प्रिय लूसीलियस
तुमने मुझसे उस विषय पर अपना वचन पूरा करने के लिए कहा है, जिसे मैंने पहले कुछ समय के लिए स्थगित कर देने की बात कही थी। साथ ही, तुमने मुझसे यह लिखने के लिए भी कहा है कि क्या दर्शन का वह भाग, जिसे यूनानी पैराइनेटिके (paraenetikē) कहते हैं और जिसे हम "उपदेशात्मक" (prescriptive) कहते हैं, बुद्धिमत्ता को पूर्ण बनाने के लिए अपने-आप में पर्याप्त है। मुझे पता है कि यदि मैं इससे इनकार भी कर दूँ तो तुम उसे बुरा नहीं मानोगे। शायद यही कारण है कि मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए और भी अधिक तत्पर हूँ, जिससे वह कहावत भी चरितार्थ हो जाती है, "उस वस्तु की माँग मत करो जिसे वास्तव में पाना नहीं चाहते।" कभी-कभी हम किसी वस्तु के लिए बड़े आग्रह से निवेदन करते हैं। जबकि यदि वही वस्तु हमें सचमुच दे दी जाए तो हम उसे स्वीकार करने से इनकार कर देंगे। चाहे यह मूर्खता हो या हठ, इसका उचित दंड यही है कि ऐसी इच्छा तुरंत पूरी कर दी जाए। बहुत-सी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें हम चाहने का केवल दिखावा करते हैं। जबकि वास्तव में हम उन्हें नहीं चाहते। कोई सार्वजनिक व्याख्याता एक विशाल ग्रंथ लेकर आता है, जिसकी लिखावट बहुत छोटी होती है और जो कसकर लपेटा हुआ होता है। वह उसका बड़ा भाग पढ़ने के बाद कहता है, "यदि आप चाहें तो मैं यहीं रुक जाऊँ।" श्रोता तुरंत चिल्लाते हैं, "पढ़ते रहिए! पढ़ते रहिए!" जबकि वास्तव में वे मन-ही-मन यही चाहते हैं कि वह उसी क्षण बोलना बंद कर दे। अक्सर हम चाहते कुछ और हैं और प्रार्थना कुछ और करते हैं। यहाँ तक कि देवताओं से भी हम सत्य नहीं कहते। किंतु देवता या तो हमारी प्रार्थना पर ध्यान नहीं देते या फिर हम पर दया करते हैं।
परंतु मेरे मामले में दया का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। मैं अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करूँगा और तुम्हारे ऊपर एक बहुत लंबा पत्र लाद दूँगा। यदि वह तुम्हारी इच्छा से अधिक लंबा निकले तो बस इतना कहना, "यह विपत्ति मैंने स्वयं अपने ऊपर बुलाई है।" अपने आपको उन लोगों की श्रेणी में समझो जो बड़ी कोशिशों और योजनाओं के बाद जिस स्त्री से विवाह करते हैं, बाद में उसी पत्नी से त्रस्त रहते हैं या उन लोगों में, जो अपार परिश्रम से अर्जित धन के कारण ही परेशान रहते हैं या उन लोगों में, जिन्होंने हर उपाय और हर प्रयास करके ऊँचे पद प्राप्त किए और फिर उन्हीं पदों से पीड़ित हुए या संक्षेप में, उन सभी लोगों में जो अपनी ही विपत्तियों के स्वयं उत्तरदायी होते हैं।
इस भूमिका की अब बहुत हो चुकी। अब मैं मूल विषय पर आता हूँ। कुछ लोग कहते हैं, “सुखी जीवन का आधार उचित कर्म (right actions) हैं। उचित कर्मों का मार्गदर्शन उपदेश (precepts) करते हैं। इसलिए सुखी जीवन के लिए केवल उपदेश ही पर्याप्त हैं।” लेकिन वास्तविकता यह है कि उपदेश हमेशा सुखी जीवन की ओर नहीं ले जाते। वे तभी प्रभावी होते हैं जब उन्हें ग्रहण करने वाला मन पहले से उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार हो। यदि मन मिथ्या धारणाओं (wrong opinions) से घिरा हुआ हो तो उपदेश व्यर्थ सिद्ध होते हैं। दूसरी बात यह है कि यदि कोई व्यक्ति सही कार्य भी करता है, तो यह आवश्यक नहीं कि उसे यह ज्ञान हो कि वह सही कार्य कर रहा है। जब तक किसी व्यक्ति का चरित्र आरंभ से ही उत्तम ढंग से निर्मित न हो और उसका मन पूर्णतः विवेकपूर्ण (rational) न हो, तब तक उसके लिए प्रत्येक परिस्थिति में उचित सीमा का पालन करना संभव नहीं है। वह यह नहीं जान सकता कि किसी कार्य को कब करना चाहिए, कितनी मात्रा में करना चाहिए, किसके साथ करना चाहिए, किस प्रकार करना चाहिए और किस उद्देश्य से करना चाहिए। इस कारण वह न तो पूरे मन से सदाचार का पालन कर सकता है और न ही उसके आचरण में स्थिरता और स्वेच्छा होगी। इसके विपरीत, वह बार-बार संकोच करेगा, असमंजस में पड़ेगा और निर्णय लेने में हिचकिचाएगा।
“यदि सम्माननीय (सद्गुणपूर्ण) कर्म उपदेशों (प्रिसेप्ट्स) का परिणाम हैं तो सुखी जीवन के लिए केवल उपदेश ही पर्याप्त हैं। यदि पहली बात सत्य है तो दूसरी भी सत्य होनी चाहिए।” इसका हमारा उत्तर यह है कि सम्माननीय कर्म वास्तव में उपदेशों से उत्पन्न होते हैं, किंतु केवल उपदेशों से नहीं।
“यदि सामान्य रूप से सभी कलाएँ केवल उपदेशों से ही पर्याप्त रूप से सीखी जा सकती हैं तो बुद्धिमत्ता भी उनसे ही पर्याप्त रूप से सीखी जा सकेगी क्योंकि वह जीवन जीने की कला है। जिस प्रकार एक नाविक को उपदेश देकर प्रशिक्षित किया जाता है, ‘पतवार को इस प्रकार मोड़ो, पाल को इस तरह फैलाओ, अनुकूल हवा का इस प्रकार उपयोग करो, प्रतिकूल हवा का इस प्रकार सामना करो और तेज़ तथा बदलती हुई हवा से इस प्रकार सर्वोत्तम लाभ उठाओ।’ इसी प्रकार अन्य प्रकार के कारीगर भी उपदेशों द्वारा प्रशिक्षित किए जाते हैं। इसलिए जीवन जीने की इस कला के कारीगर को भी उपदेशों द्वारा प्रशिक्षित किया जा सकता है।” जिन कलाओं की तुम बात कर रहे हो, वे केवल जीवन के साधनों से संबंधित हैं, स्वयं जीवन से नहीं। उनके कार्य में बाहर की अनेक परिस्थितियाँ बाधा डाल सकती हैं और उन्हें रोक सकती हैं जैसे, आशा, इच्छा और भय। लेकिन जो कला स्वयं को जीवन जीने की कला कहती है, उसके अभ्यास को कोई भी नहीं रोक सकता। वह सभी बाधाओं को झटक देती है और सभी अवरोधों को परे फेंक देती है। यही उसे अन्य कलाओं से अलग बनाता है। अन्य कलाओं में यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलती करे तो वह उतनी क्षम्य नहीं होती। लेकिन अनजाने में हुई गलती अधिक क्षम्य मानी जाती है। जबकि जीवन जीने की कला में सबसे बड़ा दोष जानबूझकर गलत आचरण करना है। मेरा आशय यह है कि यदि कोई विद्वान जानबूझकर व्याकरण की गलती करता है तो उसे लज्जा नहीं होगी। पर यदि वही गलती उससे अनजाने में हो जाए तो उसे लज्जा अवश्य होगी। इसी प्रकार यदि कोई डॉक्टर यह समझ ही न पाए कि उसके रोगी की अवस्था बिगड़ रही है तो वह उस डॉक्टर से भी अधिक अयोग्य है जो स्थिति को समझते हुए भी उसे अनदेखा करने का दिखावा करता है। लेकिन जीवन जीने की कला में जानबूझकर की गई गलतियाँ सबसे अधिक निंदनीय होती हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि अनेक कलाओं में, यहाँ तक कि सबसे परिष्कृत कलाओं में भी, केवल उपदेश ही नहीं बल्कि अपने मूल सिद्धांत भी होते हैं। उदाहरण के लिए चिकित्सा-शास्त्र को ही लें, जिसमें हिप्पोक्रेटीस, एस्क्लेपियाडीस और थेमिसोन की विभिन्न परंपराएँ हैं। इसके अतिरिक्त, कोई भी सैद्धांतिक कला अपने सिद्धांतों के बिना नहीं होती। यूनानी इन्हें डोग्माटा (dogmata) कहते हैं। हम इन्हें 'सिद्धांत' (decreta), 'मत' (scita) या 'स्थापित शिक्षाएँ' (placita) कह सकते हैं। ऐसे सिद्धांत आपको ज्यामिति और खगोलशास्त्र दोनों में मिलेंगे। दर्शनशास्त्र एक साथ सैद्धांतिक भी है और व्यावहारिक भी। वह विचार भी करता है और उसी समय कर्म भी करता है। यह समझना भूल होगी कि दर्शन केवल तुम्हारी सांसारिक आवश्यकताओं की ही चिंता करता है। उसकी आकांक्षाएँ इससे कहीं अधिक ऊँची हैं। वह कहता है, “मेरा ध्यान समस्त ब्रह्मांड पर है। मैं स्वयं को केवल नश्वर संसार तक सीमित नहीं रखता और न ही केवल तुम्हें यह बताने तक संतुष्ट हूँ कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। मुझे उन महान विषयों ने बुलाया है जो तुमसे भी ऊपर स्थित हैं।” जैसा कि ल्यूक्रेतियस कहते हैं—
“अब मैं तुम्हें
आकाश और देवताओं की व्यापक व्यवस्था के बारे में शिक्षा देना प्रारंभ करूँगा।
मैं उन मूल तत्त्वों को प्रकट करूँगा
जिनसे प्रकृति सभी वस्तुओं की रचना करती है,
उन्हें बढ़ाती है, उनका पालन-पोषण करती है
और अंत में उन्हें नष्ट करके फिर से उनके तत्त्वों में विलीन कर देती है।”
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि दर्शनशास्त्र क्योंकि वह एक सैद्धांतिक विद्या भी है। इसलिए उसके अपने मूल सिद्धांत भी हैं। इसके अतिरिक्त, कोई भी व्यक्ति अपने कर्तव्य का उचित पालन तब तक नहीं कर सकता, जब तक उसके भीतर ऐसी विवेकपूर्ण बुद्धि न हो जो उसे प्रत्येक परिस्थिति में अपने सभी कर्तव्यों का सही प्रकार से निर्वाह करने में सक्षम बनाए। वह इस विवेक को केवल उन उपदेशों के आधार पर प्राप्त नहीं कर सकता जो केवल किसी विशेष परिस्थिति में ही लागू होते हैं, न कि सार्वभौमिक रूप से। ऐसे उपदेश स्वभावतः दुर्बल और मानो जड़विहीन होते हैं क्योंकि वे केवल आंशिक होते हैं। इसके विपरीत, मूल सिद्धांत ही हमें दृढ़ता प्रदान करते हैं, हमें सुरक्षित और मानसिक रूप से शांत बनाए रखते हैं और साथ ही हमारे समूचे जीवन तथा समस्त प्रकृति को अपने भीतर समाहित करते हैं। दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों और उसके उपदेशों के बीच वही अंतर है, जो किसी वस्तु के मूल तत्त्वों और उसकी शाखाओं के बीच होता है। शाखाएँ मूल तत्त्वों पर निर्भर करती हैं। वही मूल तत्त्व उनकी उत्पत्ति का कारण हैं और उसी प्रकार अन्य सभी वस्तुओं के भी कारण हैं।
विरोधी पक्ष कहता है, “प्राचीन काल की बुद्धिमत्ता केवल यह बताती थी कि क्या करना चाहिए और किससे बचना चाहिए, फिर भी उस समय के लोग कहीं अधिक श्रेष्ठ चरित्र वाले थे। जब से विद्वानों का उदय हुआ है, अच्छे लोगों की संख्या घटती गई है। जो सद्गुण पहले सरल और प्रत्यक्ष था, वह अब कठिन और पेचीदा विद्या बन गया है। अब यह हमें जीवन जीना नहीं बल्कि वाद-विवाद करना सिखाती है।” जैसा कि तुम कहते हो, प्राचीन काल की वह पारंपरिक बुद्धिमत्ता अपने आरंभिक रूप में उतनी ही सरल और अलंकृतिहीन थी, जितनी अन्य कलाएँ अपने प्रारंभिक चरण में थीं। समय के साथ जैसे अन्य कलाओं में सूक्ष्मता और जटिलता आई, वैसे ही इसमें भी आई। किन्तु उस समय वास्तव में जटिल उपचारों की आवश्यकता नहीं थी। तब तक दुष्कर्म इतनी ऊँचाई तक नहीं पहुँचा था और न ही वह इतना व्यापक रूप से फैल चुका था। इसलिए साधारण दोषों का उपचार भी साधारण उपायों से हो जाता था। परंतु आज परिस्थितियाँ भिन्न हैं। अब हमें अपनी रक्षा के लिए अधिक सुदृढ़ और विस्तृत उपायों की आवश्यकता है क्योंकि हमारे विरुद्ध होने वाले आक्रमण पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली हो गए हैं।
एक समय था जब चिकित्सा का ज्ञान केवल कुछ औषधीय जड़ी-बूटियों तक सीमित था, जिनसे रक्तस्राव रोका जाता था और घावों को भरने में सहायता मिलती थी। फिर धीरे-धीरे वह विकसित होकर आज की जटिल और विस्तृत अवस्था तक पहुँची। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि प्राचीन काल में चिकित्सा को कम कार्य करना पड़ता था क्योंकि उस समय लोगों के शरीर सुदृढ़ और शक्तिशाली थे। उनका जीवन सरल भोजन पर आधारित था, ऐसा भोजन जो कृत्रिम उपायों और स्वाद-लोलुपता की इच्छाओं से दूषित नहीं हुआ था। लेकिन जब भोजन का उद्देश्य केवल भूख मिटाना न रहकर भूख को और भड़काना बन गया और पेटूपन को उत्तेजित करने के लिए असंख्य मसालों और स्वादवर्धकों का आविष्कार हो गया, तब जो भोजन पहले भूखे मनुष्य का पोषण करता था, वही अतिभोजन करने वालों के लिए बोझ बन गया। तभी शरीर का पीलापन, मदिरा से शिथिल हो चुकी नसों का कंपन और अपच से उत्पन्न दुर्बलता प्रकट हुई जो कुपोषण से होने वाली दुर्बलता से भी अधिक दयनीय है। तभी लोगों की चाल अस्थिर और लड़खड़ाती हुई हो गई। वे निरंतर ऐसे डगमगाने लगे मानो वास्तव में नशे में हों। तभी पूरे शरीर की त्वचा के नीचे द्रव एकत्र होने लगा और पेट अपनी स्वाभाविक क्षमता से अधिक भरने की आदत के कारण असामान्य रूप से फूलने लगा। तभी पीलिया फैला, चेहरा अपना स्वाभाविक रंग खो बैठा, शरीर के भीतर के अंग सड़ने लगे और उनसे दूषित स्राव निकलने लगा। उँगलियाँ गठिया से विकृत हो गईं, मांसपेशियाँ सुन्न और निष्क्रिय होने लगीं अथवा वे निरंतर ऐंठन के कारण फड़कती रहती थीं। क्या मुझे चक्कर आने, आँखों और कानों के तीव्र दर्द, असहनीय सिरदर्द, तथा शरीर के मल-मूत्र त्याग से संबंधित आंतरिक अंगों में उत्पन्न होने वाले घावों का भी वर्णन करना चाहिए? इसके अतिरिक्त ज्वर के भी असंख्य प्रकार हैं। कुछ अत्यंत तीव्र आक्रमण करने वाले, कुछ धीरे-धीरे संक्रमण के रूप में फैलने वाले और कुछ ऐसे जो कंपकंपी तथा अंगों के भीषण कंपन के साथ आते हैं। फिर मैं उन असंख्य अन्य रोगों का उल्लेख ही क्यों करूँ, जो विलासिता और भोग-विलास के दंडस्वरूप मनुष्य को प्राप्त होते हैं?
इन रोगों ने प्राचीन लोगों को प्रभावित नहीं किया था क्योंकि वे अभी तक भोग-विलास के कारण कोमल और दुर्बल नहीं बने थे। वे स्वयं अपने स्वामी भी थे और अपने सेवक भी। वे अपने शरीर को वास्तविक परिश्रम से सुदृढ़ बनाते थे और दौड़ने, शिकार करने या खेती करने में स्वयं को थका देते थे। उनके लिए जो भोजन उपलब्ध होता था, वह ऐसा था जिसका स्वाद केवल वही व्यक्ति ले सकता था जिसे सचमुच भूख लगी हो। इसलिए न तो इतनी अधिक औषधियों की आवश्यकता पड़ती थी, न इतने शल्य-उपकरणों की और न ही दवाइयों के असंख्य डिब्बों की। उस समय रोग भी सरल थे और उनके कारण भी सरल थे। अनेक प्रकार के रोग तो अनेक प्रकार के व्यंजनों और भोजन-पद्धतियों ने ही उत्पन्न किए हैं। ज़रा ध्यान दो कि विलासिता एक ही गले से नीचे उतारने के लिए धरती और समुद्र से कितनी प्रकार की वस्तुएँ इकट्ठी करके मिला देती है। स्वाभाविक ही है कि इतनी भिन्न-भिन्न वस्तुएँ आपस में ठीक प्रकार से मेल नहीं खातीं और उनका पाचन भी ठीक से नहीं हो पाता। वे एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष करती रहती हैं। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ऐसा अनियमित और असंगत भोजन रोगों को जन्म देता है। जब प्रकृति के बिल्कुल भिन्न-भिन्न स्रोतों से प्राप्त पोषक पदार्थों को एक ही शरीर में जबरन भर दिया जाता है तो अंततः उन्हें उल्टी के रूप में बाहर निकलना पड़ता है। हमारे रोग भी उतने ही विचित्र हैं, जितनी विचित्र हमारी जीवन-शैली हो गई है।
चिकित्सा के महानतम आचार्य और चिकित्सा-विज्ञान के प्रवर्तक ने कहा था कि स्त्रियों के बाल नहीं झड़ते और उन्हें पैरों के रोग नहीं होते। परंतु अब वास्तविकता यह है कि स्त्रियाँ भी बाल झड़ने और पैरों के रोगों से पीड़ित हैं। स्त्री-स्वभाव तो नहीं बदला है। लेकिन वह पराजित अवश्य हो गया है। पुरुषों की उच्छृंखल जीवन-शैली का अनुसरण करते-करते स्त्रियों ने उनके शारीरिक कष्टों को भी अपना लिया है। वे भी पुरुषों की तरह देर रात तक जागती हैं, उतनी ही मदिरा पीती हैं और कुश्ती तथा मद्यपान की प्रतियोगिताओं में पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करती हैं। पुरुषों की ही भाँति वे भी उस भोजन को उलट देती हैं जिसे उनका पेट अनिच्छा से ग्रहण करता है। जितनी मदिरा पी होती है उसे भी उगल देती हैं। पुरुषों की तरह वे भी पेट की जलन को शांत करने के लिए बर्फ चबाती हैं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि चिकित्सा के महानतम आचार्य और शरीर-विज्ञान के सबसे बड़े विशेषज्ञ का कथन असत्य सिद्ध होता दिखाई देता है क्योंकि अब अनेक स्त्रियाँ भी बाल झड़ने और गठिया (गाउट) से पीड़ित हैं। अपने दुर्व्यसनों के कारण उन्होंने अपने स्त्रीत्व के प्राकृतिक लाभ खो दिए हैं।
प्राचीन काल के डॉक्टरों को न तो भोजन की आवृत्ति बढ़ाने का ज्ञान था, न दुर्बल पड़ती नाड़ी को मदिरा से बल देने का, न रक्त निकालने का और न ही दीर्घकालिक रोगों का उपचार गर्म जल से स्नान कराकर करने का। वे यह भी नहीं जानते थे कि भुजाओं और पैरों पर बंधन (पट्टियाँ कसकर बाँधने) के माध्यम से शरीर के सुस्त और निष्क्रिय अंगों में फिर से चेतना और शक्ति कैसे पहुँचाई जाए। उन्हें उपचार के इतने विविध उपाय खोजने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी क्योंकि उस समय प्राणघातक रोग बहुत कम थे। परंतु आज देखो, रोग कितनी दूर तक फैल चुके हैं! यह उन सुख-भोगों की कीमत है जिन्हें हमने उचित और विवेकपूर्ण सीमा से अधिक चाहा है। तुम्हें रोगों की असंख्य संख्या पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए। ज़रा रसोइयों की संख्या ही गिनकर देखो! विद्या और अध्ययन का जीवन लगभग समाप्त हो गया है। लिबरल आर्ट्स के अध्यापकों के पास अब शिष्य नहीं रहे। वे सुनसान कोनों में पड़े रहते हैं। वक्तृत्वशास्त्र और दर्शनशास्त्र के विद्यालयों में सन्नाटा छाया हुआ है। लेकिन रसोइयाँ लोगों से ठसाठस भरी हुई हैं। विलासी लोगों के चूल्हों के चारों ओर कितने ही युवक भीड़ लगाए खड़े रहते हैं! मैं उन अभागे लड़कों की भीड़ का वर्णन नहीं करूँगा, जिनका भोजन समाप्त होने के बाद यौन शोषण किया जाने वाला है। मैं उन हिजड़ों (पुरुष वेश्याओं/यौन दासों) की लंबी पंक्तियों का भी उल्लेख नहीं करूँगा, जिन्हें उनकी जातीय उत्पत्ति और रंग के अनुसार अलग-अलग खड़ा किया गया है। लेकिन जिनकी त्वचा समान रूप से चिकनी है, जिनके चेहरों पर समान मात्रा में हल्की रोएँ हैं और जिनके बाल भी एक ही ढंग से सँवारे गए हैं ताकि उनके स्वाभाविक सीधे बाल कृत्रिम घुँघराले बालों के साथ मिले-जुले दिखाई दें। मैं उन असंख्य नानबाइयों और सेवकों की भीड़ को भी छोड़ देता हूँ, जो संकेत मिलते ही भोजन परोसने के लिए दौड़ पड़ते हैं।
हे देवताओं! केवल एक पेट को संतुष्ट करने के लिए कितने लोगों को काम में लगा दिया जाता है! उन कुकुरमुत्तों (मशरूमों) के बारे में क्या कहोगे, जो स्वाद-लोलुप लोगों के लिए मानो विष ही हैं? क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि यदि उन्होंने अभी तक कोई प्रत्यक्ष हानि नहीं पहुँचाई है तो वे भीतर ही भीतर तुम पर कोई प्रभाव नहीं डाल रहे? क्या तुम सचमुच यह मानते हो कि गर्मियों में जो बर्फ तुम खाते हो, वह तुम्हारे यकृत (लीवर) को कठोर नहीं बना रही? क्या तुम्हें विश्वास है कि वे सीप (ऑयस्टर), जो कीचड़ में पलने वाले सुस्त जीव हैं, अपनी चिकनी और भारी प्रकृति का कोई दुष्प्रभाव तुम पर नहीं छोड़ते? उस आयातित गारुम (मछली को सड़ाकर बनाया जाने वाला अत्यंत महँगा रोमन मसाला) के विषय में क्या कहोगे? क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि सड़ी हुई मछली से बना उसका अत्यधिक नमकीन रस तुम्हारे भीतर अम्लता और जलन उत्पन्न नहीं करेगा? क्या तुम यह समझते हो कि वे भोजन, जो लगभग आग से सीधे तुम्हारे मुँह में पहुँचते हैं, तुम्हारी आँतों में बिना किसी हानि के शांत हो जाते हैं? इसके बाद जो दुर्गंधयुक्त और अस्वास्थ्यकर डकारें आती हैं, वे कैसी होती हैं! जब लोग पिछली रात के मद्यपान और अतिभोजन की दुर्गंध अपने श्वास के साथ बाहर निकालते हैं तो वे स्वयं अपने आप से घृणा करने लगते हैं। निश्चय ही, जो कुछ उन्होंने खाया है वह पच नहीं रहा बल्कि भीतर ही भीतर सड़ रहा है।
मुझे याद है कि एक समय एक प्रसिद्ध व्यंजन की बड़ी चर्चा हुआ करती थी। उसे एक ऐसा भोजनालय परोसता था जो तेज़ी से दिवालिया होने की ओर बढ़ रहा था। उस एक ही व्यंजन में वे सब वस्तुएँ एक साथ ढेर कर दी जाती थीं, जिन पर स्वाद-लोलुप लोग पूरा दिन खर्च कर सकते थे। दो प्रकार की सीपियाँ (मसल्स), केवल खाने योग्य भागों तक छाँटे गए ऑयस्टर, जिनके बीच-बीच में समुद्री साही (सी अर्चिन) सजाए गए होते थे और पूरे व्यंजन पर बारीक़ी से हड्डियाँ निकालकर करीने से सजाई गई लाल मुललेट मछलियाँ बिखेरी जाती थीं।आजकल तो एक ही प्रकार का व्यंजन परोसना शर्म की बात समझी जाती है। अनेक स्वादों को मिलाकर एक ही पकवान बना दिया जाता है। जो प्रक्रिया पेट के भीतर होनी चाहिए, वह अब भोजन की मेज़ पर ही होने लगी है। मुझे तो लगता है कि शीघ्र ही ऐसे व्यंजन भी परोसे जाएँगे जिन्हें पहले से ही चबाकर तैयार कर दिया गया होगा। हम उस स्थिति के कितने निकट पहुँच चुके हैं, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि रसोइया पहले ही सीपों के खोल और मछलियों की हड्डियाँ निकाल देता है ताकि दाँतों के लिए कुछ भी करने को न बचे। लोग कहते हैं, “थोड़ा-थोड़ा करके भोग-विलास करना भी एक झंझट है। सब कुछ एक ही समय पर परोसा जाए और एक ही स्वाद में मिला दिया जाए। मैं अलग-अलग चीज़ों के लिए बार-बार हाथ क्यों बढ़ाऊँ? अनेक पकवानों के छोटे-छोटे स्वादिष्ट भागों को एक साथ मिलाकर एक ही व्यंजन बना दिया जाए।” जो लोग पहले यह कहते थे कि ऐसा केवल दिखावे और शान बघारने के लिए किया जाता है, उन्हें अब यह समझ लेना चाहिए कि यह प्रदर्शन नहीं बल्कि जानबूझकर किया गया अतिभोजन और स्वाद-लोलुपता है। जिन खाद्य पदार्थों को पहले अलग-अलग रखा जाता था, उन्हें अब एक ही सॉस में डुबोकर मिला दिया जाता है। कोई भेद मत रहने दो! ऑयस्टर, समुद्री साही, मसल्स और लाल मुललेट मछलियों, सबको एक साथ पकाकर एक ही मिश्रित व्यंजन के रूप में परोस दो! उल्टी करके निकाला गया भोजन भी इससे अधिक अस्त-व्यस्त और गड्डमड्ड नहीं हो सकता।
भोजन के इस मिश्रण और अव्यवस्था के अनुरूप ही अब रोग भी उत्पन्न हुए हैं। वे अब एकरूप नहीं रहे बल्कि जटिल, अनेक प्रकार के और अनेक रूपों वाले हो गए हैं। उनका सामना करने के लिए चिकित्सा-शास्त्र को भी अनेक प्रकार के रोग-निदानों और विविध उपचारों से स्वयं को सुसज्जित करना पड़ा है। मैं कहता हूँ कि दर्शनशास्त्र के साथ भी यही बात लागू होती है। पहले के समय में वह अधिक सरल था क्योंकि उसे ऐसे छोटे-छोटे दोषों का सामना करना पड़ता था जिनका उपचार हल्के उपायों से भी हो सकता था। लेकिन आज हमारे नैतिक पतन के जो विशाल खंडहर सामने हैं, उनका मुकाबला करने के लिए हमें हर संभव उपाय अपनाना होगा। काश, तब भी हम इस भ्रष्टाचार पर विजय प्राप्त कर पाते! हम केवल व्यक्तिगत रूप से ही नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के रूप में पागल हो चुके हैं। हम व्यक्तिगत हत्याओं को रोकने की बात करते हैं, लेकिन युद्धों का क्या? और उन भव्य अपराधों का क्या, जिन्हें हम नरसंहार के रूप में अंजाम देते हैं? हमारे लोभ और हमारी क्रूरता की कोई सीमा नहीं रही। जब तक ये अपराध गुप्त रूप से और केवल व्यक्तियों द्वारा किए जाते हैं, तब तक वे अपेक्षाकृत कम विनाशकारी और कम भयावह प्रतीत होते हैं। परंतु अब वही क्रूरता सीनेट की स्वीकृति और जनता के आदेश के आधार पर की जाती है। जो कार्य किसी निजी नागरिक के लिए निषिद्ध हैं, वही अब राज्य की नीति के रूप में अनिवार्य बना दिए जाते हैं। जिन अपराधों के लिए कोई व्यक्ति यदि उन्हें गुप्त रूप से करे तो उसे मृत्युदंड दिया जाता है, उन्हीं अपराधों की हम अब प्रशंसा करते हैं, केवल इसलिए कि उन्हें करने वाले लोग सैन्य वेशभूषा में सजे हुए सेनापति हैं। मनुष्य स्वभावतः सबसे अधिक सौम्य प्राणी है, फिर भी हमें हत्या का आनंद लेने, युद्ध करने और युद्ध की विरासत अपनी संतानों को सौंपने में कोई लज्जा नहीं होती। जबकि वाणी से रहित जंगली पशु भी आपस में शांति बनाए रखते हैं।
इतने प्रबल और सर्वव्यापी उन्माद का सामना करने के लिए दर्शनशास्त्र को भी अधिक शक्तिशाली बनना पड़ा है। उसने अपने विरोधियों की शक्ति के बराबर स्वयं को सशक्त बना लिया है। पहले उन लोगों को समझाना आसान था जो मदिरा के अत्यधिक शौकीन थे या भोजन के विषय में अत्यधिक नखरे करते थे। उन्हें उस सरल जीवन में वापस लाने के लिए अधिक प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, जिससे वे केवल थोड़ा-सा ही भटके थे। लेकिन अब स्थिति यह है कि अब तुम्हारे तीव्र हाथों और महान कौशल की आवश्यकता है। अब मनुष्य हर दिशा से सुख-भोग की खोज में लगा हुआ है। कोई भी दोष अकेला नहीं रहता। एक अवगुण दूसरे अवगुण को जन्म देता है। विलासिता अब असीम लालची बन चुकी है। सम्मान और नैतिक गरिमा को भुला दिया गया है। अब जो लाभदायक है, उसके लिए कोई भी कार्य लज्जाजनक नहीं माना जाता। मनुष्य, जो मनुष्य के लिए श्रद्धा का विषय होना चाहिए, अब केवल खेल और मनोरंजन के लिए मार डाला जाता है। पहले किसी व्यक्ति को घाव पहुँचाने और स्वयं घाव सहने का प्रशिक्षण देना भी अनैतिक माना जाता था। लेकिन अब निहत्थे और नग्न मनुष्यों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए अखाड़े में उतारा जाता है और किसी मनुष्य की मृत्यु ही लोगों के मनोरंजन के लिए पर्याप्त समझी जाती है।
नैतिकता के इस पतन और विकृति का सामना करने के लिए हमें कुछ असाधारण रूप से शक्तिशाली उपायों की आवश्यकता है, जो उन बुराइयों को दूर कर सकें जो अब हमारी प्रकृति में गहराई तक जड़ें जमा चुकी हैं।हमें दर्शनशास्त्र के मूल सिद्धांतों का सहारा लेना होगा ताकि उन मिथ्या धारणाओं को पूरी तरह उखाड़ फेंका जा सके जो अब दृढ़ विश्वास का रूप ले चुकी हैं। अपने आप में ये सिद्धांत पर्याप्त नहीं हैं, किंतु जब उन्हें उपदेशों, सांत्वना और प्रेरणादायक शिक्षाओं के साथ जोड़ा जाता है, तब वे प्रभावी सिद्ध होते हैं। यदि हम लोगों को दृढ़ता से संभालना चाहते हैं और उन्हें उन बुराइयों से छुड़ाना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें अपने वश में कर लिया है तो उन्हें पहले यह सीखना होगा कि वास्तव में अच्छा क्या है और बुरा क्या है। उन्हें यह समझना होगा कि सद्गुण (Virtue) के अतिरिक्त हर दूसरी वस्तु अपना स्वरूप और नाम बदलती रहती है, कभी वह अच्छी प्रतीत होती है तो कभी बुरी। जिस प्रकार सैनिक जीवन में प्रवेश करने वाले व्यक्ति का पहला बंधन उसकी निष्ठा की शपथ, अपने ध्वज के प्रति प्रेम और सेना छोड़कर भाग जाने (पलायन) के प्रति घृणा होती है और उसके बाद ही उससे अन्य कर्तव्यों के पालन की अपेक्षा की जाती है। उसी प्रकार जिन लोगों को तुम सुखी जीवन की ओर ले जाना चाहते हो, उनके भीतर सबसे पहले उचित आधार स्थापित करना आवश्यक है और उसके बाद सद्गुण का संस्कार करना चाहिए। लोगों के हृदय में सद्गुण के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होनी चाहिए और उन्हें सद्गुण से प्रेम हो जाना चाहिए। वे ऐसा जीवन चाहें जिसमें सद्गुण उनके साथ हो और वे सद्गुण के बिना जीवन जीने से इंकार कर दें।
“अच्छा, मान लिया। लेकिन क्या कुछ लोग बिना किसी विस्तृत शिक्षा के भी केवल साधारण उपदेशों का पालन करके अच्छे और सदाचारी नहीं बन गए? क्या उन्होंने केवल उन्हीं के सहारे बड़ी प्रगति नहीं की?” मैं इससे सहमत हूँ। परंतु ऐसे लोगों का स्वभाव असाधारण रूप से अनुकूल था। चलते-चलते ही उन्होंने लाभदायक आदतें अपना लीं। जिस प्रकार अमर देवताओं ने सद्गुण सीखकर प्राप्त नहीं किया क्योंकि वे जन्म से ही पूर्ण सद्गुणों से युक्त हैं और उनका स्वभाव ही अच्छा है, उसी प्रकार कुछ मनुष्यों को भी प्रकृति ने ऐसी विलक्षण प्रवृत्ति प्रदान की है कि वे बिना किसी दीर्घ शिक्षा के ही उन निष्कर्षों तक पहुँच जाते हैं जिन्हें सामान्य लोगों को सिखाना पड़ता है। जैसे ही वे सम्माननीय और सद्गुणपूर्ण सिद्धांतों को सुनते हैं, तुरंत उन्हें अपना लेते हैं। इसी कारण हमें ऐसे लोग मिलते हैं जिनका स्वभाव सद्गुण को ग्रहण करने के लिए अत्यंत अनुकूल होता है या जो अपने भीतर स्वयं ही सद्गुण उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन अन्य लोग, जिनकी बुद्धि मंद और जड़ होती है, या जो बुरी आदतों से घिर चुके होते हैं, उनके मन पर जमी हुई जंग को बहुत परिश्रम से घिसकर हटाना पड़ता है।
इसके अतिरिक्त, जिस प्रकार दार्शनिक शिक्षा स्वभाव से अच्छे और सद्गुण की ओर प्रवृत्त लोगों की उन्नति को तेज़ कर देती है, उसी प्रकार वह दुर्बल स्वभाव वाले लोगों की भी सहायता करती है और उनके हानिकारक भ्रमों तथा मिथ्या धारणाओं को दूर करती है। तुम इस प्रकार समझ सकते हो कि ऐसे सिद्धांत कितने आवश्यक हैं। हमारे भीतर कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ छिपी रहती हैं जो कुछ लक्ष्यों के संबंध में हमें आलसी बना देती हैं और कुछ अन्य मामलों में उतावला और असावधान। इस उतावलेपन को संयमित करना और इस आलस्य को दूर करना तभी संभव है जब उनके मूल कारणों को समाप्त किया जाए। और वे कारण हैं, भ्रमपूर्ण आकर्षण तथा भ्रमपूर्ण भय। जब तक ये दोनों हमारे मन पर अधिकार जमाए रहते हैं, तब तक तुम किसी व्यक्ति से चाहे जितना कहो, “ये तुम्हारे पिता के प्रति कर्तव्य हैं, ये तुम्हारे बच्चों के प्रति और ये तुम्हारे मित्रों तथा अतिथियों के प्रति”, फिर भी जब वह उन्हें पूरा करने लगेगा, तो लोभ उसे रोक देगा।
कोई व्यक्ति जानता है कि उसे अपने देश के लिए युद्ध करना चाहिए। लेकिन भय उसे पीछे हटा देगा। वह जानता है कि उसे अपने मित्रों के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देनी चाहिए। लेकिन उसके भोग-विलास उसे ऐसा करने से रोक देंगे। वह यह भी जानता है कि पर-स्त्री के साथ संबंध रखना अपनी पत्नी के प्रति सबसे बड़ा अपराध है, फिर भी उसकी वासना उसे ठीक विपरीत दिशा में ले जाएगी। इसलिए केवल उपदेश देना तब तक कोई लाभ नहीं पहुँचाएगा, जब तक पहले उन बाधाओं को दूर न कर दिया जाए जो उन उपदेशों के पालन में रुकावट बनती हैं। यह वैसा ही होगा जैसे किसी ऐसे व्यक्ति के पास हथियार रख दिए जाएँ जिसके हाथ बँधे हुए हों। जब तक उसके हाथ न खोले जाएँ, वह उन हथियारों का उपयोग नहीं कर सकता। उसी प्रकार, हमारे उपदेशों के अनुसार चलने के लिए मन को पहले उन बंधनों से मुक्त करना आवश्यक है। मान लो कि कोई व्यक्ति उचित आचरण कर भी रहा है तो भी यदि वह यह नहीं जानता कि वह ऐसा क्यों कर रहा है तो उसका आचरण स्थिर और निरंतर नहीं रहेगा। कुछ कार्य संयोगवश या अभ्यास के कारण सही हो सकते हैं। लेकिन उसके पास ऐसा कोई सिद्धांत या नियम नहीं होगा जिसके अनुसार वह अपने आचरण को परखे और जिसकी सहायता से वह यह विश्वास कर सके कि उसका कर्म वास्तव में सही है। जो व्यक्ति केवल संयोग से अच्छा बन गया है, उसके बारे में यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि वह सदा अच्छा ही बना रहेगा।
इसके अतिरिक्त, मान लो कि उपदेश किसी व्यक्ति को सही कार्य करने के लिए प्रेरित भी कर दें, तब भी वे यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि वह उसे सही भावना और सही ढंग से करे। यदि ऐसा नहीं है, तो वे सद्गुण तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मैं स्वीकार करता हूँ कि सलाह मिलने पर कोई व्यक्ति उचित कार्य कर सकता है। लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि किसी कर्म का वास्तविक मूल्य केवल उसके किए जाने में नहीं बल्कि इस बात में है कि वह किस भावना और किस प्रकार किया गया है। इससे अधिक निंदनीय और क्या हो सकता है कि कोई व्यक्ति एक ऐसे भोज पर उतना धन खर्च करे, जितना रोमन अश्वारोही वर्ग (इक्वेस्ट्रियन ऑर्डर) की सदस्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक होता था? या इससे अधिक कौन-सी बात सरकारी निंदा के योग्य हो सकती है कि कोई व्यक्ति, जैसा कि पेटूपन के प्रेमी कहा करते थे, “अपने और अपने संरक्षक देवता (जीनियस) के सम्मान में” इतना धन उड़ा दे? यहाँ तक कि जो लोग स्वयं को अत्यंत मितव्ययी कहते थे, वे भी अपने सार्वजनिक पद ग्रहण करने के अवसर पर दिए जाने वाले प्रथम भोज पर दस लाख सेस्टर्स तक खर्च कर डालते थे। यदि यही धन केवल स्वाद-सुख के लिए खर्च किया जाता तो वह लज्जाजनक माना जाता। लेकिन जब वही धन किसी सार्वजनिक पद के अवसर पर खर्च किया जाता तो उसकी आलोचना नहीं होती। उस स्थिति में उसे विलासिता नहीं बल्कि राजकीय या सार्वजनिक व्यय कहा जाता था।
एक बार सम्राट टिबेरियस सीज़र के पास एक बहुत बड़ी लाल मुललेट मछली भेजी गई (कुछ लोगों के मुँह में पानी लाने के लिए यह भी बता दूँ कि कहा जाता है उसका वजन साढ़े चार पाउंड था)। उन्होंने आदेश दिया कि उसे बाज़ार में ले जाकर बेच दिया जाए। उन्होंने कहा, “मित्रों, यदि मैं पूरी तरह भूल नहीं कर रहा हूँ तो इसे या तो एपीसियस खरीदेगा या पब्लियस ऑक्टावियस।” उनका अनुमान अपेक्षा से भी अधिक सही निकला। दोनों ने बोली लगाई। अंततः ऑक्टावियस ने पाँच हज़ार सेस्टर्स देकर वह मछली खरीद ली और अपने मित्रों के बीच बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की क्योंकि उसने वह मछली खरीद ली थी जिसे स्वयं सम्राट ने बेचने के लिए भेजा था और जिसे एपीसियस जैसा प्रसिद्ध भोग-विलासी भी नहीं खरीद सका। ऑक्टावियस के लिए इतनी बड़ी राशि खर्च करना निंदनीय था। लेकिन उससे भी कम दोष उस व्यक्ति का नहीं था जिसने वह मछली केवल इसलिए खरीदी थी कि उसे टिबेरियस को भेंट कर सके। मैं उसकी भी आलोचना करूँगा क्योंकि वह ऐसी वस्तु पर चकित हुआ और उसने उसे सम्राट के योग्य उपहार समझा।
जब कोई व्यक्ति किसी बीमार मित्र के पास बैठकर उसकी सेवा करता है तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं। लेकिन यदि वही कार्य वह केवल उत्तराधिकार (विरासत) प्राप्त करने की आशा से करता है तो वह किसी शव की प्रतीक्षा करते हुए गिद्ध के समान बन जाता है। एक ही कर्म सम्माननीय भी हो सकता है और निंदनीय भी। निर्णायक बात यह नहीं है कि क्या किया गया बल्कि यह है कि उसे किस उद्देश्य से और किस प्रकार किया गया। हमारे सभी कर्म तभी सम्माननीय होंगे जब हम स्वयं को सम्माननीय (सद्गुणपूर्ण) आचरण के प्रति समर्पित कर दें। यह मानें कि वही तथा उसी पर निर्भर रहने वाली वस्तुएँ ही मानव जीवन की एकमात्र वास्तविक अच्छाई हैं। शेष सभी तथाकथित अच्छी वस्तुएँ केवल क्षणिक हैं, आज हैं, कल नहीं। इसलिए मनुष्य के भीतर ऐसा दृढ़ विश्वास स्थापित करना आवश्यक है जो उसके संपूर्ण जीवन का मार्गदर्शन करे। मैं इसी को 'सिद्धांत' (Principle) कहता हूँ। जैसा किसी व्यक्ति का विश्वास होगा, वैसे ही उसके विचार और कर्म होंगे और जैसे उसके विचार और कर्म होंगे, वैसा ही उसका पूरा जीवन बन जाएगा। जो व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवन को व्यवस्थित करना चाहता है, उसके लिए केवल विशेष परिस्थितियों से संबंधित सलाह पर्याप्त नहीं होती।
मार्कस ब्रूटस ने अपनी पुस्तक ‘उचित कर्तव्य’ (On Appropriate Action) में माता-पिता, बच्चों और भाइयों के लिए अनेक उपदेश दिए हैं। लेकिन कोई भी व्यक्ति तब तक अपने कर्तव्य का उचित पालन नहीं कर सकता, जब तक उसके सामने कोई निश्चित मार्गदर्शक सिद्धांत न हो। हमें उस परम शुभ (Ultimate Good) को स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए जिसकी प्राप्ति के लिए हम प्रयत्न करें। वही हमारे प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म की दिशा निर्धारित करने वाला आधार होना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे नाविक अपनी यात्रा की दिशा किसी निश्चित तारे को देखकर निर्धारित करते हैं। यदि जीवन के सामने कोई निश्चित लक्ष्य न हो तो वह दिशाहीन होकर भटकता रहता है। लेकिन यदि कोई अंतिम और निश्चित लक्ष्य निर्धारित करना आवश्यक है, तो फिर दर्शन के सिद्धांत भी अनिवार्य हो जाते हैं। मुझे विश्वास है कि तुम भी मानोगे कि डगमगाते रहना, निर्णय न ले पाना और कायरतापूर्वक पीछे हट जाना, इनसे अधिक निंदनीय कुछ नहीं है। और यही हमारी स्थिति बनी रहेगी, जब तक हम उन कारणों को दूर नहीं करते जो हमें रोकते हैं, हमें संकोच में डालते हैं और पूरे मन से आगे बढ़ने तथा अपने लक्ष्य के लिए पूर्ण समर्पण के साथ प्रयास करने से हमें वंचित करते हैं।
यह प्रथा है कि लोगों को बताया जाए कि देवताओं की उपासना किस प्रकार करनी चाहिए। आओ, हम यह निषेध करें कि सब्त (Sabbath) के दिन दीपक न जलाए जाएँ क्योंकि देवताओं को प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं होती। मनुष्यों को भी कालिख से कोई विशेष प्रेम नहीं है। आओ, प्रातःकाल देवताओं को प्रणाम करने और मंदिरों के द्वार पर बैठकर उनकी कृपा की प्रतीक्षा करने की प्रथा भी समाप्त कर दें। ऐसी सेवाएँ वास्तव में मनुष्य के अहंकार को प्रसन्न करती हैं। ईश्वर की सच्ची उपासना तो उसे वास्तव में ईश्वर मानकर स्वीकार करने में है। आओ, यह भी बंद कर दें कि लोग जुपिटर के लिए तौलिया और शरीर साफ़ करने का खुरचनी (स्ट्रिजिल) लेकर जाएँ या जूनो (एक रोमन देवी) के सामने दर्पण पकड़कर खड़े रहें। ईश्वर को सेवकों की आवश्यकता नहीं होती। हो भी कैसे सकती है? वह स्वयं समस्त मानव जाति की सेवा करता है। वह हर स्थान पर और हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध है। तुम लोगों को यह सिखा सकते हो कि यज्ञ या बलि में कितना अर्पण करना चाहिए। उन्हें अत्यधिक बोझिल धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने की शिक्षा भी दे सकते हो। लेकिन उनकी प्रगति तब तक पर्याप्त नहीं होगी, जब तक वे ईश्वर के विषय में सही धारणा प्राप्त नहीं कर लेते कि वह ऐसा सत्ता है जिसके पास सब कुछ है, जो सब कुछ प्रदान करती है और जो बिना किसी स्वार्थ के सबका कल्याण करती है। देवताओं की उपकारशीलता का कारण क्या है? उनका अपना स्वभाव। यह सोचना भूल है कि वे हानि पहुँचाना चाहते हैं क्योंकि वे हानि पहुँचा ही नहीं सकते। वे न स्वयं आहत हो सकते हैं और न किसी को आहत कर सकते हैं क्योंकि हानि पहुँचाना और हानि सहना एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। विश्व की परम और सर्वोच्च सुंदर प्रकृति ने उन देवताओं को, जो स्वयं किसी भी संकट से परे हैं, किसी को भी हानि पहुँचाने में असमर्थ बनाया है।
देवताओं की उपासना का पहला चरण उन पर विश्वास करना है। दूसरा चरण उनकी महानता तथा उनकी कल्याणकारी प्रकृति को स्वीकार करना है क्योंकि कल्याणकारी स्वभाव के बिना महानता हो ही नहीं सकती।यह भी जानना चाहिए कि वही देवता संसार पर शासन करते हैं। अपनी शक्ति से समस्त जगत का संचालन करते हैं। मानव जाति की रक्षा एवं देखभाल करते हैं, यद्यपि कभी-कभी वे किसी एक व्यक्ति के मामलों पर विशेष ध्यान नहीं देते। वे न तो किसी बुराई का वितरण करते हैं और न ही अपने भीतर कोई बुराई रखते हैं। किंतु वे कुछ लोगों को डाँटते हैं, उन पर नियंत्रण रखते हैं, उन्हें दंड देते हैं और कभी-कभी तो उनका भला करते हुए प्रतीत होते हुए भी उन्हें दंडित करते हैं। यदि तुम देवताओं को प्रसन्न करना चाहते हो, तो सद्गुणी बनो। उनका अनुकरण करना ही उनकी पर्याप्त उपासना है।
अब हमारे सामने एक और प्रश्न है, जो मनुष्यों के प्रति हमारे व्यवहार से संबंधित है। हमारा उद्देश्य क्या है? हम कौन-से उपदेश दें? क्या केवल इतना कि हमें मनुष्य का रक्त नहीं बहाना चाहिए? जिस व्यक्ति की सहायता करना तुम्हारा कर्तव्य है, उसे केवल हानि न पहुँचाना कितना छोटा और अपर्याप्त कार्य है! क्या यह कोई बहुत बड़ा पुण्य है कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के प्रति क्रूरता न करे? क्या हमारे उपदेश यह नहीं कहेंगे कि जो व्यक्ति जहाज़ डूबने से बच गया हो, उसकी सहायता के लिए हाथ बढ़ाओ। जो मार्ग भटक गया हो, उसे रास्ता दिखाओ। जो भूखा हो, उसके साथ अपनी रोटी बाँटो? मैं उन सभी उपकारों का अलग-अलग उल्लेख क्यों करूँ जो मनुष्य को करने चाहिए या उन सभी प्रकार की हानियों का वर्णन क्यों करूँ जिनसे उसे बचना चाहिए? इसके स्थान पर मैं मानव-कर्तव्य का यह एक सामान्य सिद्धांत प्रस्तुत करता हूँ। यह समस्त ब्रह्मांड, जिसे तुम देख रहे हो और जिसमें मनुष्य तथा देवता दोनों समाहित हैं, एक ही अखंड इकाई है। हम सब उस विराट शरीर के अंग हैं। प्रकृति ने हमें एक ही स्रोत से उत्पन्न किया है और एक ही उद्देश्य के लिए जन्म दिया है। इसलिए उसने हमें परस्पर संबंधी बनाया है। उसने हमारे भीतर एक-दूसरे के प्रति स्नेह उत्पन्न किया है और हमें ऐसा बनाया है कि हम मिल-जुलकर रहने वाले प्राणी बनें। प्रकृति ने ही न्याय और निष्पक्षता की स्थापना की है। प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार, किसी को हानि पहुँचाना, स्वयं हानि सहने की अपेक्षा अधिक बुरा है। इसलिए प्रकृति की आज्ञा के अनुसार, जब भी आवश्यकता हो, हमारे हाथ सहायता के लिए सदैव आगे बढ़ने चाहिए। यह पंक्ति तुम्हारे हृदय में भी होनी चाहिए और तुम्हारे मुख पर भी—
“मैं मनुष्य हूँ। मनुष्यता से संबंधित कोई भी बात मेरे लिए पराई नहीं है।”
आओ, हम सब वस्तुओं को साझा भाव से देखें क्योंकि हमारा जन्म सामूहिक कल्याण के लिए हुआ है। हमारा पारस्परिक सहयोग एक मेहराब (आर्च) के समान है। यदि उसके पत्थर एक-दूसरे को सहारा न दें तो पूरी मेहराब ढह जाएगी।
देवताओं और मनुष्यों के बाद अब हमें यह विचार करना चाहिए कि वस्तुओं के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए। यदि हम पहले यह न बताएँ कि प्रत्येक वस्तु के विषय में हमें कैसी धारणा रखनी चाहिए तो केवल उपदेश देते रहने का कोई लाभ नहीं है। उदाहरण के लिए निर्धनता, धन, यश, अपयश, मातृभूमि और निर्वासन जैसी प्रत्येक वस्तु के विषय में पहले सही निर्णय होना आवश्यक है। आओ, जनसाधारण की धारणाओं को एक ओर रख दें और इन प्रत्येक विषयों का उनके वास्तविक स्वरूप के आधार पर मूल्यांकन करें। हमें यह जाँच करनी चाहिए कि वे वास्तव में क्या हैं, न कि लोग उन्हें किस नाम से पुकारते हैं।
इसके बाद हमें सद्गुणों (गुणों) पर विचार करना चाहिए। उपदेश हमें यह सिखाएँगे कि विवेकशीलता को अत्यंत मूल्यवान समझो, साहस को अपनाओ और यदि संभव हो तो न्याय से अन्य सभी सद्गुणों की अपेक्षा भी अधिक गहरा संबंध स्थापित करो। लेकिन ऐसे उपदेश तब तक निष्फल रहेंगे, जब तक हम यह न जान लें कि सद्गुण क्या है। क्या वह एक ही है या अनेक हैं? क्या सभी सद्गुण परस्पर जुड़े हुए हैं या एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं? क्या एक सद्गुण का होना सभी सद्गुणों के होने का भी द्योतक है और वे एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?एक भवन-निर्माता को अपनी निर्माण-सामग्री की उत्पत्ति और उसके उपयोग का उतना ज्ञान आवश्यक नहीं होता, जितना एक मूक-नर्तक (पैंटोमाइम कलाकार) को नृत्य-कला के सिद्धांतों की खोज करने की आवश्यकता होती है। ये सभी कलाएँ अपने-अपने मूल सिद्धांतों को जानती हैं और अपने-आप में पूर्ण हैं क्योंकि उनका संबंध संपूर्ण जीवन से नहीं होता। किन्तु सद्गुण ऐसा ज्ञान है, जो स्वयं को भी समझता है और अन्य सभी वस्तुओं को भी। इसलिए यदि हमें सद्गुण प्राप्त करना है तो पहले हमें सद्गुण के स्वरूप को समझना होगा। कोई कर्म तब तक सही नहीं हो सकता, जब तक उसके पीछे की भावना या उद्देश्य सही न हो क्योंकि कर्म उसी से उत्पन्न होता है। उद्देश्य भी तब तक सही नहीं हो सकता, जब तक मन की प्रवृत्ति सही न हो क्योंकि उद्देश्य उसी से जन्म लेता है। फिर मन की प्रवृत्ति भी तब तक उत्तम नहीं हो सकती, जब तक मनुष्य संपूर्ण जीवन के नियमों को न समझ ले, प्रत्येक वस्तु के विषय में उचित निर्णय करना न सीख ले और अपने जीवन की परिस्थितियों का मूल्यांकन सत्य के आधार पर न करने लगे। मन की शांति उसी व्यक्ति को प्राप्त होती है, जिसका निर्णय स्थिर, निश्चित और अटल होता है। इसके विपरीत, अन्य लोग बार-बार अपने कदम खो देते हैं और फिर उन्हें सँभालने का प्रयास करते हैं। वे कभी किसी वस्तु का त्याग करते हैं, तो कभी उसी के पीछे भागने लगते हैं। उनका जीवन निरंतर अस्थिरता और डगमगाहट में बीतता है।
इस अस्थिरता का कारण क्या है? इसका कारण यह है कि जो लोग जनसाधारण की राय पर निर्भर रहते हैं, उनके लिए कोई भी बात निश्चित नहीं होती क्योंकि जनमत सबसे अविश्वसनीय कसौटी है। यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे निर्णय और चुनाव सदैव एक जैसे और स्थिर रहें तो तुम्हें सत्य को ही चुनना होगा। सत्य तक पहुँचने का कोई मार्ग सिद्धांतों के बिना नहीं है क्योंकि सिद्धांत ही जीवन को उसका ढाँचा और आधार प्रदान करते हैं।अच्छा और बुरा, सम्माननीय और निंदनीय, न्यायपूर्ण और अन्यायपूर्ण, कर्तव्यनिष्ठ और अकर्तव्यनिष्ठ, सद्गुण और उनके कार्य, भौतिक सुख-सुविधाएँ, प्रतिष्ठा और पद, स्वास्थ्य, शक्ति, सौंदर्य तथा इंद्रियों की तीक्ष्णता, इन सबका सही मूल्यांकन होना चाहिए। आओ, हम यह जानें कि इन सबमें से प्रत्येक का वास्तविक मूल्य क्या है।तुम स्वयं देख सकते हो कि तुम कितनी भूल करते हो। तुम कुछ वस्तुओं का मूल्य उनकी वास्तविक कीमत से कहीं अधिक आँकते हो। यहाँ तक कि जिन वस्तुओं को हम सबसे अधिक मूल्यवान समझते हैं, धन, प्रभाव और सत्ता, उनका मूल्य तो एक पैसे के बराबर भी नहीं होना चाहिए। लेकिन तुम यह बात तब तक नहीं समझ सकते, जब तक तुम उस वास्तविक व्यवस्था का अध्ययन न कर लो जो इन सभी वस्तुओं के सही मूल्य का निर्धारण करती है। जैसे पत्तियाँ अपने आप हरी-भरी नहीं रह सकतीं, उन्हें किसी शाखा से जुड़ा रहना पड़ता है जिससे वे अपना रस प्राप्त करती हैं। उसी प्रकार उपदेश भी अपने-आप में जीवित और प्रभावशाली नहीं रह सकते, उन्हें किसी सुसंगत दार्शनिक व्यवस्था (दर्शन-प्रणाली) से जुड़े रहना आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, जो लोग दर्शन के सिद्धांतों को निरर्थक मानकर उन्हें अस्वीकार कर देते हैं, वे यह नहीं समझते कि जिन तर्कों के आधार पर वे सिद्धांतों का निषेध करते हैं, वही तर्क वास्तव में सिद्धांतों की आवश्यकता की पुष्टि करते हैं। उनका कहना है कि जीवन को केवल उपदेशों के आधार पर ही ठीक प्रकार से व्यवस्थित किया जा सकता है। इसलिए दर्शन के मूल सिद्धांत अनावश्यक हैं। लेकिन यह कथन स्वयं एक सिद्धांत है। ज़रा सोचो! यह वैसा ही होगा जैसे मैं कहूँ कि उपदेश व्यर्थ हैं। इसलिए उन्हें छोड़ देना चाहिए। केवल सिद्धांतों का ही उपयोग करना चाहिए और अध्ययन भी केवल उन्हीं का करना चाहिए। यदि मैं उपदेशों की उपयोगिता का खंडन करते हुए ऐसा कहूँ तो मैं स्वयं भी एक उपदेश ही दे रहा होऊँगा। दर्शन में कुछ बातें ऐसी हैं जिनके लिए केवल समझाना या प्रेरित करना पर्याप्त होता है। लेकिन कुछ बातें ऐसी भी हैं जिनके लिए प्रमाण चाहिए और बहुत अधिक प्रमाण चाहिए क्योंकि वे अत्यंत जटिल होती हैं और अत्यधिक सावधानी तथा सूक्ष्म विवेचन के बाद भी सहजता से स्पष्ट नहीं होतीं। यदि प्रमाणों की आवश्यकता है तो उन सिद्धांतों की भी आवश्यकता है जिनके आधार पर तर्क करके सत्य तक पहुँचा जाता है। कुछ बातें स्वयं स्पष्ट होती हैं जबकि कुछ गूढ़ और अप्रकट होती हैं। जो बातें स्वयं स्पष्ट हैं, उन्हें हम इंद्रियों और स्मृति के माध्यम से जान लेते हैं। लेकिन जो बातें इनसे परे हैं, उन्हें इस प्रकार नहीं जाना जा सकता। विवेक (तर्क-बुद्धि) केवल प्रत्यक्ष और स्पष्ट बातों तक सीमित नहीं है। उसका अधिकांश कार्य और उसका सबसे उत्कृष्ट भाग, उन विषयों से संबंधित है जो प्रत्यक्ष नहीं हैं। जो बातें अप्रकट हैं, उनके लिए प्रमाण आवश्यक हैं तथा प्रमाण सिद्धांतों के बिना संभव नहीं हैं। इसलिए दर्शन के सिद्धांत अनिवार्य हैं।
दूसरों के प्रति सच्ची आत्मीयता और सद्भावना उत्पन्न करने तथा उसे पूर्ण विकसित करने वाली वस्तु है, वास्तविक तथ्यों के विषय में दृढ़ और अटल विश्वास। यदि ऐसा विश्वास न हो तो जब मन के सभी विचार डगमगाते रहते हैं, तब ऐसे सिद्धांतों की आवश्यकता होती है जो मन को आचरण का एक स्थिर मापदंड प्रदान कर सकें। इसी प्रकार, जब हम किसी व्यक्ति को यह सलाह देते हैं कि वह अपने मित्र को अपने समान समझे या यह माने कि शत्रु भी एक दिन मित्र बन सकता है। इस प्रकार एक के प्रति प्रेम तथा दूसरे के प्रति द्वेष को कम करने का प्रयास करे, तब हम यह भी जोड़ते हैं “क्योंकि यही न्यायसंगत और सम्माननीय है।” लेकिन यह सिद्ध करना कि कोई बात वास्तव में न्यायसंगत और सम्माननीय है, तर्क-बुद्धि (विवेक) का कार्य है। इसलिए तर्क-बुद्धि आवश्यक है क्योंकि उसके बिना ये सिद्धांत अस्तित्व में ही नहीं रह सकते।
इसलिए हमें उपदेशों और सिद्धांतों को परस्पर जोड़कर रखना चाहिए। जड़ों के बिना शाखाएँ किसी काम की नहीं होतीं और स्वयं जड़ों को भी उन शाखाओं से सहायता मिलती है जो उन्हीं से उत्पन्न होती हैं। कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि वह हमारे हाथों की उपयोगिता नहीं जानता। उनका कार्य तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है। लेकिन हृदय जो हाथों को जीवन, शक्ति और गति प्रदान करता है, दृष्टि से ओझल रहता है। दर्शन में भी यही बात लागू होती है। उपदेश स्पष्ट और प्रत्यक्ष होते हैं जबकि दर्शन के मूल सिद्धांत गहरे और अप्रकट रहते हैं।जिस प्रकार किसी धर्म के सबसे पवित्र रहस्य केवल दीक्षित लोगों को ही ज्ञात होते हैं, उसी प्रकार दर्शन के सबसे गहन तत्त्व भी केवल उन्हीं लोगों के सामने प्रकट होते हैं जिन्हें उसके रहस्यों में पूर्ण रूप से प्रवेश मिल चुका होता है। किन्तु उपदेश और इसी प्रकार की शिक्षाएँ तो बाहरी लोगों के साथ भी साझा की जाती हैं।
पोसिडोनियस का मत है कि केवल उपदेश (जिसे मैं 'प्रिसेप्शन' कह सकता हूँ—इस शब्द का प्रयोग करने से मुझे कोई नहीं रोक सकता) ही पर्याप्त नहीं हैं। उनके अनुसार प्रोत्साहन, सांत्वना और प्रेरणा भी आवश्यक हैं।इनके अतिरिक्त वे कारणों की खोज को भी आवश्यक मानते हैं। (मैं नहीं समझता कि इसे 'एटियोलॉजी' क्यों न कहूँ, जबकि जो विद्वान लैटिन भाषा की शुद्धता के रक्षक बने फिरते हैं, वे स्वयं इस शब्द के प्रयोग का अधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हैं।) वे यह भी कहते हैं कि प्रत्येक सद्गुण का उदाहरण देकर उसका स्वरूप स्पष्ट करना उपयोगी होगा। इसके लिए वे 'एथोलोजिया' (Ethologia) शब्द का प्रयोग करते हैं। जबकि दूसरे विद्वान इसे 'कैरेक्टरिस्मोस' (Characterismos) कहते हैं। इसका उद्देश्य प्रत्येक सद्गुण और प्रत्येक अवगुण के लक्षणों तथा पहचान-चिह्नों का ऐसा वर्णन करना है जिससे एक-दूसरे से मिलती-जुलती बातों में भी स्पष्ट भेद किया जा सके। वास्तव में यह विधि उपदेश देने के समान ही है। क्योंकि जो उपदेश देता है, वह कहता है, “यदि तुम संयमी बनना चाहते हो तो ऐसा करो।” जो उदाहरण देकर समझाता है, वह कहता है, “जो व्यक्ति ऐसा करता है और इन बातों से बचता है, वही संयमी है।” इन दोनों में अंतर क्या है? एक व्यक्ति सद्गुण के उपदेश देता है। जबकि दूसरा सद्गुण का जीवंत उदाहरण और उसका स्वरूप प्रस्तुत करता है।
मैं स्वीकार करता हूँ कि इस प्रकार के उदाहरण या कर-वसूलने वालों की भाषा में कहें तो 'पहचान-चिह्न', वास्तव में उपयोगी होते हैं। यदि तुम उत्कृष्ट आचरण के उदाहरण प्रस्तुत करोगे तो कोई-न-कोई अवश्य मिलेगा जो उनका अनुसरण करेगा। क्या तुम्हें नहीं लगता कि उत्तम नस्ल के घोड़े को पहचानने के लक्षण जानना उपयोगी है ताकि उसे खरीदते समय कोई तुम्हें धोखा न दे और तुम किसी निकृष्ट घोड़े पर अपना धन व्यर्थ न गँवाओ? तो फिर यह जानना कितना अधिक उपयोगी होगा कि एक उत्कृष्ट चरित्र और महान आत्मा वाले मनुष्य की पहचान क्या है! क्योंकि उन गुणों को देखकर मनुष्य उन्हें दूसरे से अपने भीतर भी विकसित कर सकता है।तुम श्रेष्ठ वंश के घोड़े के बच्चे (बछेड़े) को तुरंत पहचान लोगे—
वह मैदानों में इठलाता हुआ दौड़ता है,
उसके खुर धरती को मानो हल्के से ही स्पर्श करते हैं,
वही सबसे पहले आगे बढ़ने का साहस करता है,
उफनती हुई धाराओं का सामना करने का जोखिम उठाता है,
और अनजाने पुल पर भी निडर होकर कदम रख देता है,
सिर्फ़ आवाज़ों से वह सहमकर पीछे नहीं हटता,
उसकी गर्दन लंबी और सुंदर होती है,
सिर सुडौल होता है,
पसलियाँ सघन होती हैं,
पीठ मजबूत होती है,
उसकी चौड़ी छाती गहरी साँस लेने के लिए बनी होती है,
और बलशाली मांसपेशियों से भरी रहती है,
यदि दूर कहीं शस्त्रों की टकराहट की ध्वनि उसके कानों तक पहुँच जाए,
तो वह तुरंत चौकन्ना होकर चल पड़ता है,
उसके कान तन जाते हैं,
उसके अंग उत्साह से थरथराने लगते हैं,
और वह फुँफकारते हुए अपनी नासिकाओं से साँस छोड़ता है,
मानो अपने भीतर की अग्नि को एकत्र कर रहा हो।
हमारे कवि वर्जिल ने, यद्यपि किसी अन्य विषय का वर्णन करते हुए एक साहसी मनुष्य का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है। यदि मुझे किसी महान वीर का चित्रण करना हो तो मैं भी इससे भिन्न कोई रूप प्रस्तुत न करूँ। यदि मुझे कैटो का वर्णन करना हो जो गृहयुद्ध के कोलाहल के बीच भी निर्भीक था, जिसने आल्प्स पर पहले से डटी हुई सेनाओं का सबसे पहले सामना किया और जिसने स्वयं गृहयुद्ध के सभी संकटों का निडर होकर सामना किया तो मैं उसके लिए ठीक यही रूप और यही व्यक्तित्व प्रस्तुत करता। वास्तव में, "वह मैदान में इठलाता हुआ आगे बढ़ता है", यह कथन भी कैटो के लिए कम ही पड़ता है। जब समस्त लोग या तो सीज़र का पक्ष ले रहे थे या पॉम्पी का, तब कैटो अकेला ऐसा व्यक्ति था जिसने दोनों का सामना किया। उसने यह दिखा दिया कि गणराज्य (रोमन रिपब्लिक) का भी एक समर्थक है। कैटो के विषय में यह कहना कि वह 'केवल आवाज़ों से नहीं डरता' भी स्पष्टतः बहुत छोटा कथन है। वह केवल ध्वनियों से ही क्यों डरता? वह तो अपने सामने उपस्थित वास्तविक संकटों से भी नहीं डरा। दस सेनाओं, गॉल के सहायक सैनिकों तथा रोमन नागरिकों और विदेशियों की संयुक्त सेना के सामने भी उसने निर्भीक होकर अपने विचार व्यक्त किए। उसने गणराज्य से आग्रह किया कि वह स्वतंत्रता की रक्षा का संघर्ष न छोड़े। बल्कि उसके लिए हर संभव प्रयास करे क्योंकि दासता में प्रवेश करने की अपेक्षा उसका प्रतिरोध करते हुए गिर जाना कहीं अधिक सम्मानजनक है। उसमें कितनी शक्ति, कितना उत्साह और कितना अद्भुत साहस था! जब चारों ओर भय का वातावरण था, तब भी वह पूर्ण आत्मविश्वास से भरा हुआ था। वह जानता था कि केवल उसी की स्थिति ऐसी है जिस पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। उसके सामने प्रश्न यह नहीं था कि कैटो स्वतंत्र रहेगा या नहीं, प्रश्न यह था कि क्या स्वतंत्र लोगों में कोई शेष भी रहेगा। इसी कारण वह संकटों और तलवारों, दोनों की अवहेलना करता था। अपने देश के पतन के बीच भी अटल खड़े रहने वाले उस पुरुष के अजेय संकल्प की प्रशंसा करते हुए ये शब्द उद्धृत करना सचमुच आनंददायक है, “उसकी छाती गहरी साँस लेने के लिए चौड़ी है और सशक्त मांसपेशियों से परिपूर्ण है।”
केवल किसी अच्छे मनुष्य के सामान्य गुणों का वर्णन करना, उसके चरित्र और उसके विशिष्ट लक्षणों का चित्र प्रस्तुत करना ही उपयोगी नहीं होगा, बल्कि यह बताना भी उपयोगी होगा कि ऐसे मनुष्य वास्तव में कैसे थे।उदाहरण के लिए, कैटो का वह अंतिम और अद्वितीय साहसपूर्ण घाव, जिसके माध्यम से उसने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण त्याग दिए। लैलियस की बुद्धिमत्ता और अपने मित्र सिपियो के साथ उसकी अटूट मित्रता। दूसरे कैटो के घर और विदेश, दोनों स्थानों पर किए गए महान कार्य तथा टुबेरो का वह प्रसंग, जब उसने सार्वजनिक भोज के लिए लकड़ी के पलंग बिछाए, बिछौनों के स्थान पर बकरी की खालें बिछाईं और स्वयं जुपिटर के मंदिर के सामने होने वाले भोज के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया। संक्षेप में कहें तो उसने कैपिटोल की पहाड़ी पर निर्धनता को भी एक पवित्र स्थान प्रदान कर दिया। यद्यपि मुझे टुबेरो का ऐसा कोई दूसरा कार्य ज्ञात नहीं है जिसके आधार पर उसे कैटो जैसे महान पुरुषों की श्रेणी में रखा जा सके, फिर भी क्या यह एक कार्य ही पर्याप्त नहीं है? वह कोई विलासपूर्ण दावत नहीं दे रहा था। वह तो अपने सार्वजनिक पद का निर्वाह मितव्ययिता और सादगी के साथ कर रहा था। जो लोग यश और प्रसिद्धि के लिए लालायित रहते हैं, वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि वास्तविक यश क्या है और उसे किस प्रकार प्राप्त किया जाना चाहिए। उस दिन बहुत-से लोगों की सजावट और वैभव को रोमन जनता ने देखा लेकिन वास्तव में आश्चर्य केवल एक व्यक्ति को देखकर हुआ, टुबेरो को। अन्य सभी लोगों का सोना और चाँदी न जाने कितनी बार तोड़ा गया, गलाया गया और फिर से नए रूप में ढाला गया। लेकिन टुबेरो के मिट्टी के वे साधारण बर्तन अमर हो गए, उनकी कीर्ति सदैव बनी रहेगी।
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