में जो वास्तव में अच्छा है, वही किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ बनाता है।”

    मैं इस बात को और अधिक स्पष्ट करना चाहता हूँ। संगीत-कला में ‘अच्छा’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। पहला, उस वस्तु के लिए जो संगीतज्ञ के कार्य या प्रदर्शन में सहायता करती है। दूसरा, उस वस्तु के लिए जो स्वयं उसकी कला या कौशल को विकसित करती है। बाँसुरी, वीणा, ऑर्गन और तार वाले अन्य वाद्य-यंत्र पहले प्रकार की वस्तुएँ हैं। उनका संबंध संगीत के प्रदर्शन से है, स्वयं संगीत-कला से नहीं। क्योंकि एक व्यक्ति इन वाद्य-यंत्रों के बिना भी संगीत-कला में निपुण हो सकता है, यद्यपि वह उस समय अपनी कला का प्रदर्शन न कर सके। किन्तु मनुष्य के मामले में ऐसी दोहरी स्थिति नहीं पाई जाती। मनुष्य का वास्तविक शुभ (अच्छाई) और उसके जीवन का वास्तविक शुभ, दोनों एक ही हैं। 

    जो वस्तु सबसे निकृष्ट और तिरस्कृत लोगों के पास भी हो सकती है, वह वास्तविक अर्थ में अच्छी (शुभ) नहीं हो सकती। धन तो दलाल और ग्लैडिएटरों के प्रबंधक जैसे लोगों के पास भी हो सकता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में अच्छा (शुभ) नहीं है। 

    “वे कहते हैं, ‘तुम्हारी पहली मान्यता ही असत्य है। साहित्य-शिक्षण, चिकित्सा और नौचालन (जहाज़ चलाने की कला) में हम देखते हैं कि उनसे संबंधित अच्छी वस्तुएँ अत्यन्त साधारण और निम्न श्रेणी के लोगों के पास भी हो सकती हैं।’” किन्तु ये कलाएँ महान आत्मा का दावा नहीं करतीं। वे मनुष्य को ऊँचाइयों तक नहीं उठातीं और न ही उसे भाग्य की वस्तुओं के प्रति उदासीन बनाती हैं। इसके विपरीत, सद्गुण मनुष्य को ऊँचा उठाता है और उसे उन सभी वस्तुओं से ऊपर स्थापित करता है जिन्हें सामान्य लोग अत्यन्त मूल्यवान समझते हैं। जिन वस्तुओं को लोग प्रायः अच्छा या बुरा कहते हैं, वे सद्गुणी व्यक्ति के लिए न तो अत्यधिक लालसा का विषय होती हैं और न ही भय का। 

    क्लियोपेट्रा के एक हिजड़े सेवक चेलिडोन के पास एक विशाल संपत्ति थी। हाल के समय में नातालिस नाम का एक व्यक्ति जिसकी वाणी उतनी ही अश्लील थी जितना उसका व्यवहार निर्लज्ज (क्योंकि वह स्त्रियों का मुख द्वारा यौन-शोषण करता था) बहुत बड़ी संपत्ति का उत्तराधिकारी बना और स्वयं भी अनेक लोगों का उत्तराधिकार छोड़ गया। तो अब हमें क्या कहना चाहिए? क्या धन ने उसे अशुद्ध बना दिया था या उसने स्वयं धन को कलंकित कर दिया? कुछ लोगों के पास धन उसी प्रकार पहुँचता है जैसे चाँदी के सिक्के किसी गटर में गिर पड़ते हैं। सद्गुण इन सब वस्तुओं से ऊपर स्थित रहता है। उसका मूल्यांकन उसके अपने मापदंड से किया जाता है। जो वस्तुएँ किसी भी व्यक्ति के पास हो सकती हैं, उन्हें वह वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं मानता चिकित्सा और नौचालन जैसी कलाएँ न तो स्वयं को और न ही उनका अभ्यास करने वालों को ऐसी वस्तुओं के प्रति आकर्षित होने से रोकती हैं। कोई व्यक्ति अच्छा मनुष्य न होते हुए भी एक कुशल चिकित्सक, कुशल नाविक, साहित्य का शिक्षक और, यदि कहो, एक उत्कृष्ट रसोइया भी हो सकता है। जब किसी व्यक्ति में कोई असाधारण गुण दिखाई देता है, तब तुम कहते हो कि वह एक असाधारण व्यक्ति है क्योंकि मनुष्य का स्वरूप उसके गुणों के अनुरूप ही पहचाना जाता है। 

    धन की थैली का मूल्य उसके भीतर रखे धन के कारण होता है। वास्तव में थैली तो केवल उसके भीतर की वस्तु का एक आवरण मात्र है। भला कौन भरी हुई थैली को उसके भीतर के धन से अधिक मूल्यवान मानता है? यही बात विशाल सम्पत्तियों के स्वामियों पर भी लागू होती है। वे मानो अपनी सम्पत्ति के केवल सहायक या परिशिष्ट भर हैं। फिर बुद्धिमान मनुष्य महान क्यों है? इसलिए कि उसका मन महान है। अतः यह बात सत्य है कि जो वस्तु सबसे तुच्छ और निकृष्ट लोगों के पास भी हो सकती है, वह वास्तविक अर्थ में शुभ (अच्छी) नहीं हो सकती। इसी कारण मैं पीड़ा से मुक्त रहने को भी शुभ नहीं कहूँगा क्योंकि यह तो एक झींगुर और एक पिस्सू को भी प्राप्त है। मैं यह भी नहीं कहूँगा कि शांत और निश्चिन्त जीवन ही शुभ है क्योंकि केंचुए से अधिक निश्चिन्त जीवन किसका होता है? तुम पूछते हो कि मनुष्य को बुद्धिमान क्या बनाता है? वही जो किसी को देवतुल्य बनाता है। उसमें कुछ दैवी, उदात्त और महान अवश्य होना चाहिए। वास्तविक शुभ सभी के हिस्से में नहीं आता। वह किसी भी साधारण धारक में निवास नहीं करता। इस बात पर विचार करो—

प्रत्येक प्रदेश अपनी-अपनी विशेष उपज देता है,
कहीं अन्न अधिक होता है, कहीं अंगूर की बेलें लहलहाती हैं।
कहीं बागों के फल प्रचुर मात्रा में मिलते हैं,
तो कहीं बिना बोए ही हरी घास उग आती है।
क्या तुम नहीं देखते कि ट्मोलुस पर्वत हमें सुगंधित केसर भेजता है,
भारत हमें हाथीदाँत प्रदान करता है। 
कोमल स्वभाव वाले सबाई लोग अपनी धूप (लोबान) भेजते हैं,
और वस्त्रहीन कैलिब्स लोग हमें लोहा उपलब्ध कराते हैं?

     इन विविध वस्तुओं को अलग-अलग प्रदेशों को सौंपा गया है ताकि यदि मनुष्य एक-दूसरे की उपज प्राप्त करना चाहें तो उन्हें परस्पर आदान-प्रदान करना पड़े। परन्तु सर्वोच्च शुभ का अपना एक अलग ही प्रदेश है। वह न तो वहाँ उत्पन्न होता है जहाँ हाथीदाँत मिलता है और न वहाँ जहाँ लोहा मिलता है। तुम पूछते हो, उसका स्थान कहाँ है? वह मनुष्य का मन है। यदि मन पवित्र और निष्कलुष नहीं है तो उसमें ईश्वर का निवास नहीं हो सकता।जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह किसी अशुभ वस्तु से उत्पन्न नहीं हो सकती। पर धन से लोभ उत्पन्न होता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है।

इस पर कोई आपत्ति कर सकता है। “यह सत्य नहीं है कि शुभ वस्तु अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकती। धन तो मंदिरों की लूट और चोरी से भी प्राप्त होता है। इसलिए मंदिर-लूट और चोरी निश्चय ही बुरे कर्म हैं किन्तु केवल इसलिए नहीं कि उनसे धन प्राप्त होता है बल्कि इसलिए कि वे लाभ के साथ-साथ भय, चिंता तथा मन और शरीर, दोनों की यातनाएँ भी उत्पन्न करते हैं।”

    जो यह तर्क देता है, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि जिस प्रकार मंदिर-लूट अपने अनेक बुरे परिणामों के कारण बुरी है, उसी प्रकार वह अपने अच्छे परिणाम, धन प्राप्त होने के कारण किसी अर्थ में अच्छी भी है। इससे अधिक विकृत विचार और क्या हो सकता है? फिर भी आज हम मानो स्वयं को यह विश्वास दिला चुके हैं कि मंदिर-लूट, चोरी और व्यभिचार भी अच्छी बातें हैं। कितने ही लोग चोरी करने में लज्जा का अनुभव नहीं करते और कितने ही अपने व्यभिचार का घमंड करते हैं! छोटी-मोटी मंदिर-लूट करने वालों को दंड मिलता है जबकि बड़े पैमाने पर ऐसा करने वालों का विजय-यात्राओं में सम्मान किया जाता है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी दृष्टि से मंदिर-लूट वास्तव में अच्छी है तो वह सम्माननीय भी होगी। चूँकि सम्माननीय कर्म ही उचित कर्म होता है, इसलिए उसे उचित कार्य भी माना जाएगा। ऐसी बात की कल्पना भी संसार का कोई मनुष्य नहीं कर सकता। अतः शुभ वस्तु अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकती। क्योंकि यदि, जैसा तुम कहते हो, मंदिर-लूट केवल इसलिए बुरी है कि उसके अनेक बुरे परिणाम होते हैं तो यदि उससे दंड हटा दिया जाए और उसे पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दे दी जाए, तब वह पूरी तरह अच्छी ठहरेगी। किन्तु वास्तव में अपराधों का सबसे बड़ा दंड उन्हीं अपराधों के भीतर निहित होता है। यदि तुम यह समझते हो कि उनका दंड जेल या जल्लाद के हाथों बाद में मिलता है तो तुम भ्रम में हो। ऐसे कर्मों का दंड तो उसी क्षण आरम्भ हो जाता है जब वे किए जाते हैं बल्कि वे अपने किए जाने की प्रक्रिया में ही मनुष्य को दंडित करने लगते हैं। इसलिए शुभ वस्तु अशुभ से उसी प्रकार उत्पन्न नहीं हो सकती, जैसे जैतून के वृक्ष से अंजीर नहीं उग सकता। पौधा अपने बीज के अनुरूप ही होता है। शुभ वस्तुएँ भी अपने स्वभाव के अनुरूप ही उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार सम्माननीय वस्तु लज्जाजनक वस्तु से उत्पन्न नहीं हो सकती, उसी प्रकार शुभ भी अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि जो वास्तव में शुभ है और जो वास्तव में सम्माननीय है, दोनों एक ही हैं। 

    हमारे विद्यालय के कुछ दार्शनिक इस आपत्ति का उत्तर इस प्रकार देते हैं। “मान लो कि धन, चाहे वह किसी भी प्रकार से प्राप्त किया गया हो, अपने-आप में एक शुभ वस्तु है। तब भी, यदि कभी धन मंदिर-लूट से प्राप्त होता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह धन वास्तव में मंदिर-लूट के कारण ही प्राप्त हुआ है। इसे इस प्रकार समझो। मान लो कि एक घड़े में एक सोने का सिक्का और एक साँप दोनों रखे हैं। यदि तुम उस घड़े से सोने का सिक्का निकालते हो तो तुमने उसे साँप के कारण नहीं निकाला। अर्थात घड़ा मुझे सोना इसलिए नहीं देता कि उसमें साँप भी है बल्कि वह मुझे सोना इस तथ्य के बावजूद देता है कि उसमें साँप भी मौजूद है। उसी प्रकार, मंदिर-लूट से लाभ इसलिए नहीं मिलता कि वह एक घृणित और अपराधपूर्ण कर्म है बल्कि इसलिए कि उस कर्म के साथ लाभ भी जुड़ा हुआ है। जैसे घड़े में बुरी वस्तु साँप है, उसके साथ रखा हुआ सोना नहीं, उसी प्रकार मंदिर-लूट में बुरी वस्तु अपराध है, उससे प्राप्त होने वाला लाभ नहीं।”

    किन्तु मैं इस मत से सहमत नहीं हूँ। ये दोनों उदाहरण समान नहीं हैं। पहले उदाहरण में मैं साँप के बिना भी सोना निकाल सकता हूँ। पर दूसरे उदाहरण में मैं मंदिर-लूट किए बिना लाभ प्राप्त नहीं कर सकता। वहाँ लाभ अपराध के पास मात्र नहीं रखा है बल्कि उसी के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। 

    यदि किसी वस्तु की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है तो वह वस्तु शुभ नहीं है। धन की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है। 

    कोई इस पर आपत्ति कर सकता है। “तुम्हारी पहली मान्यता के दो अर्थ हो सकते हैं। पहला यह कि धन की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है। किन्तु सद्गुण की प्राप्ति का प्रयास भी अनेक बुरे परिणाम ला सकता है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अध्ययन के उद्देश्य से समुद्री यात्रा करता है और उसका जहाज़ डूब जाता है या कोई दूसरा व्यक्ति यात्रा के दौरान बंदी बना लिया जाता है। दूसरा अर्थ यह है कि जिस वस्तु के कारण हमें बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं, वह शुभ नहीं है। यदि यह अर्थ लिया जाए तो या तो यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि धन या सुख के कारण हमें बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं अथवा यदि यह मान लिया जाए कि धन के कारण वास्तव में अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न होते हैं तो धन केवल शुभ नहीं होगा बल्कि वह स्वयं एक अशुभ वस्तु होगा। किन्तु तुम्हारा विद्यालय तो केवल इतना कहता है कि धन शुभ नहीं है। इसके अतिरिक्त, तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि धन का उपयोग है। तुम उसे जीवन की उपयोगी वस्तुओं में गिनते हो। लेकिन इसी तर्क के अनुसार वह उपयोगी भी नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि उसी के कारण हमें अनेक हानियाँ भी उठानी पड़ती हैं।” 

    कुछ लोग इसका उत्तर इस प्रकार देते हैं। “तुम यह समझने में भूल कर रहे हो कि धन अपने-आप में हानिकारक है। धन किसी को हानि नहीं पहुँचाता। हानि पहुँचाती है मनुष्य की अपनी मूर्खता या किसी दूसरे की दुष्टता। जैसे तलवार स्वयं किसी को नहीं मारती, वह तो केवल हत्यारे का उपकरण होती है। उसी प्रकार केवल इसलिए कि तुम्हें धन के कारण हानि पहुँची है, यह नहीं कहा जा सकता कि धन ने तुम्हें हानि पहुँचाई।” किन्तु मेरे विचार में पॉसिडोनियस का उत्तर इससे भी अधिक उचित है। वह कहते हैं कि धन बुराइयों का कारण इस अर्थ में नहीं है कि वह स्वयं कोई बुरा कार्य करता है बल्कि इसलिए कि वह उन लोगों को प्रेरित करता है जो बुरे कर्म करने को तत्पर होते हैं। क्योंकि प्रत्यक्ष (या कार्यकारी) कारण और पूर्ववर्ती कारण में अंतर होता है। प्रत्यक्ष कारण वह है जो अनिवार्य रूप से किसी वस्तु को सीधे प्रभावित करता है। जबकि धन दूसरे प्रकार का कारण है। वह मन में वासनाओं को भड़काता है, अहंकार को जन्म देता है, दूसरों की ईर्ष्या और द्वेष को आकर्षित करता है और मनुष्य के मन को स्वयं अपने ही विरुद्ध इस सीमा तक खड़ा कर देता है कि वह केवल धनी कहलाने की प्रतिष्ठा से ही प्रसन्न होने लगता है। जबकि वही प्रतिष्ठा अंततः उसके लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है। वास्तविक शुभ वस्तुएँ दोषरहित होनी चाहिए। शुभ वस्तुएँ निर्मल होती हैं। वे मन को भ्रष्ट नहीं करतीं, न ही उसे चिंता से भरती हैं। वे मन को ऊँचा उठाती हैं और उसका विस्तार करती हैं। परन्तु उसमें अहंकार उत्पन्न नहीं करतीं। शुभ वस्तुएँ आत्मविश्वास उत्पन्न करती हैं। जबकि धन प्रायः दुस्साहस को जन्म देता है। शुभ वस्तुएँ मन में महानता उत्पन्न करती हैं, जबकि धन आडंबर को जन्म देता है और आडंबर महानता का केवल एक झूठा प्रदर्शन है। 

    “यदि तुम इसी प्रकार तर्क करोगे,” मेरा प्रतिपक्षी कहता है, “तो धन केवल शुभ नहीं होगा बल्कि अशुभ भी होगा।” धन तभी अशुभ होता यदि वह अपने-आप में हमें हानि पहुँचाता अर्थात यदि, जैसा मैंने पहले कहा, वह प्रत्यक्ष (कार्यकारी) कारण होता। किन्तु वास्तव में वह केवल पूर्ववर्ती कारण है। फिर भी धन ऐसा कारण अवश्य है जो केवल हमारे मन को उत्तेजित ही नहीं करता बल्कि उसे अपनी ओर आकर्षित भी करता है। क्योंकि वह शुभ का ऐसा आभास उत्पन्न करता है जो देखने में इतना विश्वसनीय लगता है कि अधिकांश लोग उससे भ्रमित हो जाते हैं। इसी प्रकार सद्गुण भी कभी-कभी लोगों की ईर्ष्या और द्वेष का पूर्ववर्ती कारण बन जाता है। बहुत-से लोग अपनी बुद्धिमत्ता के कारण दूसरों की ईर्ष्या का पात्र बनते हैं और बहुत-से अपनी न्यायप्रियता के कारण। परन्तु यह कारण सद्गुण के स्वभाव में निहित नहीं है और न ही यह कोई स्वाभाविक या विश्वसनीय परिणाम है। इसके विपरीत, सद्गुण मनुष्यों के मन पर ऐसा प्रभाव डालता है जो उन्हें उसकी ओर आकर्षित करता है तथा उसके प्रति प्रेम और आदर उत्पन्न करता है। 

    पॉसिडोनियस का कहना है कि इस विषय में इस प्रकार तर्क करना चाहिए—

जो वस्तुएँ मन को न महानता प्रदान करती हैं, न आत्मविश्वास और न ही चिंता से मुक्ति देती हैं, वे शुभ नहीं हैं।किन्तु धन, स्वास्थ्य और इसी प्रकार की अन्य वस्तुएँ इनमें से कोई भी गुण प्रदान नहीं करतीं। अतः वे वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं हैं।

    वे इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—

जो वस्तुएँ मन को न महानता प्रदान करती हैं, न आत्मविश्वास, न ही चिंता से मुक्ति देती हैं बल्कि इसके विपरीत उसे अपव्यय, घमंड और अहंकार की ओर ले जाती हैं, वे अशुभ हैं। भाग्य पर निर्भर रहने वाली वस्तुएँ मनुष्य को इन्हीं दोषों की ओर प्रेरित करती हैं। अतः वे वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं हैं। 

    कोई इस पर कह सकता है, “यदि यह तर्क सही है तो इन्हें उपयोगी वस्तुएँ भी नहीं कहा जा सकता।” किन्तु उपयोगी वस्तुओं (लाभदायक वस्तुओं) का स्थान शुभ वस्तुओं से बिल्कुल भिन्न है। उपयोगी वस्तु वह है जिसमें हानि की अपेक्षा लाभ अधिक हो। जबकि शुभ वस्तु का पूर्णतः शुभ होना आवश्यक है और उसमें किसी भी प्रकार की हानि का लेशमात्र भी नहीं होना चाहिए। शुभ वह नहीं है जो अधिकांशतः लाभदायक हो बल्कि वह है जो पूरी तरह और हर दृष्टि से लाभदायक हो। इसके अतिरिक्त, उपयोगी वस्तु का लाभ पशुओं को भी हो सकता है, अपरिपक्व लोगों को भी और मूर्खों को भी। इसलिए उसमें कुछ हानि भी मिली हो सकती है, फिर भी उसे उपयोगी कहा जाता है क्योंकि उसका मूल्यांकन उसके प्रमुख गुण अर्थात उसमें निहित अधिक लाभ के आधार पर किया जाता है। किन्तु शुभ वस्तु केवल बुद्धिमान व्यक्ति की ही संपत्ति होती है, और वह अनिवार्य रूप से हर प्रकार की मिलावट या दोष से रहित होती है। 

    साहस बनाए रखो। अब केवल एक पहेली शेष रह गई है। परन्तु वह हरक्यूलिस के पराक्रम जैसी कठिन पहेली है—

जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह अशुभ वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकती। किन्तु अनेक व्यक्तियों की निर्धनता मिलकर एक व्यक्ति की धन-संपत्ति का निर्माण करती है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है। 

    इस न्याय-वाक्य (सिलोजिज़्म) को हमारा स्टोइक विद्यालय स्वीकार नहीं करता। यह पेरिपैटेटिक दार्शनिकों द्वारा गढ़ा गया है और उसी परंपरा के दार्शनिक इसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। किन्तु पॉसिडोनियस कहते हैं कि इस कुतर्क का जिसे विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों के तर्कशास्त्रियों ने बार-बार दोहराया है, एंटीपेटर ने इस प्रकार खंडन किया है—

“‘निर्धनता’ शब्द का अर्थ किसी वस्तु का होना नहीं बल्कि उसका अभाव होना है (या जैसा प्राचीन दार्शनिक कहते थे, ‘वंचना’ या ‘अभाव’)। यूनानी भाषा में इसे काता स्तेरेसिन (kata sterēsin) कहा जाता है। यह शब्द इस बात का द्योतक नहीं है कि किसी के पास क्या है बल्कि इस बात का कि उसके पास क्या नहीं है। इसलिए अनेक अभावों को जोड़कर कोई वास्तविक वस्तु नहीं बनाई जा सकती। धन अनेक संसाधनों से बनता है, न कि अनेक निर्धनताओं से। तुम निर्धनता का सही अर्थ नहीं समझते। निर्धनता का अर्थ केवल थोड़ी-सी वस्तुओं का होना नहीं है बल्कि बहुत-सी वस्तुओं का न होना है। इसलिए इसका अर्थ उस आधार पर निर्धारित होता है जिसकी कमी है, न कि उस आधार पर जो किसी के पास है।” यदि लैटिन भाषा में यूनानी शब्द अनुपारक्सिया (anuparxia) के अर्थ वाला कोई उपयुक्त शब्द होता तो मैं यह बात और भी सरलता से समझा सकता। एंटीपेटर इसी शब्द का प्रयोग निर्धनता के लिए करते हैं। किन्तु मेरे विचार में निर्धनता का अर्थ इससे अधिक कुछ नहीं है कि किसी व्यक्ति के पास बहुत कम संपत्ति या साधन हों।

    आओ, निर्धनता और धन के वास्तविक स्वरूप की इस जाँच को किसी और अवसर के लिए स्थगित रखें, जब हमारे पास पर्याप्त समय हो। जब वह समय आए, तब हम स्वयं से यह पूछें कि क्या शब्दों के अर्थ पर व्यर्थ विवाद करने की अपेक्षा निर्धनता की कठोरता को कम करना और धन के अहंकार को नियंत्रित करना अधिक उचित नहीं होगा, मानो हमने पहले ही इस विषय के सभी तथ्य निश्चित कर लिए हों। कल्पना करो कि हमें किसी सार्वजनिक सभा में बुलाया गया है, जहाँ यह निर्णय होना है कि धन-संपत्ति को समाप्त करने का कोई कानून पारित किया जाए या नहीं। क्या ये तर्क-वाक्य (सिलोजिज़्म) उस बहस में हमारी विजय दिला देंगे? क्या वे रोमन जनता को निर्धनता की प्रशंसा करने और उसकी आकांक्षा रखने के लिए प्रेरित करेंगे। उस निर्धनता की, जो उनके साम्राज्य की नींव और कारण रही है? क्या वे उन्हें उनकी वर्तमान संपन्नता से भयभीत कर देंगे? क्या ऐसे तर्क उन्हें यह समझा पाएँगे कि उनका धन पराजित राष्ट्रों से प्राप्त हुआ है और यही धन आज उस नगर में जो कभी अत्यंत पवित्र और संयमशील था, महत्त्वाकांक्षा, रिश्वतखोरी और अशांति का कारण बन गया है? कि विजय में प्राप्त लूट का प्रदर्शन अत्यधिक आडंबरपूर्ण हो गया है? कि यद्यपि एक राष्ट्र अनेक राष्ट्रों को लूट सकता है, फिर भी अनेक राष्ट्रों के लिए उस एक राष्ट्र को लूट लेना कहीं अधिक सरल होता है? यही वे बातें हैं जिन्हें हमें लोगों के सामने प्रभावपूर्वक रखना चाहिए। उनकी लोभ-वृत्ति को शब्दों के खेल से चकमा देने के बजाय, हमें उसका सीधे सामना करना चाहिए। यदि संभव हो, तो हमें निर्भीक होकर बोलना चाहिए। यदि वह भी संभव न हो, तो कम-से-कम स्पष्ट और सरल भाषा में अवश्य बोलना चाहिए।


अभी के लिए विराम 

दर्शन में उपदेश की भूमिका के बारे में -- पत्र - 92

प्रिय लूसीलियस  कुछ लोगों ने यह माना है कि दर्शनशास्त्र का केवल एक ही भाग वास्तविक और मान्य है। वह भाग जो सामान्य रूप से मनुष्य को शिक्षा दे...